एक नेक विचार

भूमंडलीकरण तथा आर्थिक उदारवाद के दौर में काफी समय से भारतीय कर प्रणाली में सुधार की मांग होती रही है। अर्थक्रांति नामक संगठन ने अपनी वेबसाइट पर भारतीय कर प्रणाली में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने का प्रस्ताव रखा है। इसके अनुसार भारत के सभी प्रकार के करों (कस्टम तथा आयात को छोड़कर) के स्थान पर बैंक लेन-देन कर को लगाने का सुझाव है। इस कर के द्वारा होने वाली आय को केंद्र, राज्य एवं स्थानीय शासन में बांटे जाने की बात है। इस प्रस्ताव के अनुसार आयकर भी समाप्त हो सकता है पर इसकी संभावनाओं पर विचार करना होगा।
दुनिया के कई देशों में आयकर का प्रावधान नहीं है। उदाहरण के तौर पर संयुक्त अरब अमीरात, ओगान, बहरीन, इत्यादि। हालांकि इन देशों में नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा के नाम पर 5 से 10 फीसद तक कर देना पड़ता है। यही नहीं कुछ उत्पादों जैसे शराब पर 50 फीसद तक कर वसूल किया जाता है। इन देशों में सरकार को ज्यादातर आय तेल कंपनियों के माध्यम से होती है। इस कारण इन देशों के आम नागरिकों पर आयकर लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है, परंतु भारत का मामला अलग है। हमारे यहां आय के साधन सीमित हैं।
बावजूद इसके भी आयकर को समाप्त किया जा सकता है। आयकर तथा निगम कर हमारे देश में प्रत्यक्ष कर के प्रकार है। सरकारी राजस्व में प्रत्यक्ष कर का योगदान 52 फीसद है। इसमें आयकर से केवल 17 फीसद आता है और शेष निगम कर से आता है। इसी प्रकार आयकर से प्राप्त होने वाला राजस्व देश के सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 1.9 फीसद है, जबकि निगम कर से प्राप्त राजस्व तीन फीसद है। पिछले वर्ष वित्त मंत्री के भाषण के अनुसार देश में केवल 42,800 नागरिक हैं जो एक करोड़ से अधिक सालाना आय घोषित करते हैं, जो देश की कुल जनसंख्या का मात्र 0.0036 फीसद हैं।
समय-समय पर ऐसे बहुत से मामले सामने आते हैं जिनसे पता चलता है कि अरबों की संपत्ति होने के बावजूद यह आयकर नहीं देते हैं अथवा देते हैं तो न के बराबर। भारत में कुल आयकर दाताओं की संख्या 3.5 या 4 करोड़ के आसपास है। इनमें लगभग 40 लाख लोग 20 लाख से ऊपर आय घोषित करते है, जो कि कुल आयकरदाताओं का लगभग एक प्रतिशत है। अनुमान है कि देश में अघोषित आय से प्राप्त धन हजारों करोड़ रुपयों में है जो देश के सकल घरेलू उत्पाद का बहुत बड़ा हिस्सा हो सकता है।
यहां मुख्य तर्क यही है कि आय के स्रोत को चिन्हित न कर पाने पर भी व्यय अथवा उपभोग को चिन्हित किया जा सकता है। इसलिए आयकर न सही, व्यय अथवा उपभोग पर तो कर लगाया ही जा सकता है। दुनिया के कई अर्थशास्त्रियों इरबिग फिशर, कालडोर, रॉबर्ट हाल तथा शबुशका ने व्यय अथवा उपभोग कर की वकालत की है। अमेरिका के हूबर संस्थान ने हाल में राबुराका फ्लैट कर की संकल्पना को प्रतिपादित किया है। बैंक लेन-देन कर भी एक प्रकार से व्यय कर हैं। यूरोप के देश लाटविया, इस्टोनिया, लिथुआनिआ आदि फ्लैट कर से लाभान्वित भी हुए है। यहां चुनौती भारत के संदर्भ में है। माना जाता है कि 80-85 फीसद लेन-देन बैकों से बाहर होता है। दो फीसद फ्लैट कर लगने पर बैंकों से बाहर लेन-देन और बढ़ सकता है।
अर्थक्रांति का सुझाव है कि 50 से ऊपर के नोटों का प्रचलन बंद कर दिया जाए। इससे लोग मजबूर होकर बड़े लेन-देन के लिए बैंकों में ही आएंगे। दुनिया के कई देशों में बड़े नोटों का चलन न के बराबर है। अर्थक्रांति का प्रस्ताव कठिन हो सकता है, परंतु यह एक नेक विचार है। इसको क्रियान्वित करना कठिन तथा चुनौती भरा है, लेकिन असंभव नहीं। हरित क्रांति,श्वेत क्रांति वाले देश में आर्थिक क्रांति भी संभव है। यदि लोकसभा चुनाव से पहले सैद्वांतिक रूप से आयकर समाप्त करने को सभी राजनीतिक दल तैयार हो जाएं तो नि:संदेह यह भारत की अर्थव्यवस्था तथा कर ढांचे के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी।
 

- डा. दीपक के श्रीवास्तव (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
साभारः दैनिक जागरण