भारत में गरीबी के लिए दोषी कौन - संस्कृति या व्यवस्था ?---- (3)

संस्कृति का प्रभाव होता है या व्यवस्था का यह तय करने के लिए किसी समाजशास्त्रीय ,मनोविज्ञानीय,समाजशास्त्रीय या अर्थशास्त्रीय सिद्धांत को स्थापित कर पाना मुश्किल है। यह कह पाना मुश्किल है कि संस्कृति या व्यवस्था लोगों जिनमें शासक और शासित दोनों ही शामिल है की रोजमर्रा की गतिविधियों को किस हद तक प्रभावित करती है। संस्कृति और व्यवस्था दोनों ही गतिशील होते हैं।वे लगातार विकसित होते हैं,अंतर्क्रिया करते हैं ।दोनों ही मानवीय कर्म की उपज हैं । व्यवस्था उन लोगों की संस्कृति से प्रभावित होती है जो उसे बनाते हैं। लेकिन व्यवस्था भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है कि किस तरह की संस्कृति विकसित हो  ।निश्चित ही  आसान उत्तर  यह है  - परस्पर निर्भरता।वे संयुक्त रूप से लोगों की भौतिक और आध्यात्मिक स्थिति को शासित करते हैं। जैसा कि अलफ्रेड मार्शल के अर्थशास्त्र में होता है कि मांग या सप्लाई अकेले ही कीमतें तय नहीं करते। वे एक ही कैंची के दो पातें हैं।

लेकिन अगर मुझे चुनना हो संस्कृति के बजाय व्यवस्था को चुनूंगा। मैं कोई सैद्धांतिक दलील पेश नहीं कर सकता। लेकिन मैं कुछ प्रमाणजन्य और विकासवादी दलीलें जरूर पेश कर सकता हूं। विश्व के सभी प्रमुख धर्मों में मरणोंत्तर जीवन को लेकर चिंता और उसका लौकिक जीवन पर असर  की अवधारण है। इसी तरह वैराग्य और भौतिकवाद के विरोध पर बल दिया गया है।न्यू टेस्टामेंट के  –सुई की आंख- को याद कीजिए । किसी भी मुख्य धर्म ने लौकिक संपदा को मानव जीवन का उद्देश्य नहीं माना है। इसी तरह अपने धर्म और संस्कृति के प्रति उत्कट  समर्पण भी समान है। मेफ्लावर में धार्मिक असंतुष्ट भरे हुए थे।यात्री कम्यून में रहते थे ।बाद में भी लंबे समय तक अमेरिका की धरती पर कई समाजवादी प्रयोग किए गए। इनमें से कोई भी मुहिम अमेरिका को दुनिया का सबसे भौतिक रूप से समृद्ध समाज और भौतिकवाद और उपभोक्तावाद का सिरमौर बनने से नहीं रोक पाई। सौभाग्यवश शुरूआती समाजवादी चिंतन को खारिज कर दिया गया। अमेरिका ने व्यक्ति को अपना मकसद चुनने और उसे पाने की कोशिश करने की छूट दी। इस तरह प्रारंभिक धर्म के बावजूद अमेरिकी व्यवस्था सफल रही।

अमेरिका की इस गाथा को जानने के बाद भी हम क्यों यह उम्मीद करते हैं कि भौतिकवाद का विरोध किसी अन्य समाज को भौतिक समृद्धि पाने से रोकेगा जबकि वहां एक ऐसी व्यवस्था हो जो उन्हें अपने तरह से जीवन जीने की स्वतंत्रता देती हो।लेकिन इस सूचना युग में जिन प्रक्रियाओं को कई शतक लगे वह कुछ दशकों में पूरी हो जाएंगी।यदि व्यवस्था सही हो तो कोई भी समाज लंबे समय तक भौतिक रूप से गरीब नहीं रह सकता।

यह उत्क्रांति केवल पश्चिम के ईसाई देशों में ही नहीं हुई है।थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे बौद्ध देशों में पिछले दशक में अपने उपभोग को नाटकीय तरीके से बढ़ाया है।पूर्वी एशिया का कंफ्यशियसवाद कोक और लेवीज का लुत्फ उठाने में बाधक नहीं बना।पूर्वी एशिया के देशों ने भौतिकवाद विरोध को छोड़ भौतिकवाद को अपनाने में की अद्भुत क्षमता दिखाई।तो फिर इस्लाम और हिन्दू धर्म क्यों नहीं अपने को इसके मुताबिक नहीं ढालेंगे।

पश्चिम और पूर्व के हिस्सों के  विकास ने यह स्पष्ट कर दिया है कि एक बार यदि आर्थिक ऊर्जाओं को बंधनमुक्त कर दिया जाता है तो धर्म या संस्कृति लंबे समय तक बाधा नहीं बन पाते। जैसे ही आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं को सुधारा जाता है तो भौतिक समृद्धि प्रवाहित होने लगती है। इस भौतिक समृद्धि का वास्तविक चरित्र और संरचना उनकी जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उनकी विशेषताओं पर निर्भर करती है। निश्चित ही हम भी केवल कोक और लेवीज को पसंद नहीं करते।

भौतिक समृद्धि का विरोध बुनियादी तौर पर ही मानवीय स्वभाव के विपरित है।ऐसा लगता है कि हिन्दू और मुस्लिम इसके अपवाद हैं।लेकिन उनका शरीर के प्रति उपेक्षाभाव स्पष्टरूप से इस बात का नतीजा है कि उन्होंने शरीर पर ध्यान देने के तरीके खोज नहीं पाए हैं।यदि उन्हें इसके बारे में बताया जाए और उत्पाद उपलब्ध कारए जाएं तो बाकी लोगों की तरह वे भी शरीर पर ध्यान देने लगेंगे।यह बात दिल्ली और ढाका के बुटीक और डिस्कोथेकों से स्पष्ट भी हो चुकी है। भौतिक समृद्धि का धार्मिक विरोध केवल पाकंड और अपराध बोध को ही जन्म देता है।लेकिन उभरते वैश्विक शहर में यह खत्म हो जाएगा।

एक अर्थ में उत्क्रांति की प्रक्रिया पूर्णता की ओर बढ़ना है। यह एक अवसर है अपनी एक भौतिक और आध्यात्मिक प्राणी के रूप में अपनी उच्चतम क्षमताओं को पूरा करने का । ज्यादातर मनुष्य पहले पहले अपने शरीर पर ध्यान देते हैं बाद में अपने मन और आत्मा पर। शरीर को सक्षम बनाना मन और आत्मा के क्षेत्र में भी सहायक बनता है। इसके जरिये हम यह नहीं कह रहे हैं कि शरीर को सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए आर्थिक और नागरिक स्वतंत्रताओं की बलि चढ़ा दी जाए। ऐतिहासिक तथ्यों से स्पष्ट है कि भौतिक प्रगति को संभव बनाने के लिए स्वतंत्रता कानूनी रूप से ही नही वरन वासतविक तौर पर जरूरी है।इसके अलावा मन और आत्मा के लिए भी भौतिक चीजों की जरूरत होती है।आखिरकार उत्क्रांति की प्रक्रिया को आदगे ले जाने के लिए संस्कृति और राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था दोनों में परिवर्तन करना होगा।

शायद कंप्यूटर और काम्पैक्ट डिस्क से पहले कास्मेटिक्स और स्टाकिंग्स को आयात के लिए खुला करने के पीछे कोई अर्थ है।भारतीय नेता और नौकरशाह सचमुच कुछ गंभीर करना चाहते हैं।यह भारतीय विशेषता से युक्त युकितवाद है।

- पार्थ जे शाह
(प्रख्यात अर्थशास्त्री और थिंक टैंक सेंटर फार सिविल सोसायटी के अध्यक्ष,यह लेख 1998 में छपा था)