कहां जाकर रूकेगी यह दरिंदगी

“नरेला इलाके में घर के बाहर खेल रही 6 साल की बच्ची को बहला फुसलाकर पड़ोसी ने किया बलात्कार। अजमेरी गेट इलाके की 14 वर्षीय छात्रा के साथ अध्यापक द्वारा चार साल से किये जा रहे यौन शोषण मामले का सनसनीखेज खुलासा। सफदरजंग अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था को धता बताते हुए देररात महिला वार्ड में घुसकर गर्भवती महिला के साथ बलात्कार का प्रयास। मुंडका में नाबालिक युवती के साथ पड़ोसी द्वारा बलात्कार। उत्तर पश्चिम जिले के महेंद्र पार्क में रूई मांगने के बहाने सर्वोदय विद्यालय की नौवीं कक्षा की छात्रा के साथ पड़ोसी युवक द्वारा बलात्कार।“

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कोई दिन खाली नहीं जाता जिस दिन अखबार के पन्ने महिलाओं के साथ बलात्कार, यौन शोषण, यौन उत्पीड़न और बर्बर अत्याचार के खबरों से रंगे नहीं होते। यहां तक कि हम इन घटनाओं और खबरों के प्रति इतने आदि हो गए हैं कि युवतियों, महिलाओं पर तेजाब फेंकने, ब्लेड मारने, उस्तरा चलाने जैसी घटनाओं की खबरें तो हमें थोड़ी देर बाद ही याद नहीं रहती। महिलाओं के साथ यहां दिन प्रतिदिन बढ़ते अपराध के मामलों ने ही इसे “रेप कैपिटल” जैसी अनचाही संज्ञा दिला दी है। यह हाल तो तब है जबकि प्रदेश एवं राष्ट्रीय राजधानी होने के नाते यहां की सुरक्षा व्यवस्था कागज पर ही सही देश के अन्य राज्यों से बेहतर मानी जाती है। आश्चर्य की बात तो यह है कि दिल्ली में राष्ट्रीय और दिल्ली महिला आयोग के मुख्यालय सहित महिला सशक्तिकरण मंत्रालय जैसे भारी भरकम व्यवस्था होने के बावजूद हम महिलाओं को सुरक्षा मुहैया कराने और उनके मन में विश्वास पैदा करने में असक्षम हैं। इससे जहां देश की महिलाओं में असुरक्षा की भावना घर कर रही है वहीं दुनिया भर में हमारा सिर शर्म से झुक रहा है।

यह सही है कि महिलाओं और लड़कियों का यौन शोषण विश्व भर में युगों से चली आ रही सामाजिक बुराई है, किंतु जहां तक लैंगिक सुरक्षा का सवाल है तो पिछले सप्ताह की कुछ घटनाएं भारत विशेषकर राष्ट्रीय राजधानी के लिए खासतौर पर चिंताजनक हैं। एक के बाद एक मामलों में शासन-प्रशासन और समाज की उदासीनता मर्यादा का उल्लंघन करने वाले तत्वों का दुस्साहस बढ़ाने का काम कर रही है। बड़ा और बेचैन करने वाला सवाल यह है कि क्या यह अपरिवर्तनीय रवैया बन गया है और क्या आम भारतीय सामान्य तौर पर शासन और विशेष तौर पर पुलिस की विकृत मानसिकता को लेकर बेपरवाह हैं? अगर ऐसा है तो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को अपना सिर शर्म से झुका लेना चाहिए कि वह आधी आबादी को जीने की मूलभूत अवस्थाएं प्रदान करने में भी अक्षम है। हम महिलाओं को सुरक्षा मुहैया करा पाने में विफल रहे हैं और उन्हें यह अहसास नहीं करा पाए हैं कि 21वीं सदी में भी वे हीन और असुरक्षित नहीं हैं। 9 जुलाई को गुवाहाटी में बेहद शर्मनाक घटना हुई। बाजार में लड़की पर हमला किया गया, छेड़छाड़ की गई और उसके कपड़े तक फाड़ दिए गए। वह भी अनेक लोगों के सामने। आदत के मुताबिक पुलिस घटनास्थल पर तब पहुंची जब सबकुछ समाप्त हो चुका था जबकि पुलिस स्टेशन घटना वाली जगह से मात्र कुछ सौ मीटर की ही दूरी पर स्थित था। तिस पर वहां के पुलिस अधिकारियों का यह कहना कि वे एटीएम कार्ड नहीं हैं कि सूचना मिलते ही घटना स्थल पर पहुंच जाए। भला हो, एक पत्रकार ने पूरी घटना को कैमरे में कैद कर लिया और इसे सोशल मीडिया यानी इंटरनेट पर प्रसारित कर दिया। इसके बाद मचे हंगामे से मजबूर होकर असम सरकार ने जांच का आदेश दिया।

हालांकि यह भी देखने में आया है कि मनचले सिर्फ सुनसान इलाकों में ही नहीं बल्कि सार्वजनिक स्थानों व भीड़भाड़ वाले जगहों पर भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आते। ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि वर्तमान कानून और पुलिस व्यवस्था उनके मन में डर पैदा करने में असक्षम रही है। इसके अतिरिक्त मौके पर उपस्थित लोगों की असंवेदनशीलता ने समस्या को बढ़ाने का ही काम किया है। गुवाहाटी प्रकरण में भी यह स्पष्ट तौर पर देखने को मिला कि घटना के दौरान जो स्थानीय लोग वहां मौजूद थे वे तमाशबीन बने रहे और कुछ तो इस असहाय लड़की के साथ छेड़छाड़ में शरीक भी हो गए।

मीडिया में आई दूसरी घटना यौन शोषण की सामान्य प्रवृत्ति का विस्तार और उपरोक्त घटना से भी अधिक शर्मनाक है। धनबाद की एक लड़की पर नौ साल पहले तेजाबी हमला किया गया था, जिस कारण उसकी बाईं आंख व कान खराब हो गए तथा चेहरा बुरी तरह विकृत हो गया। इस मेधावी कॉलेज छात्रा पर उसके तीन पड़ोसियों ने इसलिए तेजाब डाल दिया, क्योंकि उसने उनकी अश्लील हरकतों और छेड़छाड़ का विरोध करने का साहस दिखाया था। लड़की अबतक न्याय के लिए दिल्ली में एक मंत्री से दूसरे मंत्री व एक राजनैतिक दल से दूसरे राजनैतिक दल के कार्यालय के चक्कर काटने को मजबूर है। यह मामला इस बात का सूचक है कि भारत के अधिकांश हिस्सों में कानून लागू करने वाली एजेंसियां यौन हिंसा के शिकार व्यक्तियों को त्वरित न्याय दिलाने में या तो अक्षम हैं या फिर अनिच्छुक। इस जघन्य हमले को अंजाम देने वाले नौजवानों का दुस्साहस इस हद तक बढ़ा हुआ था कि उन्होंने पीडि़त लड़की और उसके परिजनों को जान से मारने धमकी देते रहे। अब गरीबी और हताशा के कारण लड़की ने सरकार इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी है। व्यापक परिप्रेक्ष्य में भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2011 में इस प्रकार के मामलों की संख्या 2.25 लाख थी। इससे भी अधिक बेचैन करने वाली प्रवृत्ति यह है कि राज्य का सरकारी तंत्र महिलाओं के यौन शोषण पर अंकुश लगाने के बजाय इसे एक प्रकार से बढ़ावा देता है। मीडिया ने पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के खजूरदाह स्थित सुधार गृह में चल रही खौफनाक कहानी की ओर ध्यान खींचा है। इस तथाकथित सुधार गृह में महिलाओं और लड़कियों का बर्बरता से सालों से यौन शोषण किया जा रहा था। इस अपराध में बालगृह के कर्मियों की मिलीभगत थी। दिन ढलने के बाद इन लड़कियों पर, जिनमें कुछ शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग हैं, कहर टूट पड़ता था। यौन शोषण के अलावा उनकी बर्बरतापूर्वक पिटाई की जाती थी। ऐसे ही बर्बर हमले में एक 32 साल की महिला की मौत हो गई। आधुनिकता के इस बदरंग चेहरे ने पूरे भारत को कलंकित कर दिया है।

इन घटनाओं का सामाजिक मानकों तथा व्यवहार पर गहरा असर पड़ता है। लैंगिक समीकरण इससे बड़े पैमाने पर प्रभावित हुआ है। बाजार की शक्तियों और आक्रामक उपभोग अभियान का दबाव नवीन विज्ञापनों के जरिये मुखर हुआ है, जिसमें स्ति्रयों के तन को कामोत्तेजना के उपकरण के तौर पर प्रदर्शित किया जाता है। भारत के बहुत से ग्रामीण भागों में मोबाइल फोन वैश्वीकरण और आधुनिकता का एक प्रकार का सोपान बन गया है और इसने महिलाओं की मुक्ति के साथ-साथ दासता में भी बड़ी भूमिका निभाई है। राष्ट्रीय राजधानी से लगे उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के असारा गांव की खाप पंचायत के फरमान ने महिलाओं की अस्मिता को खतरे में डाल दिया है। प्रेम विवाह और मोबाइल फोन पर लड़के-लड़कियों की बात से परेशान होकर खाप पंचायत में जमा हुए इलाके के बुजुर्गो ने प्रेम विवाह के खिलाफ आदेश पारित कर दिया। यही नहीं, 40 साल से कम उम्र की महिलाओं को खरीदारी के लिए अकेले बाजार जाने पर प्रतिबंध लगा दिया और उन पर मोबाइल पर बात करने की पाबंदी लगा दी। इस घटना से तालिबान की याद आना स्वाभाविक है। जिस प्रकार भारतीय अर्थव्यवस्था की सेहत पर स्टॉक एक्सचेंज की चाल तथा राष्ट्रीय राजकोषीय घाटे के आधार पर निगाह रखी जाती है और देश की आंतरिक सुरक्षा वामपंथी उग्रवाद और माओवादियों की गतिविधियों से प्रभावित होती है उसी प्रकार महिलाओं और लड़कियों की समाज में स्थिति सामाजिक सुरक्षा का सबसे बड़ा संकेतक होती है। कन्या भ्रूण हत्या के मामले में देश का विश्व में प्रमुख स्थान है और दिल्ली का देश में। कन्या भ्रूण हत्या जैसे जघन्य अपराध को बढ़ावा देने में आधुनिक प्रौद्योगिकी का भी बड़ा हाथ है। आज राष्ट्रीय राजधानी महिलाओं के लिए भारत में सर्वाधिक असुरक्षित स्थान बन गई है। महिलाओं के उत्पीड़न की प्रवृत्ति देश को पतन की तरफ ले जा रही है। महिलाओं के प्रति अपराधों और खासतौर पर यौन शोषण की घटनाओं को प्रकाशित-प्रसारित करके मीडिया सराहनीय कार्य कर रहा है, किंतु इन घटनाओं पर अंकुश तभी लगेगा जब सरकार और सिविल समाज, दोनों इसके प्रति गंभीर होंगे। अभी तक तो इस मामले में दोनों की सक्रियता ही नजर नहीं आती।

- अविनाश चंद्र