सम्राट के नए कपड़े

खुद को बदलें राहुल और कांग्रेसी

 

मुझे याद आता है कि स्कूल में मैंने एक नाटक में भाग लिया था। नाटक था, 'सम्राट के नए कपड़े।' कथा एक निर्वस्त्र राजा के आसपास घूमती है, जो सोचता था कि उसने विशेष प्रकार के वस्त्र पहन रखे हैं। उसके दरबार के चापलूस उससे सहमत थे और इतने अद्भुत कपड़े पहनने के लिए उसे बधाई दे रहे थे। जब राजा सड़क पर निकला तो उससे डरे हुए लोग भी उसके नए पहनावे की तारीफ करने लगे। आखिर में एक मासूम बच्चे की निगाह उस पर पड़ी और वह जोर से चिल्लाया, 'अरे! इस राजा ने तो कोई कपड़े ही नहीं पहन रखे हैं!!'

चिल्लाकर कहे इस वाक्य ने पूरे शहर को सदमे में ला दिया। हालांकि, कोई सच से इनकार नहीं कर सकता था। अंतत: दरबारियों व शहर के लोगों के झूठ का पुलिंदा खुल गया था और सम्राट भी होश में आ गया। कांग्रेस पार्टी को वह बच्चा चाहिए। पार्टी में ऐसा कोई जो सच को जोर से चिल्लाकर कहे। ऐसा कोई जो शायद अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के राष्ट्रीय अधिवेशन में जोर से चिल्लाकर कहे, 'अरे! देखो तो राहुल गांधी तो बिलकुल काम ही नहीं कर रहे हैं।' ऐसा कहने के बाद छाए सन्नाटे को महसूस किया जा सकता है। बिलकुल वैसा ही सन्नाटा जैसा उस सम्राट को सच सुनाने के बाद शहर में छा गया था। अब ऐसा सुनना कोई खुश कर देने वाली बात तो नहीं है। पहली प्रतिक्रिया में तो बात खारिज कर दी जाएगी। मुमकिन है उस आदमी पर हमला ही कर दिया जाए। अभी तो इस स्तंभकार पर ही उच्चवर्गवादी, पक्षपाती, मूर्ख, दुष्ट, पैसे देकर खरीदा गया, अज्ञानी या आपकी कल्पना में और भी कोई विशेषण हों तो वे सब लगा दिए जाएंगे। हालांकि, जैसे स्पेनिश-अमेरिकी गायक एनरिक का गीत कहता है, आप भाग सकते हैं, आप छिप सकते हैं, लेकिन मेरे प्यार से बच नहीं सकते (इस मामले में सच से)।

सच खासतौर पर इसलिए कड़ुवा है क्योंकि कांग्रेस को पता नहीं है कि यह समस्या कैसे सुलझाए। जैसा कि कई लोग कहते हैं कि यदि यह खानदान अपना करिश्मा न दिखाए तो कांग्रेस है क्या? यह सवाल ही पार्टी के चरित्र का उथलापन जाहिर करता है। गांधी परिवार के बिना कांग्रेस की कल्पना से छूटने वाली कंपकंपी को समझा जा सकता है। फिलहाल तो हालत यह है कि गांधी परिवार की विरासत को भुनाने के अलावा कांग्रेस में ज्यादा कुछ बचा नहीं है। यही तो पार्टी करती रही है। इसने गांधी परिवार का नाम लेकर इसे भुनाया तो है पर इसमें जोड़ा कुछ भी नहीं है। अपनी अक्षमता छिपाने, यहां तक कि घोटाले दबाने के लिए इसका दुरुपयोग किया है। खानदान का ब्रांड इतना घिस चुका है कि अब इसमें कोई चमक नहीं बची है।

नई पीढ़ी को समझ में नहीं आता कि इस परिवार का करे क्या। क्या उन्हें गांधी परिवार को बलिदान से जोडऩा चाहिए या उन लोगों से जो चुप्पी साधकर भ्रष्टाचार को दबाने में मददगार साबित होते हैं? क्या गांधी परिवार के सदस्यों की रुचि भारतीयों की जिंदगी को बेहतर बनाने में है या वे केवल खुद को बचाने भर में लगे हुए हैं? इन सवालों के जवाब क्या हैं? यदि जवाब हैं तो उन्हें मजबूती देने वाला व्यवहार कहां है? बड़ा गड़बड़ मामला है और युवा पीढ़ी को ऐसा कोई कारण नजर नहीं आता जिससे कांग्रेस को गांधी परिवार के नाम पर वोट पाने का हकदार माना जाए? जो नतीजा आया है वह सबके सामने है।

वाकई, कांग्रेस ने गांधी परिवार का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर लिया है। इस विरासत का खत्म होते जाना पार्टी के लिए बहुत बड़ा नुकसान है। अब उन्होंने गहरा आत्मपरीक्षण करने का वादा किया है। शायद इस दौरान वे खुद से सवाल पूछें कि क्या घोटालों पर चुप्पी लगाए रखना पार्टी की सबसे बड़ी विरासत को दांव पर लगाने लायक था? इससे भी बड़ा सवाल तो यह है कि खोई चमक को फिर कैसे हासिल किया जाए? जब कोई विरासत नष्ट होती है तब या तो आप इसे फिर से निर्मित कर बहाल करते हैं या नई विरासत बनाते हैं। दोनों बातें आसान नहीं हैं। इसमें वक्त लगेगा। यदि कांग्रेस दोनों काम करती है तो यह इसके लिए बहुत अच्छा होगा। पहली बात तो यह है कि कांग्रेस को गांधी परिवार के गौरव को पुनर्स्थापित करने की जरूरत है। इसके लिए उन्हें मौजूदा वक्त के मुताबिक खुद को ढालना होगा, प्रासंगिक बनना होगा। अब दुनिया बदल चुकी है। मीडिया का व्यापक विस्तार, बढ़ती कनेक्टिविटी और उसके जरिये फैलती जानकारी का मतलब है कि अब छानबीन का स्तर पहले से कहीं ज्यादा ऊंचा हो गया है। निगरानी रखने वाली आंखें अब ज्यादा चौकस हैं। सच्चाई देखते ही पहचान ली जाती है। अब इसका ढोंग नहीं किया जा सकता। चतुराई से बोले गए शब्द या बहुत सोच-समझकर अपनाई गई चुप्पी का ढोंग भी गले पड़ सकता है।

राहुल को खुद को ईमानदार और लोगों की भलाई के बारे में सोचने वाला बताने की जरूरत नहीं है, उन्हें ऐसा बनकर दिखाना होगा। यदि किसी नए राहुल की संभावना है तो हम कुछ ही हफ्तों में उसे देखना चाहेंगे। कांग्रेस में वरिष्ठ नेताओं को सार्वजनिक रूप से अपमानित कर पार्टी से निकालने की जरूरत है। उन्हें नहीं जो चुनाव हार गए हैं बल्कि उन्हें जिन्होंने पार्टी की विरासत को ठिकाने लगा दिया है। नकली नहीं, एक अच्छे भ्रष्टाचार विरोधी कानून को पारित करने की आवश्यकता है। राहुल को जरूरत के वक्त गायब रहने के लिए माफी मांगनी चाहिए। उन्हें देश के लिए वह उत्साह, वह जुनून दिखाना होगा जो और किसी में नजर नहीं आए। साफ कहें तो उन्हें अच्छा राजनेता तो बनने की जरूरत है ही, लेकिन एक अच्छा आदमी बनने की जरूरत भी है।

देश में बदले माहौल में व्यक्तित्व की अच्छाई एक बड़ी मांग है। वे लोगों से, मीडिया से बात करें। पत्रकारों को इंटरव्यू दें और नौबत आए तो शर्मनाक परिस्थितियों का भी सामना करे और इस सबसे गुजकर और इसके बावजूद अच्छे नतीजे देकर दिखाएं। गांधी परिवार को आज की अराजकता और गलतियों की जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी। उन्हें युवाओं के सपने पूरे करने के लिए दिन-रात काम करना होगा। चुनाव के वक्त वोट कबाडऩे के लिए सरकारी खजाना खाली करने वाली धुर्ततापूर्ण योजनाएं नहीं चलेंगी। उन्हें पूरे राष्ट्र के लिए 'आदर्श' बनकर दिखाना होगा। क्या वे इस सबके लिए तैयार हैं?

दूसरी बात, कांग्रेस को भी नई विरासत तैयार करनी होगी। सबसे अच्छा काम करने वालों के समूह को सत्ता व अधिकार मिलने चाहिए। गांधी परिवार नैतिक केंद्र तो हो सकता है पर सत्ता का केंद्र न बने। अच्छा प्रदर्शन करने वाले शीर्ष मुख्यमंत्री, मंत्री और सांसदों को वह महत्व मिलना चाहिए जिसके वे हकदार हैं। परिवार को पीछे रहकर अन्य लोगों को सामने लाना चाहिए। इस तरह से और अधिक कांग्रेसजन फोकस में आएंगे और पार्टी नेतृत्व और व्यापक होगा। ये बातें आसान तो नहीं है, लेकिन असंभव भी नहीं है। बड़ी बात तो यह है कि क्या कांग्रेस ऐसा चाहती है? क्या इसके पास खुद को पुनर्निर्मित करने का साहस और इच्छाशक्ति है? और किसी की तो बात क्या, सम्राट में उस बच्चे की बात सुनने का साहस है, जो सच कह रहा है?

 

- चेतन भगत (लेखक प्रख्यात उपन्यासकार हैं)

साभारः दैनिक भास्कर