समावेशीकरण की व्यवहारिकता

बीते सात वर्षों से भी अधिक समय से संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार अपने विशिष्ट ब्रांड (तथाकथित) 'समावेशी विकास’ का नारा बुलंद करती आई है। इस मूल विचार के साथ तो कहीं कोई खामी नहीं है क्योंकि इसके मुताबिक आर्थिक विकास के लाभ हर व्यक्ति तक पहुंचाने की मंशा जताई गई है। खासतौर पर इसे गरीब और वंचित वर्ग के लोगों तक पहुंचाने की बात कही गई है। लेकिन इसके लिए जिन नीतियों को अपनाया गया उनमें तमाम गड़बडिय़ां देखने को मिलीं। इसमें गरीबी निरोधक कार्यक्रमों पर होने वाले खर्च में काफी इजाफा करने पर जोर दिया गया। इन कार्यक्रमों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) तथा खाद्य और शिक्षा संबंधी अनेक अन्य कार्यक्रम शामिल हैं। इस रवैये से सरकार के खर्च तथा केंद्रीय बजट में की गई सब्सिडी में इजाफा होता गया। चूंकि इस दौरान कर से हासिल होने वाले राजस्व में बहुत अधिक इजाफा नहीं हुआ तो जाहिर है इससे राजकोषीय घाटे की स्थिति निर्मित हुई। इसके परिणामस्वरूप मुद्रास्फीति संबंधी दबाव बढ़ा और ब्याज दरों में भी इजाफा हुआ।

भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन तथा गरीबों को निशाना बनाने की अपनी ज्ञात कमियों से इतर संप्रग का यह रवैया मध्यम और लंबी अवधि में स्थायित्व की कमी का शिकार है। इसके अलावा यह योजना चीन, दक्षिण कोरिया, मलेशिया और थाईलैंड जैसे सफल पूर्वी एशियाई देशों में प्रभावी साबित हुई समावेशन की योजना के एकदम उलट भी है। इन देशों ने श्रम आधारित विनिर्माण संबंधी गतिविधियों का  तेजी से और स्थायी ढंग से विस्तार किया। यह उनके समावेशन की प्रक्रिया के केंद्र में था। उनके रुख की सफलता स्वाभाविक ही है। दक्षिण कोरिया कुछ वर्ष पहले विकसित औद्योगिक देशों में जा शुमार हुआ। चीन जिसका औसत जीवनस्तर 70 के दशक में भारत के इर्दगिर्द ही ठहरता था वह हमसे तीन गुना बेहतर है और वह उभरती महाशक्ति भी है। संक्षेप में कहें तो पूर्वी एशियाई देशों ने लगातार दोहरे अंकों वाले औद्योगिक विकास की बदौलत गरीबी को लगभग मिटा ही दिया है। उन्होंने अपने गरीब तथा कम कुशल कामगारों को फैक्टरियों में रोजगार दिया है।

ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में समावेशीकरण हासिल करने की मुख्य रणनीति है उत्पादकता बढ़ाना और बढ़ते श्रमबल के लिए बेहतर कार्य परिस्थितियों वाला लाभकारी रोजगार सृजित करना। यह विचार तो बहुत उम्दा है लेकिन हकीकत में, नीतियों में इसका पालन नहीं किया गया। जैसा कि अगली ही पंक्ति में कहा गया है, 'ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (2007-12) में 5.8 करोड़ लोगों के लिए रोजगार सृजित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है...रोजगार और बेरोजगारी पर एनएसएसओ सर्वे का 64वां दौर संकेत देता है कि वर्ष 2004-05 और 2007-08 के दौरान 40 लाख रोजगार सृजित किए गए। तीन वर्षों में जहां मात्र 40 लाख रोजगार सृजित हुए हों वहां पांच वर्ष में 5.8 करोड़ रोजगार सृजित करने का लक्ष्य किस हद तक संभव प्रतीत होता है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2008 तक देश के श्रम क्षेत्र का महज 6 फीसदी हिस्सा ही उच्च सुरक्षा तथा बेहतर वातावरण वाले संगठित क्षेत्र में काम कर रहा था। शेष 94 फीसदी कामगार अनिश्चितता के वातावरण में काम करने को विवश हैं। जहां उन्हें न तो अच्छा वेतन मिलता है और न ही रोजगार में स्थायित्व की संभावना दिखाई पड़ती है।

विनिर्माण फैक्टरियों में रोजगार को बाधित करने वाला सबसे बड़ा कारण हमारे अत्यधिक प्रतिबंधात्मक श्रम कानून रहे हैं। इनके जरिए संगठित क्षेत्र के अल्पसंख्यक कामगारों को तो रोजगार मुहैया कराए जाते हैं लेकिन असंगठित क्षेत्र के कम वेतन आदि पाने वाले कामगारों की नई नियुक्तियों को यह पूरी तरह हतोत्साहित करता है। यही वजह है कि हमारे देश में कपड़ा, वस्त्र, चमड़ा, सस्ते इलेक्ट्रॉनिक सामान, खिलौने आदि श्रमिकों की बहुलता वाले क्षेत्र में बहुत कम ही बड़ी कंपनियां काम कर रही हैं। जबकि ये सभी क्षेत्र पूर्वी एशिया के रोजगार आधारित समावेशित विकास की रीढ़ की हड्डी साबित हुए हैं।

रोजगार के विकास को बढ़ावा देने वाले वास्तविक श्रम सुधारों के बजाय संप्रग सरकार ने मनरेगा जैसे कामचलाऊ इंतजाम करने तथा सब्सिडी की व्यवस्था करने पर ही जोर दिया है। इस तरीके से लाखों की संख्या में रोजगार जरूर निर्मित हुए हैं लेकिन उनमें स्थायित्व नहीं है।- स्निग्धा द्विवेदी