गरीब राजुराम और निजी स्कूलों की लूटपाट

राजस्थान के छोटे से गांव का राजुराम । बड़ी मुश्किल से अपनी पढाई पूरी की और बीएड करने के लिए जब पेसो का बंदोबस्त नहीं हुआ तो बुढे पिता ने अपना खेत बेच कर पेसो का इंतजाम किया । इस आस में कि सरकारी नोकरी लग जायेगी तो परिवार को दो जून की रोटी नसीब हो जायेगी । लेकिन बदकिस्मती से खूब कोशिस करने के बावजूद भी नोकरी नहीं मिल पाई । तब तक विवाह भी हो गया और दो लडकिया और एक लड़का भी हो गया ।
 
बेरोजगारी का दंश झेलते राजुराम की पत्नी ने बच्चों का एक स्कूल खोलने की सलाह दी । राजुराम ने अपनी बीवी के गहनों को बेचकर किसी तरह एक छोटा सा विद्यालय खोला । बड़ी परेशानी से चद्दर के दो हॉल बनाये और शहर में शिक्षा ऑफिस के बाबूजी को अपने ससुराल से 5000 रुपये लाकर दीये और मान्यता ली । ह्रदय में सपने संजोये राजुराम की पत्नी ने गोबर की गार नीप आँगन तैयार किया । दीवार को काला कर बच्चों के लिए 2 श्याम पट्ट तैयार किये । घर घर घूम राजुराम ने स्कूल का प्रचार प्रसार किया । बच्चों को स्कूल भेजने के लिए लोगो को हाथ जोड़े गिन्नते की । बड़ी मुश्किल से 30 प्रवेश हुए तो परिवार को कुछ आस बंधी । बड़ी मेहनत से राजुराम बच्चों को पढ़ाता तो उसकी पत्नी सुबह जल्दी उठकर स्कूल की साफ सफाई करती ।
 
जब लोगो ने देखा की गांव के सरकारी स्कूल के बच्चों को अक्षर ज्ञान भी नहीं है लेकिन राजुराम की स्कूल के बच्चों को किताब पढना और गणित में पहाड़े जोड़ बाकी गुना भाग आ रहे है । तो गाँव वालो ने बच्चे भेजना शुरू किया । स्कूल में 110 बच्चे हो गए थे । राजुराम ने पास के गाँव एक बीएड किये हुए मोहन को भी लगा दिया ।राजुराम छूटी के बाद भी कमजोर बच्चों को लेकर बैठता और उन्हें बड़ी मेहनत से पढ़ाता। अब लग रहा था कि शकुन ने दो वक्त की रोटी मयस्सर हो रही है । लेकिन राजुराम की हँसी ख़ुशी से चल रही जिंदगी को किसी की बुरी नजर लग गई । गाँव के सरकारी माड़साब ने बताया कि राजुराम तुम्हारे स्कूल की फीस निर्धारित हो गई है और अब तुम्हे 30 प्रतिशत कम फीस लेनी है ।
 
राजुराम पर विपदा का पहाड़ टूट गया । गाँव में ऐसे भी बड़ी मुश्किल से लोग फीस जमा करवाते है । कहते है परदेश में गया लड़का आएगा तब फीस जमा करवायेगे । अब कैसे स्कूल चलेगा । पूरा परिवार बड़ी मेहनत से गुजारा कर रहा था और अब सरकार के इस फरमान ने तो राजुराम की नींद उड़ा दी । किस तरह मोहन को वेतन देगा और कैसे स्कूल चलाएगा । बड़ी मुश्किल से जिस स्कूल रूपी बगिया को पाला पोषा अब उस छोटी सी बगिया का क्या होगा । राजुराम के परिवार की आँखो में आँसू शायद समुन्द्र को भी चुनोती दे रहे थे । उन्हें दो जून की रोटी बच्चों से दूर होती नजर आ रही थी । अखबार में छपा था स्कूल की लूटपाट के कारन सरकार ने ये कानून बनाया । राजुराम रुदे गले से कह रहा था यहाँ पर क्या लूटपाट होती है पुरे परिवार की पुरे दिन की मेहनत के बाद सात आठ हजार बच पाते है क्या ये भी लूटपाट है । राजुराम की पत्नी रोते हुए बोली लोग कहते थे अच्छे दिन आएंगे क्या यही अच्छे दिन है ।
 
अब कौन मीडिया को समझाए आप रोज रोज उन बड़ी बड़ी स्कूल के लिए छापते हो और बेचारा राजुराम का परिवार घोर निराशा में चला जाता है । क्या उन आँसुओ का कोई जवाब है उनके पास । कौन सरकार को समझाए की वो स्वयं जनता की गाढ़ी कमाई के पेसो से 14000 में एक बच्चे को पढ़ाती है वो भी बिना आखर ज्ञान वाला और बेचारा राजुराम 1500 से 2000 में पुरे साल मेहनत से बच्चे को पढ़ाता है तो लूट कोण सरकार रही है या राजुराम । कोण उन फीस कमेटी के सिपहसालारों को समझाए कि महानगरों के ऎसी ऑफिसो में बेठे हुए कंप्यूटर के फॉर्मूलों से राजुराम की बगिया का मूल्य तय नहीं हो सकता। जाकर उस राजुराम की पत्नी की भावना को महसूस करो जो सूरज की पहली किरण से पहले बड़ी भावना से स्कूल को साफ कर फटी हुई दरी को सील कर बिछाकर उन नन्हे मेहमानो के स्वागत को आतुर हो जाती है । क्या तुम्हारे कंप्यूटर का फार्मूला उस कष्ट भरी जिंदगी का दाम तय कर सकता है । कमेटी को लाखों रुपये लेने वालों की फीस तय करने की कोई जल्दी नहीं थी लेकिन राजुराम उन्हें बड़ा लुटेरा लगा जिसका दमन करना जरुरी था । अब कौन समझाए इन कलम के मसीहा को कि करोड़ो की लूटपाट करने वाले तो किसी तरह बच जायेंगे लेकिन बेचारा राजुराम का परिवार तबाह हो जायेगा । 
 
- संजय गर्ग के फेसबुक वॉल से साभार

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