निजी क्षेत्र में आरक्षण का सवाल

कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में कहा है कि निजी क्षेत्र में जाति-आधारित आरक्षण लागू करने के लिए राष्ट्रीय सहमति बनाई जाएगी। सपा तथा बसपा पहले ही आरक्षण के हिमायती रहे हैं। भाजपा भी मूल रूप से इसके पक्ष में है यद्यपि क्रीमी लेयर को आरक्षण से बाहर करना चाहती है। पूरे देश में आरक्षण जारी रखने के प्रति राजनीतिक सहमति दिखती है।
 
जाति जैसी समस्या अनेक देशों में है। मलेशिया में मलय भूमिपत्रों तथा चीनियों के बीच खाई थी। व्यापार चीनियों के हाथ में था, जबकि बहुमत भूमिपुत्रों का। सत्तर के दशक में वहां यूनिवर्सिटी के दाखिलों तथा सरकारी नौकरियों में भूमिपुत्रों के लिए आरक्षण लागू किया गया। हाल में प्रधानमंत्री रजाक ने आरक्षण की मात्र में कटौती की है। साथ-साथ व्यापार के अवसर तथा ट्रेनिंग को भूमिपुत्रों के लिए विशेष पैकेज बनाया गया है। दक्षिण अफ्रीका में नस्लवाद की समाप्ति के बाद अश्वेत लोगों के लिए आरक्षण किए गए थे। सालिडेरिटी द्वारा किए गए अध्ययन में कहा गया है कि आरक्षण के प्रभाव से ब्लैक संभ्रांत मध्य वर्ग स्थापित हो गया है। बहुसंख्यक ब्लैक लोग घोर गरीबी में ही जीवन यापन कर रहे हैं। इन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिला है। संस्था का सुझाव है कि आरक्षण के स्थान पर स्किल डेवलपमेंट पर ध्यान देना चाहिए।
 
1965 में अमेरिकी राष्ट्रपति जानसन ने शासनादेश जारी किया था जिसके अनुसार सरकारी एवं निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनियों के लिए सभी नागरिकों को बराबर अवसर देना अनिवार्य बना दिया गया था। ब्लैक नेता मार्टिन लूथर किंग की यह प्रमुख मांग थी। इसी शासनादेश में आरक्षण को गैर कानूनी बताया गया था। 1969 में राष्ट्रपति निक्सन ने सरकारी ठेकेदारों में ब्लैक लोगों की प्राथमिकता को लागू किया था। इस प्रकार के कदमों का परिणाम है कि आज अमेरिका में अश्वेत राष्ट्रपति ओबामा सत्तारूढ़ हैं। अमेरिका का अनुभव बताता है कि बिना आरक्षण के पिछड़े वर्गो का उत्थान संभव है, बल्कि ऐसा भी संभव है कि आरक्षण न होने के कारण ही उस देश में अश्वेत लोगों की स्थिति में सुधार हुआ है। समाज का ध्यान अश्वेत लोगों की क्षमता में विकास हासिल करने पर केंद्रित रहा, न कि आरक्षण की बैसाखी के सहारे आगे बढ़ाने का। वैश्विक सोच आरक्षण से हटकर पिछड़ों की क्षमता में सुधार पर ध्यान देने की ओर मुड़ रही है। इसी क्रम में भारतीय उद्यमियों ने निजी क्षेत्रों में आरक्षण का विरोध किया है। उन्होंने सुझाव दिया है कि पिछड़े वर्गो के लोगों के लिए शिक्षा के अवसर बढ़ाए जाएं तथा उन्हें रोजगार देने को टैक्स में छूट दी जाए। टैक्स के इंसेंटिव से ज्यादा संख्या में पिछड़े वर्गो को रोजगार मिल सकेगा।
 
महात्मा गांधी भी आरक्षण को पसंद नहीं करते थे। वे मानते थे कि हम आरक्षण के माध्यम से पिछड़े वर्गो के ऊपर पिछड़ी जाति का ठप्पा लगा देंगे। सामान्य नागरिक के रूप में जीने के लिए यह अड़चन बन जाएगी। गांधीजी ने डॉ. अंबेडकर के आग्रह पर अल्प समय के लिए आरक्षण को स्वीकार किया था। डॉ. अंबेडकर को भय था कि शिक्षा तथा रोजगार जैसे कार्यक्रम प्रभावी नहीं होंगे, क्योंकि देश में जातिवाद की जड़ें बहुत गहरी थीं। अब परिस्थिति बदल गई हैं। हमारे दलित भाई तमाम उच्च पदों पर आसीन हैं। अब जरूरत है कि हम आरक्षण से स्किल डेवलपमेंट की ओर आगे बढ़ें। आसान ऋण जैसे कार्यक्रम स्थापित करें। दरअसल आरक्षण को जारी रखने में नेताओं और सरकारी कर्मियों का स्वार्थ निहित है। वर्तमान व्यवस्था में इन्हें भारी वेतन के साथ-साथ भ्रष्टाचार से भारी आय हो रही है। आम आदमी तुलना में गरीब बना हुआ है। इनके लिए चुनौती है कि गरीब का ध्यान गरीबी से भटकाकर कहीं और केंद्रित किया जाए। यह भटकाव आरक्षण के माध्यम से किया जा रहा है। गरीब खपरैल के मकान में रहता है और 300 दिन 10 घंटे मेहनत करता है। सरकारी टीचर मुश्किल से 200 दिन चार घंटे काम करते हैं। फिर भी उन्होंने आलीशान चारमंजिला पक्का मकान बनाया है। इस आक्रोश को आरक्षण के माध्यम से नरम किया जा रहा है।
 
आरक्षण दो तरह से काम करता है। पिछड़े वर्गो के श्रेष्ठ युवाओं को आरक्षण के माध्यम से शोषक वर्ग में जोड़ लिया जाता है। आज दलित आइएएस अधिकारी उच्च वर्गो से साझा करके दलितों का शोषण करने में लगे हुए हैं। दलितों में जो प्रखर युवा होते हैं वे सरकारी नौकरी पा जाते हैं और उच्च वर्गो के साथ जुड़ जाते हैं। दूसरे, आम दलित का ध्यान नेताओं द्वारा किए जा रहे आर्थिक शोषण से हटकर ऊंची जातियों द्वारा किए जा रहे सामाजिक अत्याचार की ओर मुड़ जाता है। समाज को दलित और उच्च जातियों के बीच बांट दिया गया है। चतुर बिल्ली ने दो कुत्तों की लड़ाई सुलझाने के बहाने रोटी को चटकर लिया था। इसी प्रकार नेताओं और सरकारी कर्मियों का अपवित्र गठबंधन समाज का विभाजन कर अपना हित साध रहा है। इस गठबंधन में व्यापारी वर्ग जूनियर पार्टनर है। उसे आरक्षण पसंद नहीं है। उसे अकुशल कर्मियों को भर्ती करना पड़ा तो उसकी लागत ज्यादा आएगी और उसका धंधा चौपट हो जाएगा।
 
कांग्रेस द्वारा निजी क्षेत्र में आरक्षण की घोषणा करने के बाद ऐसी प्रतिक्रिया तमाम व्यापारिक संगठनों की तरफ से आई हैं, परंतु इस मुद्दे पर सत्तारूढ़ नेताओं का सामना करने की उनकी क्षमता नहीं है। अतएव सरकार जैसा कहेगी वैसा करने को व्यापारी-उद्यमी वर्ग तैयार रहता है। इसलिए मैं इन्हें मंत्रियों और सरकारी कर्मियों के अपवित्र गठबंधन का हिस्सा नहीं मानता हूं। देश के नेताओं को अपने क्षुद्र स्वार्थ से ऊपर उठना चाहिए। फलों का जूस पिलाकर सत्ता हासिल करनी चाहिए, न कि शराब पिलाकर। इस दिशा में दो कदम उठाने चाहिए। पहला यह कि बड़ी संख्या में निजी क्षेत्र में उच्च स्तर के रोजगार बनाने की महत्वाकांक्षी योजना बनानी चाहिए। श्रम कानूनों के सरलीकरण के साथ-साथ कम संख्या में श्रमिकों को रोजगार देने वाले उद्यमों पर ‘बेरोजगारी टैक्स’ लगाना चाहिए। पिछड़े वर्ग के लोगों को रोजगार देने पर टैक्स में छूट देनी चाहिए। ऐसा करने से पूरे समाज के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। दूसरे, सरकारी कर्मियों के वेतन में भारी कटौती करनी चाहिए।
 
2012 में देश के नागरिक की औसत आय 61 हजार रुपये थी। आज 70,000 रुपये होगी। क्लास थ्री के सरकारी कर्मी का वेतन इतना निर्धारित करना चाहिए। ऐसा करने पर दलित युवकों के लिए सरकारी नौकरी का मोह नहीं रहेगा, उन्हें शोषक वर्ग में सम्मिलित नहीं किया जा सकेगा और वे दलितों के सर्वागीण विकास की मांग करेंगे। नेताओं और सरकारी कर्मियों के इस भ्रष्ट और अपवित्र गठबंधन को तोड़ने की जरूरत है।
 
 
- डा. भरत झुनझुनवाला
(लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)

Add new comment

Filtered HTML

  • Lines and paragraphs break automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <blockquote> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.

Plain text

  • No HTML tags allowed.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Lines and paragraphs break automatically.