संरक्षणवाद से नहीं कोई फायदा

वाशिंगटन पोस्ट के स्तंभकार मैट मिलर ने वैश्विक पूंजीवाद के बारे में कुछ समय पहले एक टिप्पणी दी जिस में उन्होने कहा कि "वैश्विक पूंजीवाद के चलते चीन, भारत सहित अन्य विकासशील देशों में करोडो लोग गरीबी से बाहर निकल कर अपना स्तर सुधार तो रहे हैं पर आंशिक रूप से ये परिवर्तन अमीर देशो के कई हज़ार वर्करों की नौकरियां जाने की वजह से संभव हो पाया है".

ये सच है कि पूंजीवाद की वजह से कुछ विशेष प्रकार की नौकरियों ख़तम हो जाती हैं. (ये नौकरियां ज़्यादातर पहले पूंजीवाद से ही जन्मी होती हैं). पर ये खात्मा सिर्फ विदेश व्यापार की वजह से ही नहीं होता. इस का प्रमुख कारण टेक्नोलोजी के क्षेत्र में होता रहता विकास है. उदाहरण के तौर पर सन 1831 में साइरस मेककोरमिक द्वारा इजाद की गयी फसल काटने की मशीन ने अमेरिका में खेतिहर मजदूरों की नौकरियां छीन लीं. ये मजदूर पहले हाथों से फसल काटा करते थे और अब उनका काम करने के लिए एक सुविधाजनक मशीन आ गयी थी. इस परिवर्तन में गलत क्या था? इसी तरह आने वाले समय में टाइपिस्टों की नौकरियां पर्सनल कम्प्यूटरों और लेज़र प्रिंटरों की वजह से चली गयीं और जो फेफड़ो के लिए लोहे की मशीन बनाते थे उनकी नौकरियां नए ज़माने में इजाद हुए टीकों की वजह से चली गयीं.

इसी तरह से विदेश व्यापार से गयी हुई नौकरियों को दूसरे दृष्टिकोण से देखना चाहिए. इन नौकरियों का अंत असल में वैज्ञानिक व तकनीकी विकास और उपभोक्ताओं की चोइस के चलते हुआ है.  मिलर का ये कहना कि ये एक असुखद सच है एक गलत अवधारणा है. नौकरियां ख़तम करने वाली तकनीकें दरअसल पूरे विश्व में एक सौगात की तरह मनाई गयी हैं और इसी तरह मुक्त व्यापार और उस से जुड़े परिणामो का भी हमें खुले दिल से हर्ष के साथ स्वागत करना चाहिए.

डराने धमकाने और संरक्षणवाद में ज्यादा फर्क नहीं है. दोनों ही किसी एक को फायदा पहुंचाने के लिए बल का प्रयोग करते हैं (या तो सीधे सीधे या कानून के ज़रिये).  अगर आप किसी अमेरिकी को उसकी सेवाओं के लिए  20  डालर प्रति घंटा के हिसाब से अदा करते हैं जब कि उसी काम के लिए कोई मेक्सिकन डालर लेता है तो उसे पैसे  ऐठना कहा जाता है. वहीँ अगर एक मुक्त व्यापार संधि के तहत मेक्सिको से आप कुछ भी कम दामों पर खरीदते हैं तो वह अमेरिकी जॉब मार्केट के लिए गलत माना जाता है. हमे समझना होगा कि मुक्त व्यापार समस्त विश्व की समृद्धता के लिए एक आवश्यक कदम है.

- स्निग्धा द्विवेदी