उद्यमशीलता को मिलना चाहिये बढावा

कुछ हफ्तों पहले मैंने ‘द सोशल नेटवर्क’ देखी। अद्भुत फिल्म है और इसका असर मेरे दिलो-दिमाग से अब तक गया नहीं है।

द एक्सीडेंटल बिलियनेअर्स किताब पर आधारित यह फिल्म सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक के निर्माण की कहानी बताती है। इसमें आधी हकीकत है और आधा फसाना। फिल्म तो खैर बहुत अच्छे ढंग से बनाई ही गई है, इसकी कहानी और भी ज्यादा शानदार है।

फेसबुक बनाने वाला शख्स मार्क जकरबर्ग अभी मात्र 26 बरस का है और दुनिया का सबसे नौजवान अरबपति है। छह साल पहले मार्क ने अपने कॉलेज हॉस्टल से फेसबुक की शुरुआत की थी। आज उसकी निजी स्वामित्व वाली कंपनी का कुल मूल्य 50 बिलियन डॉलर (2,20,000 करोड़ रुपए) होगा।

फिल्म इस लिहाज से नई जमीन तोड़ती है कि यह प्रतिभा के बारे में है, प्रतिभाशाली लोगों ने बनाई है और प्रतिभा का जबरदस्त सम्मान करने वाले एक देश के लिए बनाई गई है।

यह सिर्फ अमेरिका में ही हो सकता है कि एक लड़का जिसने जिंदगी के बीस बसंत भी नहीं देखे हैं, अचानक भीड़ से निकलकर आता है, एक कंपनी खड़ी करता है, जो छह साल में अरबों डॉलर की कंपनी बन जाती है और सारा देश उस पर एक फिल्म बनाकर इस कामयाबी का जश्न मनाता है।

दिलचस्प यह है कि फेसबुक बनाते वक्त मार्क ने कभी पैसा बनाने के बारे में नहीं सोचा था। उसके सिर पर कुछ नया करने की धुन सवार थी। वह कुछ ऐसा करना चाहता था जो ‘कूल’ हो। एक जगह वह कहता है, ‘पैसे, या पैसा बनाने की काबिलियत से यहां कोई इंप्रेस नहीं होता।’

भारत के यशस्वी व्यवसायियों से इसकी तुलना कीजिए। हमारे मशहूर कारपोरेट शहंशाह (कुछ अपवादों को छोड़कर) दूसरी या तीसरी पीढ़ी के उद्योगपति हैं, जो एक-दूसरे से असंबद्ध दर्जनों व्यवसाय वाले औद्योगिक साम्राज्य चला रहे हैं।

पारंपरिक प्रबंधन की थ्योरी जानने वाला कोई भी व्यक्ति आश्चर्य करेगा कि एक कंपनी फूड, टेलीकॉम, पॉवर, निर्माण और वित्त जैसे क्षेत्रों में एक साथ कैसे है। लेकिन भारत में ऐसे विशाल औद्योगिक साम्राज्य फल-फूल रहे हैं, क्योंकि इसके लिए जिस हुनर की जरूरत है, वह इन कंपनियों के प्रमोटर्स के पास प्रचुरता से है और वह है भारतीय सरकार के ब्लैक बॉक्स को चलाना।

चाहे वह पॉवर प्लांट लगाने की अनुमति हो या खेती की जमीन को व्यावसायिक मकसद के लिए बदलना या बैंक अथवा शराब की दुकान खोलने का लाइसेंस प्राप्त करना। हमारे शीर्ष बिजनेस प्रमोटर्स वह सब कर सकते हैं, जो आम हिंदुस्तानी कभी नहीं कर पाता। इसी तरीके से वे अरबों बनाते हैं। हम उन्हें इनामों से लाद देते हैं, टॉप टेन की फेहरिस्तों में रखते हैं और नौजवानों के रोल मॉडल की तरह पेश करते हैं।

हकीकत में वे आइकॉन नहीं हैं। उन्होंने एक पक्षपातपूर्ण तंत्र का निजी फायदे के लिए दोहन किया है और उन अवसरों को हड़प लिया है, जो बराबरी की स्थितियों में किसी आम नौजवान को मिलते। भारतीय कंपनियां भाड़ा वसूलने वाले बर्ताव से पैसा बनाती हैं, वे नियामकों तक पहुंचने के रास्तों में कृत्रिम रुकावटें पैदा करती हैं और इस तरह नई शुरुआत करने वालों के हाथ से संपदा निर्माण के मौके हथिया लेती हैं।

हाल में जिन टेक्नोलॉजी ने दुनिया को बदला और संपदा निर्मित की - टेलीकॉम, कंप्यूटर, एविएशन - उनमें से एक भी भारत में नहीं जन्मी। फिर भी हमारे प्रमोटर्स ने उनसे पैसा बनाने के रास्ते निकाल लिए। उन्होंने दबंगई से अपना हिस्सा वसूला, टेक्नोलॉजी का नियंत्रित वितरण किया और आधुनिक युग के हीरो बनकर उभरे। जबकि असल में वे हीरो नहीं।

अरबों के मालिक होने के बावजूद युवाओं के मुहावरे में उन्हें लूजर्स या पराजित ही कहा जा सकता है। अगर वे लूजर्स नहीं हैं तो उन्होंने कभी सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठाई? हमारी कारपोरेट कंपनियां कार्टेल या गठजोड़ बनाकर उपभोक्ता को लूटने से पहले जरा नहीं सोचतीं, पर भ्रष्ट राजनेताओं के खिलाफ वे कभी कार्टेल नहीं बनातीं।

वे राडिया टेपों के लीक होने को लेकर कोहराम मचाते हैं, पर उनमें दर्ज वीभत्स बातचीत पर कभी विचार तक नहीं करते। हमारी किसी भी ब्लू चिप कंपनी के पास सेलफोन जैसी टेक्नोलॉजी के आविष्कार की क्षमता नहीं है, पर स्पेक्ट्रम आवंटन से पैसा बनाने के लिए कूद पड़ने का अवसरवाद उनमें कूट-कूटकर भरा है। अंतरराष्ट्रीय निवेशक यह जानते हैं। वे भारत की क्षमताओं से वाकिफ हैं, पर यह भी समझते हैं कि कारपोरेट-राजनीतिक गठजोड़ किस तरह दरअसल भारत को गरीब बनाए रखता है, अमीर नहीं बनाता।

इसे ठीक किया जा सकता है। सच कहूं तो अगर भारत को महान राष्ट्र बनना है तो इसे ठीक करना ही होगा। इस भाई-भतीजावाद का जबरदस्त बुरा असर पड़ता है। इसकी कीमत अक्सर नई शुरुआत करने वालों को तमाम कठिनाइयों और कमजोरियों से चुकानी पड़ती है। इससे अर्थव्यवस्था का आधार संकुचित रह जाता है। इसे ठीक करने में कारपोरेट, सरकार और लोगों, तीनों को अहम भूमिका निभानी होगी।

पहला, जो कुछ अच्छे कारपोरेट हैं, उन्हें भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के खिलाफ कार्टेल बनाना होगा। अगर प्रमोटर्स सार्वजनिक घोषणा करें कि उनका बिजनेस समूह रिश्वत नहीं देगा, तो इससे जबरदस्त संदेश जाएगा। नई ईजादों के बल पर प्रतिस्पर्धा करें, रिश्वत के बल पर नहीं। मौजूदा अरबपति अपनी संपदा को लेकर इतराना बंद करें। वे अमेरिका के उन 57 सबसे अमीर अरबपतियों को देखें (हां, इनमें मार्क जकरबर्ग भी शामिल हैं), जिन्होंने अपना आधे से अधिक धन जनकल्याण के लिए देने का वायदा किया है।

दूसरा, हमारी सरकार को भारतीय उद्योगों की रक्षा का अर्थ समझना होगा। इसका अर्थ मौजूदा धनपतियों की रक्षा करना नहीं है। वह तो स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देकर किया जा सकता है। भारतीय उद्योगों की रक्षा का अर्थ है ऐसी नीतियां जो नई भारतीय कंपनियों की आगे बढ़ने में मदद करें, ऐसा वातावरण जिसमें नए उद्यमियों का गुणगान हो और वंशानुगत राजकुमारों को ऊंची पायदानों पर न रखा जाए। नई ईजाद कूल हैं, उत्तराधिकार नहीं।

तीसरा, हम भारतीयों को परजीवी अरबपतियों की तारीफ और महिमामंडन बंद करना होगा। वे भले ही तकनीकी रूप से कुछ गैरकानूनी न कर रहे हों, पर संबंधों का लाभ उठाकर कुछ ऐसा हासिल करना, जो आप निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा में हासिल नहीं कर सकते, कूल नहीं है। हमें धन, उपभोग और सत्ता का जश्न नहीं मनाना चाहिए।

हमें नए कामों और उद्यमशीलता का जश्न मनाना चाहिए। हां, कुछ बिजनेसमेन हमें नौकरियां देते हैं और इसकी बदौलत कुछ लोगों में हमने संपन्नता को बढ़ते देखा है। हो सकता है अब हमारे यहां दस लाख अमीर भारतीय हों। लेकिन यह काफी नहीं है। सही बिजनेस माहौल हो तो भारत नाटकीय रूप से बदला हुआ देश हो सकता है जिसमें हम सभी की जिंदगी बेहतर होगी, केवल कुछ लोगों की नहीं।

- चेतन भगत