स्कूलोँ को मुनाफा नहीं कमाने देंगे तो नुकसान हमारे बच्चोँ का ही होगा

नए साल में नया संकल्प लेने का वक्त आ गया है। ऐसे में मैं एक नियम में सुधार की बात करूंगी, जो मेरे हिसाब से इस साल के लिए सबसे महत्वपूर्ण विषय है और वह है शिक्षा क्षेत्र को स्वतंत्रत किया जाए और स्कूलोँ को लाभ कमाने का अवसर दिया जाए।

250 मिलियन से भी अधिक छात्रोँ के साथ, भारत में स्कूल जाने वाले छात्रोँ की संख्या किसी भी देश के मुकाबले सबसे अधिक है। और सभी छात्रोँ की शैक्षिक जरूरतेँ पूरी करने के लिए यहाँ पर्याप्त स्कूल भी हैं। मगर, दुर्भाग्य की बात यह है कि भारत में सरकारी स्कूल या तो जीर्ण शीर्ण अवस्था में पहुंच चुके हैं अथवा पूरी तरह निष्क्रिय हो चुके हैं। प्राथमिक स्तर की शिक्षा पूरी कर चुके अधिकांश छात्र बमुश्किल ही साक्षर हैं। हालत इतनी खराब है कि, 5वीँ कक्षा के छात्र भी अंकगणित के साधारण से सवाल नही सुलझा सकते हैं। भारत के गरीब माता-पिता को अपने बच्चोँ की शिक्षा के लिए या तो पैसे चुकाने पड़ते हैं अथवा उन्हेँ फ्री वाले सरकारी स्कूल में भेजते हैं। सबसे अधिक निंदनीय बात यह है कि सरकारी शिक्षा प्रणाली की खामियोँ के प्रमाण हासिल करना कठिन है।

जहाँ अधिकतर भारतीय देश की सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली की विफलता से वाकिफ हैं, वहीँ प्राइवेट स्कूलोँ की बढ़ती संख्या, खासतौर से कम खर्च वाले अधिकतर स्कूल संज्ञान में नहीँ आ पाते हैं। प्राइवेट स्कूल न सिर्फ शहरी बल्कि ग्रामीण इलाकोँ में भी लाखोँ लोगोँ का जीवन और जीविका सुरक्षित करने का काम कर रह रहे हैं, जो अगले कुछ सालोँ में देश के कामगार वर्ग में शामिल होंगे। पब्लिक स्कूलोँ को चलाने के लिए लगने वाले आवश्यक खर्च की तुलना में बेहद कम संचालन खर्च वाले प्राइवेट स्कूल एक बेहतर और कम खर्चीला विकल्प उपलब्ध करा रहे हैं।

गीता गांधी किंगडन की वर्ष 2017 की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में स्कूलिंग से सम्बंधित चार प्रकार के कारक अथवा प्रवृतियां दिखाई देते हैं, जो आधार बनाने के लिए सबसे उपयुक्त हैं। पहला, काफी बड़ी संख्या में छात्र पहले ही प्राइवेट स्कूलोँ में एनरोल हो चुके हैं; 49% शहरी और 21% ग्रामीण बच्चोँ ने वर्ष 2014-15 में प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा ली थी। दूसरा, वर्ष 2010-11 से वर्ष 2014-15 के बीच सरकारी स्कूलोँ की तुलना में प्राइवेट स्कूलोँ की संख्या में 4-5 गुना की बढ़ोत्तरी हुई है। तीसरा, इसी समय के दरम्यान सरकारी स्कूलोँ में होने वाले नामांकन की संख्या में 11.1 मिलियन की गिरावट आई, जबकि प्राइवेट स्कूलोँ में होने वाले नामांकन 16 मिलियन तक बढ़ गए। अंततः ये प्राइवेट स्कूल अमीर बच्चोँ के सरकारी स्कूलोँ से निकलने का कारण नहीं बन रहे हैं; शहरी प्राइवेट स्कूलोँ की माध्यिका (मीडियन) फीस 500 रुपये प्रति माह और ग्रामीण इलाकोँ में 275 रुपये प्रति माह थी।

सबसे रोचक बात यह है कि भारत में प्राइवेट स्कूलोँ का तेज विकास उस दौर में हुआ है जब शैक्षिक उद्यमिता के लिए यहाँ सबसे प्रतिकूल वातावरण है। सरकार ने प्राइवेट स्कूलोँ की मान्यता के लिए बेहद कठिन नियम लागू किए हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) के तहत, एक बार मान्यता मिल जाती है तब इन स्कूलोँ के लिए अपने यहाँ 25% सीटेँ सामाजिक व आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लिए आरक्षित करनी पड़ती है। और समय-समय पर, जज और नौकरशाह गैर मान्यता प्राप्त कम-खर्च वाले स्कूलोँ को बंद करने अथवा ढहाने का फरमान जारी करते रहते हैं। इन सभी कारणोँ से, प्राइवेट स्कूल, अपने समकक्ष सरकारी प्रतिष्ठानों से काफी बेहतर होने के बावजूद गरीब बच्चोँ के लिए बेहतर शैक्षिक विकल्प मुहैया नहीं करा पाते हैं। कम-खर्च वाले प्राइवेट स्कूलोँ का लर्निंग आउटकम भी उनके समकक्ष सरकारी प्रतिष्ठानों के मुकाबले काफी बेहतर रहता है। सरकारी स्कूलोँ में विभिन्न स्तर पर कई विभिन्नताएं (वैरिएशंस) देखने को मिलती हैं और लेकिन अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा की यहां कोई गारंटी नहीं होती है।

तमाम अवरोधों एवं रुकावटोँ के बावजूद, प्राइवेट स्कूलोँ में फ्री के सरकारी स्कूलोँ के मुकाबले कहीँ अधिक संख्या में नामांकन हो रहे हैं। ऐसे में कितना अच्छा होगा यदि इन रुकावटों को दूर कर दिया जाए जिससे हजारोँ प्राइवेट स्कूल फल-फूल सकेंगे। अगर भारत में अन्य क्षेत्रोँ के उदारीकरण को एक उदाहरण के तौर पर ले लिया जाए तो, यह निश्चित तौर पर समझा जा सकता है कि इससे गुणवत्ता में व्यापक बदलाव आता है, कीमतोँ में कमी आती है और नवाचार (इनोवेशन) को बढ़ावा मिलता है। भारत एक ऐसे दौर से भी गुजरा है जब फोन के एक कनेक्शन के लिए लोगोँ को सालोँ इंतजार करना पड़ता था जबकि आज यहाँ दुनिया में सबसे अधिक सेल्युलर कनेक्शन इस्तेमाल किए जा रहे हैं। गुणवत्ता और कीमतोँ में सुधार के साथ-साथ उदारीकरण ने भारतीयोँ के लिए नवाचार के जरिए बाजार में तमाम विकल्प भी मुहैया कराया है। यही जरूरत हमेँ शिक्षा के क्षेत्र में भी है; उच्च गुणवत्ता, कम कीमत और शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार व प्रयोग।

शिक्षा क्षेत्र में उदारीकरण का पहला चरण है स्कूलोँ को लाभ कमाने का अवसर मिलना। भारत में उदारीकरण के बाद लाभ के उद्देश्योँ को मान्यता मिल चुकी है मगर आज भी अधिकतर लोग यह मानते हैं कि शिक्षा जैसे ‘महत्वपूर्ण’ और ‘धर्मार्थ’ कार्य को मुनाफा कमाने की नियत से अलग रखा जाना चाहिए। यहाँ तक कि गैर लाभकारी मौजूदा प्राइवेट शिक्षा के सिस्टम में भी ये ही माता-पिता की प्राथमिक पसंद हैं। भारत में निजी शिक्षा की बढ़ती मांग को सफलतापूर्वक पूरा करने का तरीका यही है कि शैक्षणिक संस्थानों को मुनाफा अर्जित करने की अनुमति दे दी जाए।

स्कूलोँ को मुनाफा कमाने से रोकने के पीछे जो सबसे आम दलील होती है, वह है माता-पिता को स्वार्थी पूंजीपतियोँ से सुरक्षित रखना। वास्तव में, भारतीय माता-पिता और बच्चोँ को लाभ कमाने वाले स्कूलोँ से सुरक्षा की जरूरत नहीं है। दरअसल, मुनाफा कमाने वाले प्राइवेट स्कूल सही ढंग से संचालित हों यह सुनिश्चित कराने का एक ही उपकरण है और वह है; घाटे का डर (अर्थात छात्रों को खोने का डर)। यही आवेग छात्रों को अच्छी और गुणवत्ता युक्त शिक्षा उपलब्ध कराने का मार्क प्रसस्त करता है। आजकल के माता-पिता इतने समझदार हैं कि वे यह समझ सकते हैं कि स्कूल को चलाने में काफी खर्च आता है और अगर कोई स्कूल उनकी गाढ़ी कमाई के पैसे लेकर बेहतर शिक्षा नहीं मुहैया कराएगा तो वे अपने बच्चोँ को वहाँ से बाहर निकालने और बेहतर विकल्प अपनाने में हिचकेंगे नहीँ। उन्होने सरकारी स्कूल सिस्टम से अपने बच्चोँ को निकालकर पहले ही अपनी बुद्धिमानी का परिचय दे दिया है।

आने वाली पीढ़ी को अच्छी और पर्याप्त शिक्षा न दे पाने का हमें बहुत बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ेगा। हर साल भारत में सरकारी स्कूलोँ में सुधार होने का इंतजार करते हुए लाखोँ भारतीय सीखने का अवसर गंवा देते हैं। इससे उन्हें जीविका अर्जित करने का साधन नहीं मिल पाता है और इस कारण अपने जीवन को समृद्ध करने का अवसर भी उनसे छिन जाता है। आज अगर ये बच्चे अशिक्षित और बेरोजगार रह गए तो एक या दो दशक बाद देश में सामाजिक स्तर पर बहुत अधिक असमानता देखने को मिल सकती है और अराजकता जैसे माहौल का सामना कर पड़ सकता है। हर भारतीय माता-पिता और बच्चे अपनी पसंद की और अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा हासिल करने के अधिकारी हैं। 

शिक्षा के क्षेत्र में उदारीकरण से, भारत उन सभी 250 मिलियन बच्चोँ को कल्पना की उड़ान प्रदान करते हुए शिक्षा में नवाचार का दरवाजा खोल सकता है जो अगले दो दशक में देश के कार्यबल का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने वाले हैं। ऐसा कर पाने में अगर हम सफल नहीं रहे तो बहुत बड़ी आपदा की नींव पड़ेगी जिसे झेलना पूरे देश को पड़ेगा। अगर हम स्कूलोँ को लाभ का अवसर नहीं देंगे तो नुकसान हमारे बच्चोँ का ही होगा।

 

- श्रुति राजगोपालन

(साभारः लाइवमिंट)
https://www.livemint.com/Opinion/UHeLb5RCpBtCiBmhBuKUHI/2018-resolution-...

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