एक रैली सुधारों के पक्ष में

दिल्ली में आए दिन रैलियां होती रहती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि दिल्ली और रैलियों का चोली दामन का साथ है। हर पार्टी और संगठन दिल्ली में विशाल  रैली कर लाखों की भीड़ जुटाना चाहता है  ताकि सारे देशभर  में उसका संदेश पहुंचे। इस नजरिये से पिछले 4 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई कांग्रेस की  रैली ऐतिहासिक थी। ऐतिहासिक इसलिए क्योंकि पहली बार किसी राजनीतिक पार्टी ने आर्थिक सुधारों और खासकर खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के समर्थन में इतनी विशाल रैली की । उसके पक्ष में भारी जनसमर्थन  जुटाने की कोशिश की।आप कह सकते हैं कि इसमें क्या खास बात है सभी राजनीतिक दल अपने कार्यक्रम के पक्ष में रैलियां करते ही रहते हैं। लेकिन आर्थिक सुधारों के मामले में यही पेच रहा है। यदि कम्युनिस्ट पार्टियों को छोड़ दे तो भारत की कोई भी पार्टी आर्थिक सुधारों के खिलाफ नहीं हैं। उनमें आर्थिक सुधारों के विस्तृत ब्यौरे को लेकर मतभेद हो सकते हैं लेकिन इस देश को तेज गति से रफ्तार से विकास के लिए आर्थिक सुधार जरूरी हैं इसे सभी मानते हैं। कांग्रेस भी आर्थिक सुधारों के पक्ष में है और विपक्षी भाजपा भी। दोनों दावे करते है कि उन्होंने अपने शासनकाल में सुधारों को लागू किया है। सभी सुधारों के कारण हुए विकास का श्रेय लेने को भी आतुर रहते हैं।आखिर क्यों न हों यह बिल्कुल सूर्य प्रकाश की तरह स्पष्ट है कि  देश में पिछले दो दशकों में जो तेज गति से विकास हुआ है उसका  एकमात्र कारण है आर्थिक सुधार।

लेकिन आर्थिक सुधारों की दारुण शोकांतिका यह है कि सभी गैर कम्युनिस्ट पार्टिया आर्थिक सुधारों की हिमायती तो हैं  लेकिन वे कभी सुधारों को अपना नारा नहीं बनातीं,कभी उसे चुनावी मुद्दा नहीं बनाती । उन्हें लगता है कि आर्थिक सुधार विकास के क्षेत्र में चमत्कार कर सकता है लेकिन चुनाव के क्षेत्र में नहीं । सुधारों को वे ऐसी जटिल आर्थिक संकल्पना मानते हैं जिसके तर्कशास्त्र को लोगों को समझाना मुश्किल है। वह बौद्धिक रूप से भले ही तर्कसंगत हो मगर उसमें भापनात्मक अपील नहीं है जो वोटरों को वोटिंग बूथ तक खींचकर ला सके।और राजनेताओं के लिए तो चुनावी मुद्दा वहीं होता है जो उन्हें जो उन्हें वोट दिलवा सके चुनावी वैतरणी पारकराकर सत्ता की मंजिल तक पहुंचा सके। इसलिए उन्हें जाति –धर्म या गरीबी हटाओं जैसे भावुकता पूर्ण मुद्दे ज्यादा रास आते हैं । या मुफ्त बिजली,कर माफी,रंगीन टीवी देने  जैसे रेवडिया बांटनेवाले मुद्दे कारगर लगते हैं जबकि ये मुद्दे ऐसे होते हैं जो तात्कालिक लाभ भले ही पहुंचा दें मगर देश की दीर्घकालिक आर्थिक समस्याओं का तो एकमात्र समाधान आर्थिक सुधार ही हैं। इसके बावजूद राजनीतिक दलों को कभी नहीं लगा कि वह राजनीतिक नारा बन सकता है।

पी वी नरसिंहा राव को भारत के आर्थिक सुधारों का मसीहा माना जाता है लेकिन वे और उनकी पार्टी सुधारों के मुद्दे पर चुनाव जीतकर नहीं आए थे। लेकिन उनके द्वारा किए सुधार के नतीजे इतने स्पष्ट थे कि बाद में आई अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने भी उन्हें उतनी ही शिद्दत से आगे बढ़ाया। इसका ही नतीजा था कि समाजवादी युग में जो भारत तीन प्रतिशत की विकास दर भी बड़ी मुश्किल से हासिल कर पाता वह 8 प्रतिशत की विकास दर हासिल कर सका।लेकिन इन दोनों को ही चुनाव में मुंहकी खानी पड़ी । नतीजतन यह मान लिया गया कि सुधार जरूरी  हैं मगर चुनावों में  इन्हें मुद्दा न बनाया जाए इसमें ही भलाई है। नतीजा यह हुआ कि राजनीतिक दलों ने सुधारों को लेकर जन जागरण का अभियान चलाया ही नहीं। उन्होंने अपने वोटरों को कभी बताया ही नहीं कि किस तरह सुधार उनकी जिंदगी को बदल रहे हैं , उसे बेहतर बना रहे है।और इसलिए इन्हें तेजी से लागू करने की जरूरत है और यह उनके समर्थन के बगैर संभव नहीं है।

तेजी से विकास के लिए किस तरह सुधार अनिवार्य है इसकी एक मिसाल यूपीए -2 के दौरान देखने को मिली। जब मनमोहन सरकार ने राजनीतिक मजबूरियों के चलते सुधारों पर लगाम लगा दी तो उसका असर विकास दर पर दिखाई दिया और विकास दर को फिर ऊंचा उठाने के लिए मनमोहन सरकार को सुधार की दिशा में तेजी से कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा। जिसका कई पार्टियां अपनी संकीर्ण राजनीति के कारण विरोध कर रही हैं। तब कांग्रेस को भी महसूस हुआ कि अब उसे सुधारों के मुद्दे को लेकर जनता के बीच जाना होगा। उसे यह बताना होगा कि सुधार क्यों जरूरी है। ताकि सुधारों के पक्ष में विशाल जनसमर्थन पैदा किया जा सके। यही सोचकर सुधारों को मुख्य मुद्दा बनाकर रामलीला मैदान में कांग्रेस ने रैली की  । यह एक महत्वपूर्ण फैसला था। एक नई शुरूआत थी जिसकी कई दशकों से आवश्यकता महसूस की जा रही थी। कांग्रेस ने सही समय पर इसे पूरा किया । यदि हम सुधारों की जरूरत और उससे मिलनेवाले नतीजों के बारे में जनता को समझा सके तो सुधारों के पक्ष में एक ऐसा जनमत तैयार किया जा सकता है जो सुधारों की गति को तेज करेगा। इतना ही नहीं यदि विरोधी ताकते सुधारों को रोकने की कोशिश करेंगी उन्हें मुंहतोड़ जवाब भी मिलेगा।बेशक कांग्रेस की रैली इस दिशा में एक महत्वपूर्ण  और सराहनीय शुरूआत है । क्योंकि लोकतंत्र में जनसमर्थन ही आर्थिक सुधारों के निरंतरता की सबसे बड़ी गारंटी हो सकता है।

- सतीश पेडणेकर