भारत में गरीबी के लिए दोषी कौन - संस्कृति या व्यवस्था ?---- (1)

हाल ही में मदर टेरेसा के निधन ने सारे विश्व का ध्यान कलकत्ता और आमतौर पर भारत की  दारुण गरीबी की ओर आकर्षित किया। मदर टेरेसा ने  बेहद गरीब देश के सबसे गरीब  लोगों की सेवा की । जिस देश में संन्यास,भौतिकवाद का विरोध और भाग्यवाद वहां के बहुसख्यकों के धर्म हिन्दू का अपरिहार्य अंग हैं।जो लोग इन सिद्धांतो का अनुकरण करते है  उनके लिए गरीबो की आर्थिक स्थिति को बदलने की कोशिश फिजूल है। उनके लिए गरीबी नहीं वरन समृद्धि अचरज का विषय है।

क्या भारत के गरीब कभी समृद्ध होंगे? प्रमुख धर्म और संस्कृति पर गौर करने पर बहुत निराशावादी चित्र उभरकर आता है।जो लोग आमतौर पर आधुनिक समाजों में धर्म और संस्कृति के प्रभाव को महत्वपूर्ण मानते  हैं वे कहते हैं कि भारत की  गरीबी राजनीतिक –आर्थिक व्यवस्था की उपज है। अशिक्षित लोगों के प्रतिनिधिक लोकतंत्र  ने राजनीतिक व्यवस्था के संचालकों को अपने लिए धन इकट्ठा करने की सुभीता दी। नेहरूवादी समाजवाद जिसे आमतौर पर लाइसेंस कोटा परमिट राज कहा जाता है ने निजी पहल और उद्यमशीलता के लिए ज्यादा गुंजाइश ही नहीं छोड़ी थी। इसका नतीजा निकला – हिन्दू विकास दर। इसके बारे में दलील दी जाती थी कि इस तरह की व्यवस्था में किसी भी संस्कृति में यही नतीजा निकलता।

भारत की गरीबी के लिए कौन जिम्मेदार है ?  संस्कृति या राजनीतिक आर्थिक व्यवस्था ।(अपने व्यापक अर्थ में धर्म संस्कृति को परिभाषित करता है इसलिए दोनों शब्दों को समानार्थक माना जा सकता है।) जो भारत की गरीबी को खत्म करना चाहते हैं उन्हें जवाब देने की जरूरत है। उन्हें तय करना होगा कि वे अपनी ऊर्जा को कहां केंद्रीत करें। लेकिन पहले संस्कृति ,अर्थशास्त्र और राजनीति पर कुछ बातें।

भारत की संस्कृति

देश के सबसे प्रमुख हिन्दूधर्म  में जीवन का उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना है यानी जन्म मरण के चक्र से मुक्ति पाना। उस उद्देश्य को पाने का एक तरीका है कि भौतिक विश्व का त्याग करना। इसके लिए आदमी जंगल में चला जाता है प्रार्थना करते हुए जीवन बीता देता है। प्रार्थना कई तरह से हो सकती है। इसमें सबसे आम है अकेले में ध्यान करना या  निरंतर भजन करना।

चूंकि ज्यादातर मनुष्यों के लिए भौतिक विश्व का त्याग करना मुश्किल होता है इसलिए दूसरी राह सुझाई गई है कि संसार में रहें मगर कड़ाई से निर्देशों का पालन करें। इसके लिए मुष्य के जीवनकाल को चार कालखंड़ों (आमतौर पर अवस्था के आधार पर ) में बांटा गया है। उन उद्देश्यों और नियमों के पालन को धर्म कहा जाता है। यह स्पष्ट रूप से असंभव है कि जीवन की हर स्थिति के लिए नियम बनाए जाएं।इसलिए महाभारत और रामायण जैसे महाकाव्यों के पात्रों  को उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत किया जाता हैं। आमतौर पर कहा जाता है कि भौतिक संपत्ति को जुटाना धर्म नहीं है। आदमी को भौतिक संपत्ति का संचय करना चाहिए और मानवीय रिश्ते भी बनाने चाहिए लेकिन जितने कम हों उतना अच्छा है। ज्यादा से ज्यादा समय उपासना में लगाना चाहिए। आखिर में इस भौतिक जगत में अपने  धर्म का पालन करना यानी उपासना करना ही मोक्ष का रास्ता है। भारतीय संस्कृति में भौतिकतावाद के विरोध और  संन्यास को न केवल पसंद किया गया है वरन उसे महिमा मंडित भी किया गया है।

कृष्ण द्वारा कही गीता दूसरा ऐसा धर्मग्रंथ है जिसे व्यापकरूप से पढ़ा जाता है और उसका अनुकरण किया जाता है। गीता के दो प्रमुख विचार हैं निष्काम भाव और कर्म । मनुष्य को जीवन में  निष्काम भाव  को हासिल करने के लिए कोशिश करनी चाहिए । हर चीज के प्रति वैराग्य मन की आदर्श स्थिति है। यहां तक यदि कोई संसार में रहता है तब भी उसे उसकी किसी चीज के प्रति मोह नहीं होना चाहिए –न भौतिक चीजों के प्रति न ही अन्य मनुष्यों के प्रति । यह अच्छी बात है यदि किसी के पास भौतिक सुविधाएं हो ।और वह परिवार और मित्रों से प्रेम करे। लेकिन नहीं हो तब भी चलेगा। हरेक को  सभी चीजों और सभी  प्राणियों के प्रति उदासीन होना चाहिए।कर्म  की अवधारणा भी निष्काम भाव के साथ जु़ड़ी है। इसके मुताबिक आप जो भी हैं और जैसे भी हैं पिछले जन्मों और अतीत के कर्मों का नतीजा है। आपका वर्तमान न केवल उचित है वरन मुश्किल से ही बदला जा सकता है। कर्म का सिद्धांत अप्रत्यक्ष रूप से भारत की जाति व्यवस्था का समर्थन करता है। (जाति व्यवस्था के दो महत्वपूर्ण आयाम हैं – इसका व्यवसाय के जुड़ाव और छोटी जातियों के लोगों को अस्पृश्य मानना।दूसरा आयाम अब खत्म हो रहा है लेकिन पहला अब भी बरकरार है।)

आप किस जाति में जन्म लेते हैं यह आपके कर्म से तय होता है। आपसे यह उम्मीद की जाती है कि जाति को स्वीकार करें और उससे जुड़ी भूमिका को स्वीकार करें। ऐसा करना अपने धर्म को निभाना है। यह स्पष्ट है कि नियतिवाद लोगों के दिमाग में पैठा हुआ है।

रामायण महाकाव्य में भगवान राम के राज्य का वर्णन है। उनके राज्य में संपन्नता थी,आनंद था और संतोष था। वह आदर्श शासक थे और उनका  राज्य रामराज्य कहलाता था।(हिन्दी मूलतत्ववादी राजनीतिक दल सत्ता में आने पर उसको ही लाने की बात करते हैं) राम के समय से ही लोग दूसरे रामराज्य की राह देख रहे हैं। उसे अभी आना है लेकिन यह बात  भारतीय मानस में पैठी  हुई है कि अचछा शासक ही ही सुख –समृद्धि ला सकता है। आधुनिक समय में सरकार से यह उम्मीद की जाती है कि वह उदार शासक हो। अपने उद्धार के लिए सरकार पर उनकी इस निर्भरता को ही माई –बाप सरकार कहा जाता है।जब तक सरकार कुछ नहीं करती या उन्हें कुछ करने के लिए मजबूर नहीं करती तबतक लोग लोग अपने को असहाय समझते हैं। कई लोगों का यह मानना है कि इस माई –बाप सरकार में विश्वास के कारण ही लोगों में पहल और उद्यमशीलता का अभाव है।चूंकि रामराज्य भारत में था इसलिए भारत  की सरकार से यह भूमिका निभाने की उम्मीद की जाती है। भारत से या राम की भूमि से आए आव्रजक इसलिए ज्यादा उद्यमशील और आत्मनिर्भर होते हैं।

भारतीय संस्कृति का वैराग्य,भौतिकवाद का विरोध और नियतिवाद और माई -बाप सरकार की धारणा भौतिक संपन्नता के लिए कम ही प्रोत्साहन देती है। वास्तव में  वह  उसे हतोत्साहित करती है। इसलिए भारतीयों को संतोषी कहा जाता है न कि ज्यादा से ज्यादा चाहनेवाला। इसलिए वे आर्थिक पहल और तर्क से मुक्त हैं। लेकिन क्या आर्थिक तर्क वैश्विक नहीं है ?(जारी)

- पार्थ जे शाह
(प्रख्यात अर्थशास्त्री और थिंक टैंक सेंटर फार सिविल सोसायटी के अध्यक्ष)