शासन का सही एजेंडा

संसद के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने न सिर्फ सरकार के एजेंडे, बल्कि इससे भी महत्वपूर्ण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्किल (कौशल), स्केल (व्यापकता) और स्पीड (तीव्रता) के नारे को स्पष्टता से सामने रखा। भारत तब तक गरीबी उन्मूलन नहीं कर सकता और एक संपन्न राष्ट्र नहीं बन सकता जब तक इसके युवा इतने कुशल नहीं हो जाते कि विनिर्माण क्षेत्र में नौकरी कर सकें। इसी के दम पर हम बेरोजगारी पर अंकुश लगा सकते हैं। इसके लिए हमें औपचारिक शिक्षा और कौशल विकास के बीच की खाई को पाटना होगा। उनके भाषण में जिस एजेंडे का खाका खींचा गया है वह समग्रतापूर्ण और महत्वाकांक्षी है। एजेंडे के कुछ पहलू अव्यावहारिक हो सकते हैं, किंतु विकास का इतिहास गवाह है कि संकुचित दृष्टिकोण परिणाम देने में विफल रहते हैं। यह महत्वाकांक्षी एजेंडा परंपरा, प्रतिभा, व्यापार, पर्यटन और प्रौद्योगिकी के इर्द-गिर्द घूमता है।
 
चाहे मुद्दा देश के सभी राज्यों में 100 नए शहरों, आइआइटी और आइआइएम की स्थापना का हो या फिर सुलभ स्वास्थ्य सेवा, प्राकृतिक संसाधनों का पारदर्शी निष्पादन, रक्षा डिजाइन और उत्पादन के विकास का वैश्विक प्लेटफार्म, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में घरेलू और विदेशी निजी क्षेत्र की भूमिका को विस्तार देने का-मोदी सरकार ने समग्रतापूर्ण दृष्टि और साहस का परिचय दिया है। इस महत्वाकांक्षी एजेंडे के अनुरूप परिणाम देने के लिए 60 माह के समय की मांग कर निर्णय लेने की गति और क्रियान्वयन पर जोर दिया गया है। योजनाओं के अमल में यथोचित तेजी लाने के लिए सरकार पहले ही कह चुकी है कि वह मिनिमम गवर्नमेंट और मैक्सिमम गवर्नेस के लक्ष्य को हासिल करने की कोशिश करेगी।
 
मोदी सरकार अपने दो लक्ष्यों-विकास और सुशासन की नीति के आधार पर ही सत्ता में आई है। यह दोनों बातें परस्पर जुड़ी हुई हैं और संप्रग सरकार सुशासन के मोर्चे पर पूर्ण रूप से विफल रही। उसने संस्थाओं को जानबूझकर नष्ट किया था। इतना ही नहीं, लोकलुभावन नीतियों और अव्यवस्था के चलते देश का आर्थिक संकट गहराता गया। नीतिगत पंगुता पूर्व सत्ताधारी पार्टी की विचारधारा का एक लक्षण था, जिससे आर्थिक विकास की दर प्रभावित हुई और गरीबों का संकट बढ़ा। इससे उद्योगपति भी सरकार से नाराज हुए। इसी तरह जहां पर्यावरण को मुद्दा बनाकर योजनाओं को लटकाया गया वहीं स्पेक्ट्रम, कोयला और खनिज जैसे प्राकृतिक संसाधनों के मामले में भ्रष्टाचार और लूटपाट हुई। वर्तमान सरकार की तरह गरीबों को समर्थ करने के बजाय संप्रग सरकार ने उन्हें स्किल और बेहतर स्वास्थ्य से वंचित रखा।
 
संप्रग सरकार ने मुफ्तखोरी की नीति को बढ़ावा दिया, जिससे न तो राजकोषीय स्थिति मजबूत हुई और न ही रोजगार सृजन हुआ। समूचे देश में विनिर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहन देने की जरूरत थी, लेकिन इस पर कभी बल नहीं दिया गया। राष्ट्रपति का अभिभाषण इन्हीं बातों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा। आज स्किल पर ध्यान देना जरूरी है और कर संरचना को सरल करना होगा। आज भारत में जीएसटी यानी वस्तु एवं सेवा कर की आवश्यकता है, लेकिन यह तभी संभव है जब राज्य भी इसके लिए तैयार हों। पर्यावरण संरक्षण और विकास के भ्रामक विभाजन को आगे जारी नहीं रखा जा सकता। जैसा कि राष्ट्रपति ने कहा, क्लीयरेंस प्रक्रिया को पारदर्शी और समयोचित बनाना होगा तथा इसे अमल से जोड़ना होगा। वर्षो तक उपेक्षित किए गए बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाना होगा। रेलवे की स्वर्णिम चतुर्भुज योजना लंबे समय से विलंबित है।
 
रेलवे के उन्नतीकरण और आधुनिकीकरण की पूरी प्रक्रिया के लिए नवीन वित्तीय तौर तरीकों की आवश्यकता है। सस्ती एयरलाइन के विकास द्वारा समूचे देश को जोड़ना होगा, जो बिखरे आर्थिक विकास को प्रेरित करने का काम करेगा। व्यापार प्रोत्साहन पर ध्यान दिए बिना चीन की तरह विनिर्माण क्षेत्र आगे नहीं बढ़ सकता। नए बंदरगाहों के साथ सागरमाला योजना एक सच्चाई बनेगी, जिन्हें रेलवे, सड़क मार्ग और आंतरिक जलमार्ग से जोड़ा जाएगा। इसी तरह नेशनल मैरीटाइम अथॉरिटी की घोषणा की गई है। इसमें शामिल होने वाले राज्य विनिर्माण गतिविधियों में तेजी ला सकेंगे तथा व्यापार में तालमेल स्थापित होगा। इससे भारत आर्थिक शक्ति के तौर पर उभरेगा।
 
बहुत समय पहले भारत का राजनीतिक वर्ग शहरों को अनिवार्य बुराई के तौर पर देखता था, जो महज टैक्स जुटाने के लिए थे। यह नजरिया विकास के लिए घातक रहा। शहरीकरण को समस्या नहीं, अवसर के रूप में देखना चाहिए। शहरीकरण से विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में रोजगार पैदा होते हैं, जिससे लोगों का जीवन बेहतर होता है। नालों की खराब निकासी प्रणाली और कचरों के बढ़ते बोझ के कारण आज हमारे शहर ढहने के कगार पर हैं। सरकार की घोषणा जीवन स्तर सुधारने की दिशा में एक समयोचित कदम है। तकनीक के उपयोग, बेहतर जल प्रणाली और अन्य उपायों से कृषि उत्पादकता बढ़ानी होगी। अनाज उत्पादन तक सीमित रहने के बजाय दलहन, फल और सब्जी, डेयरी उत्पाद, मत्स्यपालन आदि पर ध्यान देना होगा।
 
महिला सशक्तीकरण के साथ-साथ महिला अपराधों के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति अपनानी होगी। अल्पसंख्यकों को वोट बैंक तक सीमित रखने के बजाय उन तक विकास का लाभ पहुंचाना होगा। मदरसों के आधुनिकीकरण के लिए सरकार मदद देगी और साथ ही अल्पसंख्यकों को उच्च और तकनीकी शिक्षा में भी मदद मुहैया कराएगी। जाहिर है ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ महज नारा नहीं था। अपनी सांस्कृतिक परंपरा पर भी ध्यान देना होगा, फिर चाहे भाषा की बात हो या गंगा नदीं की। भारत अपने पड़ोसी देशों और शेष विश्व से अच्छे संबंध बनाए रखेगा। सार्क देशों और मॉरीशस के प्रमुख को शपथग्रहण समारोह में आमंत्रित करना एक अच्छी शुरुआत थी। अच्छे रिश्ते तभी बनेंगे जब परस्पर विश्वास होगा। सीमा पार आतंकवाद बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसके लिए रक्षा तैयारी सबसे महत्वपूर्ण है। चीन, जापान, अमेरिका और यूरोप की तरह ही दक्षिण पूर्व एशिया भी महत्वपूर्ण है। संभवत: यह बिंदु अभिभाषण में छूट गया। मोदी सरकार से देश को काफी अपेक्षाएं हैं, हालांकि तमाम डर भी है। मोदी सरकार का एजेंडा बहुत ही साहसिक और व्यापक है। यदि मोदी सरकार लोगों को खुद के साथ जोड़ पाती है तो यह साहसिक महत्वाकांक्षा सच्चाई में तब्दील हो सकती है। और भारत को इससे कम कुछ चाहिए भी नहीं।
 
 
- शक्ति सिन्हा (लेखक पूर्व प्रशासनिक अधिकारी हैं और प्रधानमंत्री कार्यालय में भी कार्य कर चुके हैं)
साभारः दैनिक जागरण