सामाजिक समानता का स्वच्छ रास्ता

भारत में हम कुछ मुद्‌दों से राजनीतिक रूप से सही होने के नाम पर या राजनीतिक वजूद बनाए रखने के लिए दूर ही रहते हैं। दुख है कि यही वे मुद्‌दे होते हैं, जिन पर सर्वाधिक ध्यान देने की जरूरत होती है। भारत में एक ऐसा विवादित मुद्‌दा जाति आधारित आरक्षण है। आमतौर पर यह मुद्‌दा लोगों के मन में सुषुप्तावस्था में रहता है, लेकिन इसे फिर भड़कने के लिए ज्यादा देर नहीं लगती। गुजरात में पटेल समुदाय का हाल का प्रदर्शन इसका उदाहरण है। इस मुद्‌दे ने इतने लोगों को प्रदर्शन के लिए आकर्षित किया कि राज्य सरकार को दावानल फैलने से रोकने के लिए इंटरनेट सेवाओं और एसएमएस पर रोक लगानी पड़ी। अभी तो यह प्रदर्शन सड़कों पर अप्रिय वारदात में नहीं बदला, लेकिन यह मुद्‌दा लोगों के दिल में बना हुआ है।
 
आप हर बार इंटरनेट पर पाबंदी नहीं लगा सकते। यदि यह प्रदर्शन कोई सबक है तो वह यह कि जहां आरक्षण लागू करने के पीछे अच्छा इरादा था, वहीं अब मौजूदा आरक्षण नीति पर फिर से दृष्टि डालने की जरूरत है। जब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण नीति की समीक्षा का सुझाव दिया तो उनका यही आशय था कि आरक्षण अधिक निष्पक्ष हो जाए। बेशक, उनकी टिप्णणी को राजनीतिक भूल के रूप में लिया गया। आरएसएस के साथ भाजपा का रिश्ता और बिहार के आगामी चुनाव का मतलब यह था कि उनके बयान से भाजपा के खिलाफ दलित वोट लामबंद हो सकते हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं कि भाजपा या किसी अन्य दल से कोई भी आरएसएस प्रमुख के दृष्टिकोण से सहमत नहीं हुआ। हालांकि, हमें देशहित को दीर्घावधि में देखना चाहिए।
 
हमें ऐसी आरक्षण नीति कायम रखनी चाहिए, जो इसके मूल उद्‌देश्य को सबसे अच्छी तरह पूरा करे- यानी निष्पक्ष व अधिक समानता आधारित समाज का निर्माण। हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि आरक्षण एक शॉर्ट कट है। यह समानता आधारित समाज के निर्माण का कामचलाऊ, कृत्रिम, लेकिन थोड़ा तेज तरीका है। यह अवसर निर्मित नहीं करती। यह सिर्फ किसी योग्य व्यक्ति से अवसर लेकर किसी और को सौंप देती है, विशुद्ध रूप से जन्म के आधार पर। ऐसा करके यह समाज को विभाजित करती है, यह साधारणता निर्मित करती है और प्रतिभा को हतोत्साहित करती है।
 
फिलहाल केंद्रीय शिक्षा संस्थानों और सरकारी नौकरियों में 50 फीसदी भर्ती ओबीसी, एससी और एसटी के लिए आरक्षित है। ओबीसी के लिए एक मलाईदार परत की अवधारणा भी है, जिसके तहत 6 लाख रुपए सालाना की आय वाले परिवार आरक्षण नीति का फायदा नहीं ले सकते। एससी, एसटी में मलाईदार परत की ऐसी कोई अवधारणा नहीं है। निश्चित ही ऐतिहासिक रूप से और भारत के कुछ हिस्सों में अब भी पिछड़े वर्ग के लोगों को अवसरों से वंचित किया गया। उनके साथ भेदभाव हुआ। हालांकि, यह वाक्य 1965 तक वैध था। क्या पिछले 50 वर्षों में कुछ भी नहीं बदला?
 
निष्पक्ष समाज निर्मित करने के उद्‌देश्य से बनाई इस आरक्षण नीति ने कुछ हद तक अपने लक्ष्य तो हासिल किए ही होंगे या नहीं? बेशक, चीजें बदली हैं। अनुसूचित जाति-जनजाति संबंधी एक आयोग के अध्ययन में उजागर हुआ कि अनुसूचित जाति के प्रत्याशी (जिसमें एससी व ओबीसी शामिल नहीं है) प्रथम श्रेणी की सरकारी नौकरियों (कुलीन वर्ग की नौकरियां) में 1965 में एक फीसदी होते थे। 1995 के आते-आते प्रथम श्रेणी की सरकारी नौकरियों में उनका हिस्सा बढ़कर 10 फीसदी हो गया। 2015 में यह और भी बढ़ गया होगा।
 
शीर्ष सरकारी नौकरियों में पिछड़े समुदायों की हिस्सेदारी में नाटकीय इजाफा बताता है कि आरक्षण नीति सफल रही है। हालांकि, गौर करें कि उच्च श्रेणी के इन एससी-एसटी अधिकारियों के बच्चों को अब भी आरक्षण का फायदा मिलता है। अनुसूचित जाति या जनजाति श्रेणी के बीच यह सामंती उच्च वर्ग संपन्नता के वातावरण में पल-बढ़कर पहले की पीढ़ी से मिले सारे फायदे विरासत में अगली पीढ़ी को सौंपेगा और इसके साथ गरीबी रेखा के नीचे के किसी भी अन्य एससी-एसटी प्रत्याशी की तरह आरक्षण का भी हकदार होगा। मलाईदार परत की मलाई और मोटी होती जाएगी और वास्तविक हकदारों को उनके हक से वंचित करेगी।
 
इस समस्या का समाधान यह है कि आरक्षण के लाभ को किसी बेहतर मात्रात्मक संकेतक से जोड़ा जाए ताकि पता चल सके कि किसे अवसरों से वंचित किया जा रहा है। यह संकेतक है-अामदनी। परिवार की आय इस बात का अच्छा संकेत हो सकती है कि उस परिवार के बच्चे को आईआईटी में पढ़ने या आईएएस की तैयारी करने का उच्च या मध्यम वर्ग के छात्र जितना ही अवसर मिलेगा या नहीं। यह साफ-सुथरा भी लगता है। आर्थिक मानदंड लागू करने के बारे में अद्‌भुत बात यह है कि प्रति व्यक्ति आय बढ़ने के साथ आरक्षण के योग्य लोगों की संख्या भी अपने आप कम होती जाएगी। हो सकता है कि एक दिन ऐसा आए कि हमें आरक्षण की जरूरत ही नहीं रहे।
 
आज टेक्नोलॉजी ने हमें परिवारों की आय का आकलन करने, उसके स्रोत का पता लगाने और उस पर निगरानी रखने की ऐसी सुविधा दी है, जो पहले कभी नहीं थी। एक ऐसे भारत की कल्पना कीजिए जहां आपकी जाति का कोई अर्थ नहीं है। महत्व है तो आपकी प्रतिभा का और आप गरीब परिवार में जन्मे हैं तो आपको अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए मदद मिलेगी। यह अभी के मुकाबले काफी निष्पक्ष भारत होगा। अभी तो जातियों की एक सूची को आरक्षण मिलता है और कथित ऊंची जाति वाले बची हुई सीटों के लिए आपाधापी मचा रहे हैं।
 
कुछ लोग तर्क देते हैं कि आरक्षण आर्थिक उत्थान के साथ ही जाति का भी सामाजिक दर्जा बढ़ाता है। बेहतर समाधान तो यह है- जाति व्यवस्था ही खत्म कर दो। समाज उन लोगों को हतोत्साहित करे, जो दूसरे लोगों की जातियां पूछते फिरते हैं। यदि हम पूर्वोत्तर या पिछड़ी जातियों के लोगों के प्रति अपमानजनक टिप्पणियों को अवैध घोषित कर सकते हैं तो जाति के बारे में बात करने को अवैध क्यों नहीं बना सकते? ज्यादातर दुनिया का काम इस जाति व्यवस्था के बिना भी बखूबी चल रहा है।
 
सरनेम तो सिर्फ नाम हैं, समाज में आपको दर्जा देने के लिए उनका उपयोग नहीं होना चाहिए। वैसे भी इस जाति व्यवस्था का अब उपयोग क्या रह गया है? सारे जवाब एक लेख में नहीं मिल सकते। हालांकि, काफी कुछ बदल सकता है और अब समय आ गया है कि देश में जाति व आरक्षण प्रणाली को नया स्वरूप देना होगा। आधुनिक टेक्नोलॉजी इसमें मदद करेगी। यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो निष्पक्षता के नाम पर जिन युवाओं से हम अवसर छीन लेते हैं, उन्हें यह रास नहीं आएगा। आप कोई अनुचित बात करके न्याय की स्थापना नहीं कर सकते। आप सही कदम उठाकर ही निष्पक्षता निर्मित कर सकते हैं। आइए यह करके दिखाएं।
 
- चेतन भगत (अंग्रेजी के युवा उपन्यासकार)
साभारः दैनिक भास्कर

Add new comment

Filtered HTML

  • Lines and paragraphs break automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <blockquote> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.

Plain text

  • No HTML tags allowed.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Lines and paragraphs break automatically.