औद्योगिकीकरण से ही मिलेगी गरीबी से मुक्ति – महादेव गोविंद रानाडे

अठारहवी सदी में अंद्रेजों के समय में जस्टिस के तौर पर काम करनेवाल महादेव गोविंद रानाडे  बहुआयामी व्यक्तित्व थे। वे ऊचे दर्जे के उदावादी चिंतक थे तो जुझारू समाज सुधारक भी। वे भारत की औद्योगिक क्रांति के स्वप्नद्रष्टा थे जिन्होंने अपने स्वप्न को साकार करने की भरपूर कोशिश की। उनकी दृढ़ मान्यता थी यदि भारत की गरीबी को दूर करना है तो उसका एक ही उपाय है तीव्रगति से औद्योगिक विकास। इसके लिए वे आर्थिक समस्याओं के अध्ययन के लिए संस्थानों की स्थापना करना चाहते थे। उन्होंने 1885 में नेशनल सोशल कान्फ्रेंस और 1890 में इंडस्ट्रियल एसोसिएशन की स्थापना की। इन संगठनों द्वारा तैयार किए मेमोरेंडा के दूरगामी नतीजे हुए। उनका मानना था कि सुधारों के बिना भारत की राष्ट्र के रूप में कल्पना बेकार है।

रानाडे ने भारत के आर्थिक समस्याओं पर बहुत गंभीरता से विचार किया था और वे उनपर अपने विचार लेखों या भाषणों के जरिये प्रगट भी करते थे। उनके आर्थिक चिंतन का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा यह था यदि भारतीयों को गरीबी से छुटकारा दिलाना है तो देश का औद्योगिकीकरण करना बेहद जरूरी है। कुटीर उद्योगों का स्थान कल कारखानों को लेना होगा। इसके लिए आवश्यक पूंजी जुटाई जानी चाहिए। लोगों को थोड़ा-थोड़ा करके देना, बचाना और निवेश करना चाहिए। कृषि क्षेत्र में सरकार को भू राजस्व का बोझ कम करना चाहिए।

सार्वजनिक सभा पत्रिका में छपे उनके लेखों और औद्योगिक सम्मेलन में उनके भाषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि औद्योगिक क्षेत्र में  उनकी कितनी गहरी दिलचस्पी थी। वे मुख्यरूप से दो बातों पर बल देते थे कि भारत में निर्माता उद्योगों को स्थापित और विकसित करने के लिए हरसंभव कोशिश की जानी चाहिए। इससे खेतिहरों को भी अप्रत्यक्ष तरीके से लाभ होगा। लेकिन उनकी गरीबी को कम करने और उनका जीवनस्तर सुधारने के लिए भू राजस्व को कम किया जाना चाहिए। और घटी दरों पर स्थायी रूप से तय किया जाना चाहिए। इसके अलावा किसानों को कम व्याज पर ऋण मुहैया कराने के लिए ऋणदाता संगठन स्थापित किए जाने चाहिए। इसके अलावा किसानों को  महाजनों के लालच और चालाकी  से बचाने के लिए कानूनी संरक्षण दिया जाए।

वर्ष 1872 में ही रानाडे ने विदेश व्यापार में भारत की विफलता पर गंभीर चिंता प्रगट करते हुए कहा था कि देश ज्यादातर कच्चे माल का निर्यात करता है और निर्मित वस्तुओं का आयात करता है। इससे सिद्ध होता है कि भारत उद्योगों की दृष्टि से अत्यंत पिछड़ा है। इस कारण से ही वह गरीब भी है। इसलिए भारत का औद्योगिक विकास तेजी से होना चाहिए। इस मकसद को पूरा करने लिए उन्होंने जहां एक ओर जनता में औद्योगिकीकरण प्रति उत्साह जगाने का अभियान शुरू किया वहीं दूसरी ओर सरकार से आग्रह किया कि इस मामले में सक्रिय सहयोग करे।

उस समय के सबसे प्रमुख राजनीतिक दल इंडियन नेशनल कांग्रेस से रानाडे ने अनुरोध किया था कि उसे समाज सुधार और औद्योगिक विकास के बारे में भी चिंतन करना करना चाहिए। वे कांग्रेस के अधिवेशन के बाद उसी पंडाल में सामाजिक कांग्रेस कराने में तो कामयाब रहे लेकिन भारतीय औद्योगिक कांग्रेस को आयोजित कराने में सफल नहीं हो पाए। लेकिन 1890 में  उन्होंने पश्चिम भारतीय औद्योगिक एसोसिएशन का आयोजन किया। सम्मेलन में अपने भाषण में उन्होंने सुझाव दिया था कि हमें “जरूरत के मुताबिक विदेशों से काफी कच्चा माल लेना चाहिए और उस पर काम करना चाहिए और कच्चे माल के निर्यात के स्थानपर मूल्यवान उत्पाद को उतनी ही मात्रा में विदेश भेजना चाहिए। लेकिन इससे पहले उन्हें कलात्मक रूप दिया जाना चाहिए और देखना चाहिए कि हमारे औद्योगिक वर्ग को इसमें रोजगार मिला है। उदाहरणार्थ तिलहन की जगह तेल भेजिए, कच्चे कपास की जगह सूती कपड़े भेजिए। चमड़े और खालों की जगह संशोदित चमड़ा भेजिए।”

वह ऐसा जमाना था जब औद्योगिकीकरण का दौर शुरू ही हुआ था मगर उसकी रफ्तार बहुत ही धीमी थी। तब भारतीय लोग औद्योगिक कंपनियों में कम ही निवेश किया करते थे। कारखाना शुरू करना देश में औद्योगिकीकरण को मदद पहुंचाकर इस प्रकार से समाज सेवा करने का एक तरीका था। रानाडे ने औद्योगिक सम्मेलनों का आयोजन औद्योगिक कंपनियों के लिए वित्त जुटाने और इन कंपनियों निवेश करने के संदेश के प्रसार के लिए किया। उनका मकसद उद्योगों को बढ़ावा देने के तौर तरीके ढूंढना था ताकि देश की गरीबी दूर की जा सके। एक ओर उन्हें सारा जोर इस ओर लगाना था कि लोग बचतकर उद्योगों में निवेश करें। दूसरी तरफ उन्होंने अपने सारे ज्ञान और बहस की योग्यता से भारत में ब्रिटिश सरकार को औद्योगिकीकरण के लिए प्रेरित करना था। इसलिए रानाड़े को बार बार उद्योगों में निवेश के लिए गुहार लगानी पड़ी। सरकार से भी बार-बार उद्योगों को हर तरह से सहयोग करने की अपील करनी पड़ी। वे अक्सर कहा करते थे –देश का उद्योग पूंजी की कमी का प्यासा है।  ---- चूंकि यह कमी राष्ट्रीय है इसलिए राष्ट्र को यह अधिकार है वह शासकों से कमी पूरी करने की उम्मीद करे।

- सतीश पेडणेकर