क्या है ‘शिक्षा के अधिकार’ की कीमत

सरकार के उत्तरदायित्व समूह के एक अनुमान के अनुसार, मौजूदा सरकारी स्कूलों में पिछले साल लागू हुए शिक्षा के नियमों  के तहत काम करने के लिए 152 बिलियन रुपए या करीब 3.4 बिलियन डॉलर का खर्च आ सकता है।

कानून के तहत 6 से 14 साल के सभी बच्चों की नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के आदेश को पूरा करने के लिए इससे तीन गुना रकम या 11 बिलियन डॉलर की ज़रूरत पड़ सकती है।

हाल में उत्तरदायित्व कार्यवाही समिति की निदेशक यामिनी अय्यर ने कहा कि शिक्षा के अधिकार के निहितार्थ को समझना महत्वपूर्ण होगा। अगर आप मानकों पर एक नज़र डालें तो पाएंगे कि कानून ने विभिन्न बुनियादी संरचना, सुविधाओं और स्कूल की अन्य ज़रूरतों पर पूरा ध्यान दिया है।”

2009 में पारित इस क़ानून ने अन्य सुविधाओं सहित शिक्षकों के वेतन, कक्षाओं के आकार, खेल मैदान और चारदीवारी के लिए मानक तय किये हैं।

स्कूलों में शिक्षा के अधिकार का अनुपालन किये जाने संबंधी प्रश्नावली के उत्तरों पर काम कर सार्वजनिक खर्च लेखा-परीक्षण समूह 152 बिलियन रुपए के आंकड़े पर पहुंचा। पिछले साल प्रथम के साथ लगभग 13,000 स्कूलों में किये गए विस्तृत सर्वेक्षण का यह एक हिस्सा था। प्रथम बच्चों पर केंद्रित एक अलाभकारी समूह है, जो वार्षिक आधार पर बच्चों के सीखने के स्तर का मूल्यांकन करता है।

इस समूह ने अन्य सुविधाओं सहित शिक्षकों में वृद्धि या खेल मैदान बनाने के सिलसिले में हरेक राज्य की लागत का अनुमान लगाया और हरेक राज्य में ऐसे कार्य किये जाने वाले स्कूलों की संख्या के साथ उसे गुणा कर दिया।

प्रधानाचार्य कार्यालय (जो भंडार घर जितना दुगुना बड़ा होगा) बनाने का खर्च 3.4 बिलियन डॉलर में सबसे अधिक आंका गया। यह कुल लागत की एक तिहाई से ज़रा ज्यादा या लगभग 1.2 बिलियन डॉलर होता है।

विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात के अनुसार अतिरिक्त शिक्षकों के वेतन में कुल लागत की एक चौथाई का खर्च आंका गया है, जबकि दीवारों और चारदीवारी में कुल लागत का पांचवां हिस्सा खर्च होगा।

बहरहाल, यह लागत अनुमान केवल मौजूदा स्कूलों और मौजूदा दाखिले के आधार पर ही है। स्कूल नहीं जाने वाले 6 से 14 साल के 2.2 मिलियन बच्चों के नए स्कूलों में दाखिले पर 335 बिलियन रुपए (7.4 बिलियन डॉलर) का खर्च आ सकता है।

सुश्री अय्यर का कहना है कि क़ानून को सही ढंग से लागू करने पर कितने खर्च की उम्मीद की जा रही है, इस पर सरकार ने अभी तक कुछ नहीं कहा है, लेकिन समूह इस पर भी नज़र रखेगा।

सुश्री अय्यर का कहना है कि “जनता द्वारा लागत निर्धारण एक अच्छी बात है।” इससे वे वास्तविक सरकारी बजट की तुलना इन अनुमानों के साथ कर सकते हैं और देख सकते है कि “अपने किये वादे को पूरा करने के लिए वे आवंटन कर रहे हैं या नहीं।”

- तृप्ति लाहिरी