ग़रीबी की नई परिभाषा

शहरों में जो व्यक्ति हर महीने 965 रुपये और गांवों में 781 रुपये खर्च करता है वो गरीब नहीं माना जाएगा. ये बात योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर करके कही है. आयोग ने राष्ट्रीय सैंपल सर्वे संगठन के आंकड़े के आधार पर गरीबी रेखा की परिभाषा में सुधार करते हुए कहा है कि शहरों में रोजाना 32 रुपये और गावों में रोजाना 26 रुपये खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं माना जाएगा.

योजना आयोग के मुताबिक मुंबई, दिल्ली, चेन्नई और कोलकाता जैसे शहरों में प्रति माह 3 हजार 860 रूपए से ज्यादा खर्च करने वाला परिवार गरीब नहीं है. योजना आयोग के मुताबिक 2 रूपए 3 पैसे में दूध, 1 रूपए में दाल, 5 रूपए में चावल और गेहूं ,1 रूपए 8 पैसे में सब्जी, 78 पैसे मसालों पर एक दिन में खर्च करने के लिए और 112 रूपए का तेल एक महीने के लिए काफी है. इसी तरह मकान के किराये और आवाजाही पर 49.10 रुपये प्रति महीने का ख़र्च काफ़ी बताया गया है. स्वास्थ्य पर 39.70 रुपये और शिक्षा पर 29.60 रुपये प्रति महीने का ख़र्च, कपड़ों पर 61.30 रुपये, जूते-चप्पल पर 9.6 रुपये और निजी ख़र्च के तौर पर 28.80 रुपये का ख़र्च काफ़ी बताया गया है. जो लोग इन मानदंडों पर खरे उतरते हैं वे ग़रीबों के लिए चलाई जा रही योजनाओं का फ़ायदा नहीं उठा पाएंगे.

नए आंकड़ों के हिसाब से देश में 35.98 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं जबकि 2005 में अंदाजा लगाया गया था कि यह संख्या 40 करोड़ के पार हो जाएगी. इन के मुताबिक आज की महंगाई में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले एक ग्रामीण को 26 रुपए और शहरी गरीब को 32 रुपए में 1776 कैलोरी मिल सकती हैं. योजना आयोग सुप्रीम कोर्ट के 2100 और 2400 कैलोरी के अनुमान से सहमत नहीं है. यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को हलफनामे के तौर पर प्रस्तुईत की गयी है और इस पर खुद प्रधानमंत्री ने हस्तानक्षर किये हैं. हालांकि रिपोर्ट में अंत में कहा गया है कि गरीबी रेखा पर अंतिम रिपोर्ट एनएसएसओ सर्वेक्षण 2011-12 के बाद पेश की जायेगी.

महंगाई से जूझ रहे देश के सामने ये आंकड़े एक मज़ाक से अधिक कुछ नहीं लग रहे. खाद्य पदार्थों और मैन्युफैक्चरिंग उत्पादों के दाम बढ़ने से अगस्त  2011 में महंगाई दर बढ़कर 9.78 फीसदी पर पहुंच गई. हाल ही में पेट्रोल की कीमतें लगभग तीन रुपये प्रति लीटर बढ़ गईं और उस के फ़ौरन बाद रिजर्व बैंक ने ब्याज दरें 0.25 प्रति बढ़ा दीं. अनियंत्रित महंगाई के आंकड़ों पर पेट्रोल के दामों में बढ़ोतरी का असर मध्यम वर्ग पर व्यापक तौर पर हो रहा है. अन्ना हजारे के आंदोलन में निम्न और माध्यम वर्ग का आक्रोश फट पड़ता दिखाई दिया था.  गरीबी रेखा की इस नई परिभाषा ये आक्रोश और बढ़ा सकता है. गरीब किस तरह अपनी रोटी का इंतेज़ाम करता है ये वही जानता है. सरकार किस तरह इन नतीजों पर पहुंची इस बात पर बहुत प्रश्नचिन्ह लगाये जा रहे हैं. ये ज़रूर है कि आने वाले दिनों में सरकार को इस मामले में काफी विरोध का सामना करना पड़ेगा.

रिजर्व बैंक ने मार्च 2010 के बाद से 11 बार मुख्य दरों में वृद्धि की है. इसके बावजूद महंगाई दर दहाई अंकों के पास बनी हुई है, जबकि बैंक ने चार से पांच फीसदी को महंगाई की सुविधाजनक दर माना है. जहां दूध, रोटी और सब्जी खरीदने के लाले पड़ते दिख रहे हों, वहाँ ग़रीबों की दशा को ढंकने वाले ये आंकड़े प्रस्तुत कर सरकार क्या सिद्ध करना चाहती है? सामाजिक कार्यकर्ता और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सदस्य अरुणा राय ने भी इन विचारों का विरोध किया है और कहा है  कि गरीबों की संख्या को कृत्रिम तौर पर घटाने के लिए ऐसा किया गया है ताकि सरकार को कम खर्च करना पड़े.

- स्निग्धा द्विवेदी