कृषि की समस्याएं और सरकारी समाधान

इंटरनेशनल फूड पालिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैश्विक भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स) के मुताबिक भारत 109 देशों की सूची में 103वें स्थान पर है और 20 करोड़ अन्न के अभाव का शिकार हैं। यह बात पक्के तौर पर कही जा सकती है कि सरकार के नीतिगत हस्तक्षेप इस भूख और भुखमरी का प्रमुख कारण है। मेरा मानना है कि सरकार के नीतिगत हस्तक्षेप से जो विकृतियां या असंतुलन पैदा होते हैं वे व्यापक समूह को प्रभावित करते हैं। इस विकृति या दुष्प्रभाव से निबटने के लिए सरकार नए हस्तक्षेप लागू करती है। इससे अंतहीन सरकारी हस्तक्षेपों का सिलसिला शुरू होता है जो आर्थिक विकास की उपेक्षा करता है और असंतुलन को आगे बढ़ाता है।
अक्सर सरकारें कीमतों पर नियंत्रण के नाम पर बाजार पर वर्चस्व कायम करती है जो मांग और आपूर्ति में असंतुलन का कारण बनता है। इसके बावजूद साम्यवादी और समाजवादी हमेशा सरकारी नीतियों के बजाय बाजार को दोषी सिद्ध करने पर उतारु रहते हैं।
इसका बहुत कारगर उदाहरण भारत के खाद्यान्न बाजार में देखने को मिलता है। जहां सरकारी नीतियों की नाकामियों के कारण -भोजन का अधिकार– का प्रावधान करना पड़ा। पहले के कदमों के कारण पैदा हुई समस्याओं को हल करने के लिए सरकार द्वारा अनाज के मामले में हरेक को दी जानेवाली मात्रा तय कर दी गई है।
इस दुखद कहानी के लिए कई सरकारी नीतियां दोषी है लेकिन हम शुरूआत करते हैं सार्वजनिक वितरण प्रणाली से। इसमें राजनीतिज्ञों से जु़ड़े और राजनीतिज्ञों द्वारा संरक्षित लोगों द्वारा अनाज की कालाबाजारी के कारण नुक्सान और हेराफेरी होती है। वर्तमान प्रणाली में लगभग 50 प्रतिशत अनाज भ्रष्टाचार या बर्बादी का शिकार हो जाता है।
यहां हम बाजार में विकृति या असंतुलन की भारी कीमत चुकाने की बात को एक तरफ रखकर इस बात पर गौर करें कि सरकारी अधिकारियों ने अपनी बनाई समस्याओं का इलाज करने के लिए खाद्यान्न गारंटी योजना शुरू की थी।
एक खराब योजना को सुधारने और राशन की दुकानों को जानेवाले अनाज में हेराफेरी को रोकने के लिए राशन कार्ड की जटिल व्यवस्था तैयार की गई थी। इसके अलावा 50 किलो की स्टैंडर्ड पैकेजिंग की जाती है। गोदामों से राशन की दुकानो तक आनाज ले जानेवाले वाहनों पर जीपीएस की प्रणाली का इस्तेमाल किया जाता है।
लेकिन उपभोक्ताओं तक अनाज न पुहंच पाने की समस्या को केवल तभी हल किया जा सकता है जब बाजार की शक्तियों में हस्तक्षेप करने वाली सभी न सही लेकिन ज्यादातर सरकारी नीतियों को समाप्त कर दिया जाए। इसका आखिरी नतीजा बहुत आदर्श भले ही न हो लेकिन इससे भ्रष्टाचार और बर्बादी के अवसर कम होंगे।
सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त की गई जानकारी के मुताबिक वर्ष 2014 में सरकारी एजंसियों के पास संरक्षित अनाज में से 1.95 लाख मिट्रिक टन अनाज खराब रख रखाव के कारण बर्बाद हो गया था। वर्ष 2012 में सरकारी एजंसियों के पास अनाज का 7.5 करो़ड टन का स्टाक था लेकिन सरकार के पास केवल 5 करोड टन अनाज के लिए ही भंडारण की क्षमता है इसलिए बड़े पैमाने पर अनाज की बर्बादी होना लाजिमी है।
इसका समाधान क्या है? यह सोचने की बजाए भारतीय खाद्य निगम और ज्यादा गोदाम बनाने और या किराए पर लेने की योजना बनाता रहता है। कारण यह है कि भारतीय खाद्य निगम द्वारा खरीदा गया अनाज अक्सर सड़ जाता है। क्योंकि उसका भंडारण खुले में किया जाता है। या उसे प्लास्टिक की चादरों से ढंक दिया जाता है। जबकि लोग भूखे रहने को मजबूर होते हैं तो किसान दरिद्रता को झेलने के लिए।
वैसे समाधान यह है कि निर्यात पर लगी पाबंदियों को हटा लिया जाए ताकि किसान ज्यादा अनाज निर्यात कर सके। इसी तरह राज्य न्यूनतम खरीद मूल्य से ऊपर के दामों पर लेवी या कर लगाना बंद करें। दूसरी तरफ राज्यों को व्यापार पर लगाई गई पाबंदियों को खत्म करना चाहिए। इस तरह की नीतियों से किसानों को नुक्सान होता है। उन्हें न्यूनतम खरीद मूल्य से ज्यादा के दामों पर बेचने से होनेवाली आमदनी से हाथ धोना पड़ता है।
दरअसल मंडियों के प्रायवेट और प्रतियोगी नेटवर्क के उपयोग से इन अक्षमताओं और असंतुलनों को कम किया जा सकता है और अनाज सब्सिडी के वित्तीय नुक्सान को भी घटाया जा सकता है।

- अविनाश चंद्र