मेक इन इंडियाः क्या सचमुच व्यापार के लिए तैयार है भारत?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरु किया गया ‘मेक इन इंडिया’ अभियान निश्चित ही एक स्वागतयोग्य कदम है। स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री द्वारा लालकिले की प्राचीर से की गई घोषणाओं में से यह तीसरी घोषणा है जिसके तरफ कदम बढ़ाए गए हैं। दो अन्य घोषणाएं बैंकिंग सुविधा से वंचित भारतीयों को प्रधानमंत्री जनधन योजना के द्वारा बैंकिंग सुविधा मुहैया कराना और योजना आयोग को भंग करने से संबंधित हैं, जिनपर काम शुरु हो चुका है। यह सिद्ध करता है कि नरेंद्र मोदी अपनी बातों के पक्के हैं। 
 
‘मेक इन इंडिया’ अभियान में कई स्वागत योग्य पहलुएं शामिल हैं, जिनमें सर्वप्रमुख अतिआवश्यक उत्पादन को बढ़ावा देना है। इस अभियान में उत्पादक रोजगार पैदा करने की अपार संभावनाएं हैं। इस बाबत शुरू की गई वेबसाइट (makeinindia.com) में देशी तथा विदेशी कंपनियों की नीतिगत समस्याओं का समाधान और सवालों के जवाब 72 घंटें के भीतर उपलब्ध कराने की बात कही गई है, जोकि एक अन्य स्वागत योग्य कदम है। 
 
चूंकि इस अभियान में अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में बड़े सुधार की बात नहीं कही गई है इसलिए, लोक नीतियों से संबंधित सुधार को देखने के इच्छुक बुद्धिजीवियों और आम जनता को अभी और इंतजार करना पड़ सकता है। हालांकि मोदी सरकार के छोटे से कार्यकाल पर यदि निगाह डाली जाए तो यह साबित होता है कि विगत चार माह के दौरान जुबानी दावे तो बहुत अधिक किए गए लेकिन जमीनी उपलब्धियों के नाम पर इनके पास गिनाने को बहुत कम चीजे हैं। यह जरूर है कि मोदी सरकार के आते ही नौकरशाहों के कार्य करने के घंटों में वृद्धि हुई है और चीनी व जापानी नेतृत्व के साथ उनकी शिखर वार्ता ने विश्व में एक हलचल पैदा कर दी है। लेकिन, सुशासन के नाम पर जितने कार्य हुए हैं उनमें से अधिकांश प्रशासनिक सुधारों तक ही सीमित दिखाई देते हैं और आम जनता को समृद्धि और आजादी प्रदान करने वाली योजनाएं अबतक कम ही देखने को मिली हैं। ऐसे सुधार कड़े और अलोकप्रिय होते हैं और मोदी सरकार भी अबतक उनसे बचती ही दिखी है। 
 
विदेशी संस्थाएं उत्पादन के क्षेत्र में निवेश करने के भारत के आग्रह को गंभीरता से लें इसके लिए देश को अभी लंबा फासला तय करना पड़ेगा। मोदी भी इस बात को अच्छी तरह समझते हैं और यदि वह इस अभियान की सफलता चाहते हैं तो उन्हें कुछ कठोर फैसले लेने की जरुरत है। विभिन्न सूचकों (इंडिकेटर्स) द्वारा भारत को तालिका में दिए जाने वाले स्थान (रैंकिंग) को देखते हुए यह समझा जा सकता है कि अभी इस ओर बहुत अधिक काम करने की जरुरत है। 
 
भारत में व्यापार करने की सहूलियत, आर्थिक आजादी, नवाचार और प्रतिस्पर्धात्मक माहौल के आधार पर प्रदान किए जाने वाली वैश्विक रैंकिंग के मामले में भारत की स्थिति न केवल बहुत खराब है बल्कि पिछले कुछ वर्षों में इसमें सतत गिरावट देखने को मिली है। 
 
उदाहरण के लिए, वर्ष 2014 में व्यापार की सहूलियत के लिए विश्वबैंक के द्वारा की जाने वाली रैंकिंग में भारत विश्व के 189 देशों में 134वां स्थान प्राप्त हुआ है, जबकि 2006 में यह 116वें पायदान पर था। इसी प्रकार, कनाडाई फ्रेजर इंस्टिट्यूट द्वारा आर्थिक आजादी के मोर्चे पर प्रदान की जाने वाली रैंकिंग में भारत 2013 में 153 देशों में 111वें क्रम पर था। कॉर्नेल यूनिवर्सिटी द्वारा जारी किए जाने वाले वैश्विक नवाचार सूची (ग्लोबल इन्नोवेशन इंडेक्स) में भारत को 143 देशों में से 76वें क्रम पर रखा गया है, जबकि वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक सूची (ग्लोबल कॉम्पिटिटिवनेश इंडेक्स) में शामिल 144 देशों में भारत का स्थान 71वां है।
 
ये रैंकिंग यह दर्शाने के लिए काफी हैं कि भारत में व्यापार करना अत्यंत मुश्किल है। इससे यह भी साबित होत है कि यहां आर्थिक आजादी का स्तर भी काफी कम है और अन्य देशों की तुलना में ना तो यह ज्यादा नवोचारी है और ना ही अत्यधिक प्रतिस्पर्धी। 
 
ध्यान देने योग्य बात है कि ये सूचक किसी देश की समृद्धि और आजादी को मापने के पैमाने हैं जो विगत के वर्षों में सही सिद्ध हुए हैं। यह आने वाले वर्षों में भारत के सामने उपस्थित चुनौतियों को दूर करने के लिए जरुरी बड़े तादात में सुधारों की आवश्यकता पर भी जोर देता है। चार माह का समय हालांकि बड़े नीतिगत बदलावों के लिए नाकाफी है लेकिन यह सरकार की मंशा को दर्शाने के लिए पर्याप्त है। सरकार द्वारा श्रम सुधार व प्राकृतिक संसाधनों जैसे कोयला खदानों के आवंटन के लिए आवश्यक पारदर्शी नीतियों एवं लगातार घाटे में चलने वाली सरकारी कंपनियों में विनिवेश की ओर कदम न बढ़ाने जैसी चीजें मेरे मन में संशय की स्थिति पैदा करती है। 
 
प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने का मोदी का सफर भारत के उन करोड़ों लोगों के बदौलत है जो कि लंबे अरसे से “अच्छे दिन” की तलाश में थे। मोदी के कंधों पर वास्तव में एक बड़ी जिम्मेदारी है, लेकिन गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर उन्होंने यह साबित किया है कि वह ऐसा करने में सक्षम हैं। लेकिन इसबार यह काम और भी कठिन है क्योंकि मोदी सरकार राज्यसभा में अल्पमत में है, और बड़े नीतिगत फैसलों के क्रियान्वयन हेतु उन्हें कांग्रेस व अन्य क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर चलने की जरूरत पड़ेगी।
 
‘मेक इन इंडिया’ एक महान अभियान है। हालांकि मोदी को यह समझना पड़ेगा कि महज प्रशासनिक सुधार की सहायता से वह देश को ज्यादा दूर तक नहीं ले जा पाएंगे। इसके लिए उन्हें कड़े फैसलों को लेने की जरूरत है जो कि विदेशी तथा देशी उत्पादकों एवं निवेशकों के मन में विश्वास पैदा कर सके। हमें उम्मीद है कि मोदी इस चुनौती पर खरे उतरेंगे।
 
- कुमार आनंद
(लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ एवं सेंटर फॉर सिविल सोसायटी से जुड़े हैं)
 

Add new comment

Filtered HTML

  • Lines and paragraphs break automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <blockquote> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.

Plain text

  • No HTML tags allowed.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Lines and paragraphs break automatically.