शिक्षा का नॉट फॉर प्रॉफिट होना ही असल समस्या

निजी स्कूलों की महंगी शिक्षा का मुद्दा राजनैतिक गलियारे में हमेशा से ‘हॉट’ रहा है। पिछले लगभग एक दशक के दरम्यान इस मुद्दे ने इतना गंभीर रुख अख्तियार कर लिया कि इस मुद्दे पर पूरा का पूरा चुनावी अभियान केंद्रीत होने लगा। वर्तमान की दिल्ली सरकार तो राज्य में स्कूलों की फीस को सख्ती से नियंत्रित करने के कदम को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर प्रचारित करती है। दिल्ली की देखा देखी महाराष्ट्र, गुजरात, यूपी, हरियाणा, आंध्र प्रदेश सहित अन्य राज्यों ने अपने यहां फीस नियंत्रण कानून लागू कर दिए हैं और कई अन्य राज्य इसी प्रकार का कानून लागू करने की दिशा में प्रयासरत हैं। तर्क यह दिया जाता है कि देश में शिक्षा प्रदान करना और स्कूल संचालन गैरलाभकारी (नॉट फॉर प्रॉफिट) गतिविधि है और इससे मुनाफा कमाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। 

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि निजी स्कूलों की महंगी और हर साल बेहिसाब ढंग से बढ़ती फीस अभिभावकों के लिए बड़ी समस्या है। इस समस्या का समाधान होना ही चाहिए। लेकिन स्कूलों की फीस और पसंद के स्कूलों में अपने बच्चों का दाखिला न दिला पाने से निराश अभिभावकों की संख्या दोनों में होने वाली वृद्धि यह स्पष्ट करने के लिए काफी है कि हमारी शिक्षा प्रणाली के साथ सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देने वाले शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) 2009 लागू होने के बाद से तो समस्या और गंभीर होती चली गयी। ऐसा क्यों हुआ?

एक महान अर्थशास्त्री ने कहा था कि ‘बढ़ती कीमतें समस्या नहीं हैं बल्कि बढ़ती कीमतें तो प्रक्रिया में मौजूद समस्या की सूचक हैं’। नीति निर्धारकों को इस सूचक पर निगाह रखनी चाहिए और इसका समाधान तलाशना चाहिए न कि इसे नियंत्रित कर सूचना प्राप्त करने के स्त्रोत को समाप्त करना चाहिए। 

लोक कल्याणकारी राज्य के नाम पर देश में शिक्षा प्रदान करने जिम्मेदारी सरकार ने अनावश्यक रूप से अपने ऊपर ले रखी है और निजी संस्थानों से केवल उसे अनुपूरित करने की उम्मीद की जाती है।
शिक्षा का अधिकार कानून लागू करने के बाद आवश्यकता ढेर सारे स्कूलों को खोलने की थी। लेकिन सरकार नए ‘गुणवत्ता युक्त’ स्कूल की स्थापना करे, ऐसा विरले ही देखने को मिलता है। जो स्कूल अस्तित्व में हैं भी, वो भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं और ऐसी शिक्षा प्रदान नहीं करते हैं जिससे कि उन्हें ‘अच्छे’ स्कूलों के प्रतिस्पर्धी स्कूल की श्रेणी में रखा जा सके।

उधर, सरकार द्वारा अपने स्कूलों में प्रति छात्र खर्च किए जाने वाली राशि के बराबर या उससे कम खर्च में गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने वाले छोटे व बजट स्कूलों को बंद करने के हर संभव प्रयास किए जाते रहे। ऐसा शिक्षा का अधिकार कानून के तहत बनाए गए गैर जरूरी नियम कानूनों के नाम पर किया गया। सबसे अधिक ऐसे स्कूल बंद हुए जो आरटीई कानून के हिसाब से न्यूनतम भूमि और कमरों की संख्या की अर्हता को पूरा नहीं करते थे।  

आज यह धारणा आम है कि निजी स्कूलों द्वारा प्रदान की जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता सरकारी स्कूलों की तुलना में बेहतर है। इसलिए आश्चर्य की बात नहीं कि लोगों की वरीयता निजी स्कूल के प्रति होती है, भले ही वे अधिक महंगे हों। हालांकि एक सच्चाई यह भी है कि, हमारे पास ‘अच्छे’ निजी स्कूलों की भी भारी कमी है। पर ऐसा क्यों है? दरअसल, देश में ढेर सारे नए गुणवत्ता युक्त स्कूलों के खुलने के लिए प्रोत्साहन का अभाव है।

जरा सोचिए कि एक अच्छे निजी स्कूल को स्थापित करने के लिए किन किन चीजों की आवश्यकता पड़ती है! वाणिज्यिक दरों पर खरीदी गई भूमि, एक आधुनिक स्कूल बनने के लिए जिन जिन चीजों की जरूरत होती है उसके अनुकूल इमारत, फर्नीचर और सबसे महत्वपूर्ण बात अपेक्षित अनुभव और योग्यता वाले शिक्षक। इसके अलावा, तमाम सारे और खर्च हैं जैसे कि रखरखाव पर आने वाली लागत और कर्मचारियों का वेतन जिसमें हमेशा बढ़ोत्तरी होती रहती है। इसके अलावा यदि कोई नया पाठ्यक्रम शुरू करना है या किसी नए शिक्षक को रखना है तो उसमें भी अतिरिक्त लागत लगती है। इसके बाद बारी आती है अंतहीन अनुमतियों और विभिन्न विभागों से अनापत्ति प्रमाण पत्रों के सिलसिले की। दिल्ली जैसे शहर में इन सभी प्रक्रियाओं को पूरा करते हुए एक स्कूल खोलने में आने वाला खर्च कम से कम 10 करोड़ रूपए का होता है।

यह सोंचने वाली बात है कि किसी गैर-लाभकारी क्षेत्र में न्यूनतम 10 करोड़ रूपए का निवेश कौन करे? इसका एक उत्तर यह हो सकता है कि शिक्षा प्रदान करने के लिए स्वप्रेरित लोग! लेकिन समस्या यह है कि स्वप्रेरित लोग, अपने जैसे कुछ अन्य स्वप्रेरित लोगों के साथ अपने छोटे से घर या भूखंड या टेंट के नीचे स्कूल चलाने का ‘नेक’ कार्य शुरू करें भी तो मौजूदा कानून के तहत ऐसा करने की अनुमति नहीं है और स्कूल को बंद करा दिया जाएगा। 

इस प्रकार, स्वप्रेरित लोगों को शिक्षा प्रदान करने के कार्य से बाहर रखकर, करोड़ों रुपए का निवेश करने वाले ‘बड़े’ स्कूलों की राह आसान कर दी जाती है। ध्यान रहे कि इन बड़े स्कूलों के मालिक अधिकतर राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी या उनके रिश्तेदार होते हैं। प्रायः इन स्कूलों द्वारा लिए जाने वाले फीस व अन्य खर्चों के बारे में जानते हुए भी अभिभावक अपने बच्चों का दाखिला यहां कराना चाहते हैं। एक बार जब दाखिला हो जाता है और प्रतिवर्ष फीस वृद्धि होने लगती है तो इसके विरोध में प्रदर्शन करना शुरू कर देते हैं।

प्रत्येक निजी स्कूलों का स्टैंडर्ड फीस निश्चित होता है। समय समय पर उन्हें अपनी तमाम सुविधाओं, शिक्षण पद्धति आदि में सुधार और शिक्षकों-कर्मचारियों की वेतन वृद्धि आदि करनी होती है। रही सही कसर स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर ( ईडब्ल्यूएस) वर्ग के बच्चों के 25 प्रतिशत दाखिले को अनिवार्य बनाने वाले आरटीई ने पूरी कर दी है। इस अधिनियम में ईडब्ल्यूएस छात्रों को दाखिला देने के ऐवज में सरकार द्वारा स्कूलों को भुगतान करने का प्रावधान है, लेकिन क्या सरकार ऐसा करती है? सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है कि किसी भी बच्चे को दूसरे बच्चे की शिक्षा के लिए भुगतान नहीं करना चाहिए, लेकिन वास्तव में यह तब होता है जब सरकार ईडब्ल्यूएस छात्रों के मद में किए जाने वाला भुगतान नहीं करती है या समय पर भुगतान नहीं करती है।

कोई भी राष्ट्र तब तक प्रगति और उन्नति नहीं कर सकता जब तक कि सभी बच्चों के लिए अच्छे स्कूल न हों। ऐसे में बहुत सारे स्कूलों का होना लाजमी है। ढेरों नए सरकारी स्कूलों के आने की उम्मीद बहुत कम है, क्योंकि हमारे यहां के सत्ताधारी स्कूलों और अन्य सामाजिक ज़रूरतों पर खर्च करने के बजाए वोट पाने की उम्मीद में लोकलुभावने ‘लॉलीपॉप’ देने के प्रति अधिक आशक्त हैं।

स्पष्ट रूप से नए स्कूलों के निर्माण की सारी उम्मीदें निजी क्षेत्र पर टिकी हुई हैं, लेकिन ऐसा होने के लिए, सरकार को शुल्क में वार्षिक वृद्धि की सीमा निर्धारित करने के काम से खुद को दूर रखना होगा, साथ ही पूरी तरह से वाणिज्यिक उद्देश्य के तहत खुलने वाले स्कूलों को भी संचालन की अनुमति प्रदान करना होगा। हमें उस मान्यता का परित्याग करना होगा जो यह कहता है कि लाभ कमाना अनैतिक और शोषणकारी है। ऐसे लोगों को समझाने के लिए प्रायः दूरसंचार विभाग का उदाहरण दिया जाता है जहां कभी इनकमिंग कॉल के लिए भी पैसे देने पड़ते थे लेकिन अब सभी प्रकार के आउटगोईंग भी लगभग फ्री हैं। इसके बावजूद कंपनियां मुनाफा कमा रही हैं।  

जितनी अधिक संख्या में स्कूल होंगे, उनके बीच उतनी ही ज्यादा प्रतिस्पर्धा होगी, जो आने वाले समय में, निश्चित रूप से, शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करेगी और उन्हें सस्ती भी बनाएगी। स्कूलों को छात्रों को आकर्षित करने के लिए अपने स्तर को और अधिक निखारना ही होगा। इसका यह फायदा होगा कि महंगे स्कूलों में जाने वाले छात्रों की संख्या जितनी अधिक होगी, उतना ही कम खर्चीले स्कूलों में प्रवेश के लिए दबाव कम होगा। सरकार को बस स्कूलों द्वारा प्रदान की जा रही शिक्षा की गुणवत्ता पर अधिक ध्यान केंद्रीत करना होगा। इसके अतिरिक्त निःस्वार्थ भाव से कार्य करने वाले स्वप्रेरित लोग भी इस क्षेत्र में बने रहें इसके लिए निवेश आधारित नियमन की बजाए बच्चों के सीखने के परिणाम के आधार पर मान्यता देना स्वीकार करना होगा।
 

- संपादक

-फोटो साभारः द हिंदू