दरिद्र को नारायण मानोगे तो दरिद्रता को दूर कैसे करोगे?

आमतौर पर यह माना जाता है कि गरीबी दूर करने का सीधा और सरल तरीका यह है कि वंचित लोगों को वह सब उपलब्ध करा दिया जाए जो उनके पास नहीं है। गरीबी दूर करने का यह दर्शन काफी पुराना है और हम सब के दिलो दिमाग में पूरी तरह से रचा बसा है। धर्मार्थ कार्य में विश्वास करने वाले जहां दरिद्र नारायण की सेवा कर अपने को उप कृत समझते हैं वहीं जन कल्याण के लिए कार्य करने वाले (फिलॉंथ्रोपिस्ट्स) गरीबों को वह सब दे देने में विश्वास करते हैं जिन्हें वे स्वयं हासिल नहीं कर सकते। जबकि समाजवादी सरकारों का ज्यादा जोर रॉबिनहुड वाले तरीके यानी कि गरीबी मिटाने के लिए अमीरों से वसूली करना और उसका कुछ हिस्सा (जो सरकार व सरकारी खर्चे के बाद बच जाए) गरीबों को देने के मैकेनिज्म पर रहता है।

हालांकि सदियों से चले आ रहे उपरोक्त तरीकों से किसी भी राज्य, क्षेत्र या शहर की गरीबी दूर हुई हो इसका प्रमाण ढूंढना बॉलीवुड की फिल्म के कुख्यात किरदार डॉन को पकड़ने जैसा है जिसे ग्यारह मुल्कों की पुलिस भी नहीं पकड़ सकी।

अमेरिकी पत्रकार और पॉलिटिकल सटायरिस्ट पी.जे. ओ’रुरकी कहते हैं कि ‘यू कान्ट गेट रिड ऑफ पॉवर्टी बाय गिविंग पीपल मनी’। यानी लोगों को पैसा देकर उनकी गरीबी दूर नहीं की जा सकती। आचार्य रजनीश उर्फ ओशो भी कहते हैं कि ‘यहां दरिद्र को एक नया नाम दे दिया गया- दरिद्र नारायण। जब तुम दरिद्र को नारायण कहोगे, तो उसकी दरिद्रता मिटाओगे कैसे? भगवान को कोई मिटाता है क्या? भगवान को तो बचाना पड़ता है। दरिद्र नारायण की तो पूजा करनी होती है। दरिद्र नारायण के पैर दबाओ। उसे दरिद्र रखो, नहीं तो वह नारायण नहीं रह जाएगा। हम अगर गरीब की पूजा करेंगे, तो अमीर कैसे बनेंगे?’

इसी विषय पर एक दर्जन से अधिक देशों में गरीबी उन्मूलन के लिए किये जाने वाले कार्यों की केस स्टडीज़ को आधार बनाकर एक पुस्तक ‘पॉवर्टी एंड फ्रीडम: केस स्टडीज़ ऑन ग्लोबल इकोनॉमिक डेवलपमेंट’ तैयार की गई है। इस पुस्तक का संपादन एटलस नेटवर्क के प्रेसिडेंट मैट वार्नर ने किया है। इस पुस्तक को हाल ही में भारत में हिंदी संस्करण जारी किया गया है, जिसे थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी और उदारवादी वेबपोर्टल आज़ादी.मी के द्वारा प्रकाशित किया गया है।  

पुस्तक में नब्बे के दशक में वियतनाम में निम्न आय वर्ग के परिवारों के बच्चों में कुपोषण की जांच और उसके उन्मूलन के लिए ‘सेव द चिल्ड्रेन’ नामक गैरलाभकारी संस्था की ओर से कार्य कर रहे जैरी व मैनिक्यू स्टेरनिंस के अनुभवों का हवाला दिया गया है। स्टेरनिंस ने बाकायदा ‘द पॉवर ऑफ पॉजिटिव डिवियंस : हाउ अनलाइकली इनोवेटर्स सॉल्व द वर्ल्ड्स टफेस्ट प्रॉब्लम्स’ नामक पुस्तक लिखकर गरीबी हटाने के उपरोक्त प्रचलित दृष्टिकोण को गैरकारगर बताया है। स्टेरनिंस के मुताबिक सामाजिक समस्याओं पर काम करते वक्त सबसे बड़ी विसंगति यह है कि हम यह नहीं स्वीकारते कि स्थानीय स्तर पर समस्या के समाधान के विकल्प मौजूद हैं।

इस पुस्तक में अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के द्वारा गरीबी जैसी समस्याओं के कारगर न रहने के कारणों पर भी विस्तार से चर्चा की गई है। मैट वार्नर इसे ‘आउटसाइडर्स डिलेमा’ यानी कि वाह्य घटकों की दुविधा की संज्ञा दी है। पुस्तक में उन्होंने बताया है कि किस प्रकार विदेशी लोग स्थानीय लोगों के अनुभवों और जानकारियों की अनदेखी करने लगते हैं और अपनी राय उनपर थोपना शुरु कर देते हैं। इसी कारणवश लोग उनपर अविश्वास करना शुरु कर देते हैं।

पुस्तक की शुरुआत हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के लेंट प्रिचेट के कोट ‘आमतौर पर दुनिया में कोई व्यक्ति गरीब नहीं होता है, ये लोग हैं जो गरीब स्थानों पर रहते हैं’ से होती है।