जब राजाजी ने अचानक खाद्यान्नों की राशनिंग समाप्त करने की घोषणा कर दी

पहले भारतीय गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी "राजाजी" की पुण्यतिथि पर विशेष

राजाजी को अप्रैल 1952 के प्रथम सप्ताह में मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई, और उन्होंने कम्युनिस्टों को छोड़कर सभी समूहों के सहयोग को आमंत्रित किया। जब विधानसभा की पहली बार बैठक हुई तो सभा में विश्वास प्रस्ताव पेश करते हुए राजाजी ने यह स्पष्ट कर दिया कि कम्युनिस्ट ही वास्तव में उनके प्रमुख शत्रु हैं। राजाजी के तीखे शब्दों को यहां पुनः पेश किया गया हैः

मैं यहां पर अपने देश को कम्युनिस्ट पार्टी के फंदों और खतरों से बचाने के लिए आया हूं। शुरू से अंत तक यही मेरी नीति रही है। मैं अपना दांव यहां सदन पटल पर रख रहा हूं। मैं आपका प्रथम शत्रु हूं और मैं आपसे कह रहा हूं कि आप भी मेरे प्रथम शत्रु हैं, यही मेरी नीति है। कम्युनिस्टों पर किए गए इस सीधे वार का नाटकीय प्रभाव हुआ। कम्युनिस्टों को छोड़कर सभी ने उन्हें अपना विश्वास मत दिया और उन्हें आसानी से बहुमत हासिल हो गया। हालांकि उनका पहला भाषण गैर लोकतांत्रिक और संसद के विरुद्ध माना गया। बाद में, उन्होंने कम्युनिस्टों के लिए मैत्रीपूर्ण भाषण देकर इस व्यवहार में सुधार कर लिया, और कम्युनिस्टों ने भी बाद में प्रशासन की योग्यता के लिए उनकी पर्याप्त प्रशंसा की।

उस समय राशनिंग प्रणाली चलन में थी और खाद्यान्नों की आवाजाही पर कड़े प्रतिबंध लागू थे। प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन आठ औंस चावल (घटिया स्तर का) ही मिलता था। विवाह के निमंत्रणों पर यह टिप्पणी लिखी होती थी, “कृपया अपने साथ अपना राशन कार्ड लेकर आएं।” हालांकि कोई भी अपना राशन कार्ड साथ नहीं लाता था, फिर भी विवाह के नियमित कार्यक्रम चलते रहते थे। यह प्रतिबंध पूर्ण रूप से 1938 से 1942 की अवधि के दौरान युद्धकाल में लगाए गए थे। परंतु यह बाद में स्थायी हो गए थे। इन प्रतिबंधों के बावजदू बेहतर क्वालिटी का चावल हर किसी के घर पर उपलब्ध रहता था, जिसे नेल्लूर आदि जैसे पड़ोसी राज्यों से चोरी छिपे लाया जाता था, और इससे संबंधित अधिकारियों का विशेष ध्यान रखा जाता था। लेकिन इस व्यवस्था ने हर किसी को खुश कर रखा था। उपभोक्ताओं को उनकी मनपसंद वस्तु मिल जाती थी, और “अवैध” दुकानदारों का व्यवसाय खूब फल-फूल रहा था। साथ ही बिचौलिये भी अच्छा मुनाफा कमा रहे थे और राशन की दुकानें कम तौलकर लाभ उठा रही थीं। इस व्यवस्था में केवल मूल्यों का पतन हो रहा था।

चूंकि राजाजी एक चतुर प्रेक्षक थे, वे जानते थे कि देश में खाद्यान्नों का पर्याप्त भंडार है और खाद्य नियंत्रण एवं उससे संबंधित कर्मचारियों ने ही यह कृत्रिम कमी पैदा की हुई है। साथ ही इस भ्रष्ट प्रणाली के इर्द गिर्द निर्मित शक्तिशाली निहित स्वार्थ को तोड़ना आसान काम नहीं है।

अतः एक रात उन्होंने बिना किसी सूचना के आकाशवाणी पर यह घोषणा कर दी कि खाद्यान्न की राशनिंग और खाद्यान्नों से सभी प्रकार के प्रतिबंध तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिए गए हैं। और उन्होंने किसी को भी इस स्थिति का लाभ उठाने का कोई अवसर ही प्रदान नहीं किया। अनेक अर्थशास्त्रियों और सिविल अधिकारियों ने खाद्यान्नों की कमी तथा भूख से होने वाली मौतों की भविष्यवाणियां कीं। राजाजी इससे बिल्कुल ही विचलित नहीं हुए और उन्होंने जवाब दिया कि वे अपने देश तथा अपने लोगों को अच्छी तरह से जानते हैं। ना तो अनाज की कमी हुई और न ही भूख के कारण किसी की मृत्यु ही हुई। इसके उलट, जो भी कार्य चोरी छिपे किया जा रहा था, वह खुलेआम किया जाने लगा और खाद्यान्नों की कीमतों में भी गिरावट होने लगी। संभवतः नियंत्रण के उन्मूलन के साथ राजाजी का यह पहला प्रयोग था और यह “परमिट कोटा लाइसेंस राज” के विरुद्ध उनके भविष्य के अभियान का परीक्षण था।

उन्होंने जमींदारों और उनके लिए खेती करने वाले श्रमिकों के बीच होने वाले निरंतर झगड़ों तथा अनेक कृषक खेतिहरों को उनकी जमीन से गैर औचित्य के आधार पर बेदखल किए जाने के कारण विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में कम्युनिस्टों की लोकप्रियता में हो रही निरंतर वृद्धि पर भी विचार किया।

कृषकों के लाभ के लिए राजाजी ने “ऋण राहत कानून” लागू किया, जिसमें उस स्थिति में कृषक के ऋणों की समाप्ति हो जाती थी, जब उसके द्वारा वास्तविक रूप से उधार ली गई मूल राशि की दो गुना राशि भुगतान ब्याज और मूलधन के रूप में किया जा चुका हो। इसके अतिरिक्त, उन्होंने “पन्नायर अधिनियम” नामक एक अन्य अधिनियम भी लागू किया, जिसके अनुसार भूमि से होने वाली कृषि पैदावार को भूमि के स्वामी और खेतिहर मजदूर के बीच 60ः40 के अनुपात में बांटा जाता था। और इस तरह उन्होंने खेती करने वाले श्रमिक की गैर औचित्यपूर्ण बेदखली को समाप्त कर दिया। इसके बावजूद यदि गैर औचित्यपूर्ण बेदखली की जाती थी तो उस भूमि में किराये पर श्रमिकों को खेती करने की मंजूरी दी जाती थी। कृषि श्रमिकों की मजदूरी में भी वृद्धि की गई। हालांकि इन व्यवस्थाओं पर भू-स्वामियों द्वारा काफी विरोध किया गया लेकिन उन्होंने उन्हें आश्वस्त किया कि उन्हे कम परंतु निश्चित लाभ अवश्य मिलेगा। इसके साथ ही उनके लिए संतुष्ट श्रमिक एवं मजदूर अधिक महत्वपूर्ण हैं। इस उपाय ने उनके बीच के विवादों का समाधान कर दिया और कम्युनिस्ट पार्टी की लोकप्रियता भी कम कर दी। यही एक मुख्य कारण था कि आज भी तमिलनाडु में कम्युनिस्टों के लिए मजबूत आधार मौजूद नहीं है।

- जी. नारायणस्वामी द्वारा लिखित “राजाजीः निश्चित लक्ष्य संजोए एक व्यक्ति” से साभार