दुनिया में गरीबी का आखिरी गढ़

पिछले सप्ताह विश्व बैंक ने विश्व में गरीबी की स्थिति पर एक रिपोर्ट जारी की। मनुष्य होने के नाते इस दस्तावेज को पढ़ना आनंददायी रहा, क्योंकि इससे पता लगता है कि कितनी तेजी से हर जगह भीषण गरीबी कम हो रही है। लेकिन, भारत के नागरिक के रूप में रिपोर्ट को पढ़ना निराशाजनक रहा। इसके कारणों पर हम आगे चर्चा करेंगे। पहले अच्छी खबर पर बात करें। 1981 में 1.9 अरब लोग भीषण गरीबी की स्थिति में रह रहे थे, मतलब यह कि प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति खर्च बमुश्किल ३क् रुपए था। लेकिन 2010 तक बेहद गरीब लोगों की संख्या घटकर 1.2 अरब रह गई।  

हालांकि, इस अवधि में विश्व की आबादी में 2.3 अरब की बढ़ोतरी हुई। दूसरे शब्दों में 2010 में विश्व की आबादी में बेहद गरीब लोगों का प्रतिशत केवल 18 था, जो तीन दशक पहले के 42 प्रतिशत से कम है। यदि आप केवल विकासशील देशों पर गौर करें तो गिरावट और अधिक नाटकीय है। इन देशों में अत्यंत गरीब लोगों की संख्या 50 प्रतिशत से गिरकर 21 प्रतिशत हो गई। वस्तुत: 2015 तक विश्व की गरीबी को आधा करने का सदी का विकास लक्ष्य निर्धारित समय से पांच साल पहले हासिल कर लिया गया। भारत में भी इस अवधि में गरीबी की दर में तेजी से गिरावट आई है। 1981 में आबादी के 60 प्रतिशत से घटकर 2010 में गरीबों की संख्या 22 प्रतिशत रह गई।

अत्यंत गरीब भारतीयों की संख्या 42 करोड़ 90 लाख से घटकर 40 करोड़ रह गई। हालांकि, इस दौरान हमारी कुल आबादी 50 करोड़ 70 लाख  बढ़कर 1.2 अरब हो गई। यदि भारत में गरीबों की संख्या कम हो रही है और हमारी आबादी बढ़ रही है, तब भी विश्वबैंक की रिपोर्ट से हमें असुविधा क्यों होनी चाहिए? इसका जवाब विश्व के बेहद गरीब लोगों में हमारी हिस्सेदारी के संबंध में विश्वबैंक की रिपोर्ट से निकले आंकड़ों में है। 1981 में विश्व के 22 प्रतिशत गरीब भारत में रहते थे। लेकिन, 2010 तक यह संख्या 33 प्रतिशत हो गई। मतलब यह कि विश्व के तीन में से अत्यंत गरीब लोगों में से एक भारतीय है, जबकि हर छह में से एक मनुष्य भारतीय है।

 केवल एक अन्य क्षेत्र सब सहारन अफ्रीका ने विश्व में गरीबों की तादाद में इजाफा किया है, जहां 1980 में विश्व के अत्यंत गरीब लोगों की संख्या 11 प्रतिशत थी, लेकिन 2010 में विश्व के 34 प्रतिशत गरीब यहां रहते थे। इन दोनों क्षेत्रों में विश्व के दो तिहाई गरीब बसते हैं। यह एकदम स्पष्ट है कि अगर कोई विश्व में गरीबी से संघर्ष करना चाहता है तो उसे भारत और सब सहारन अफ्रीका पर ध्यान केंद्रित करना पड़ेगा। जो देश निकट भविष्य में महाशक्ति का दर्जा पाना चाहता है, उसके लिए यह गंभीर विचार-मंथन का विषय है।

 सवाल है, गरीबी की दर में गिरावट और अत्यंत गरीब लोगों की संख्या कम होने के बावजूद यह कैसे हो रहा है कि भारत में विश्व के गरीबों की बहुत अधिक संख्या रह रही है? कारण यह है कि सब सहारन अफ्रीका को छोड़कर बाकी विश्व में हमारी तुलना में तेजी से गरीबी कम हो रही है। यहां एक चौंकानेवाला उदाहरण पेश है। 1981 में 84 प्रतिशत चीनी बेहद गरीब थे, जबकि ऐसे भारतीयों का प्रतिशत केवल 60 था। लेकिन, 2010 में स्थिति बदल गई। केवल 12 प्रतिशत चीनी गरीब रह गए और भारतीयों का प्रतिशत 33 रहा।

अगर कोई यह कहता है कि एकाधिकारवादी चीन एक अपवाद है और हमें उससे अपनी तुलना नहीं करनी चाहिए, तब हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि केवल चीन ने ही हमें पीछे नहीं छोड़ा है। समूचे पूर्व एशिया ने हमें पीछे छोड़ दिया है। 1981 में पूर्व एशिया(चीन को छोड़कर) में गरीबी की दर भारत से एक प्रतिशत ज्यादा यानी 61 थी। 2010 में उसकी गरीबी दर गिरकर 13 प्रतिशत हो गई। यह भारत से आधे से भी कम है। उदाहरण के लिए वियतनाम जैसे देश ने पिछले दो दशकों में अपनी गरीबी की दर को 60 से घटाकर 21 प्रतिशत कर लिया। हकीकत में भारत को अलग करके देखें तो दक्षिण एशिया का प्रदर्शन बेहतर रहा है। यहां गरीबी 1981 के 66 प्रतिशत से घटकर 2010 में 26 प्रतिशत रह गई। कम से कम गरीबी घटाने के संबंध में भारत इस क्षेत्र को आगे ले जाने वाला इंजिन नहीं, बल्कि धीमी गति से चलने वाला डिब्बा है, जो इसे पीछे खींच रहा है।

हमें विश्व बैंक की रिपोर्ट पर क्या पहल करनी चाहिए और उससे कौन से सबक सीखने चाहिए? एक मुख्य बात यह है कि अन्य विकासशील देशों की तुलना में भारत के शहरीकरण की गति अत्यंत धीमी है। भारत की शहरी आबादी उसकी कुल आबादी का केवल 30 प्रतिशत है। दूसरी तरफ चीन और यहां तक कि इंडोनेशिया में 51 प्रतिशत लोग शहरों में रहते हैं। दुनिया में कोई भी बड़ा देश अपने लोगों को खेती-किसानी से हटाकर शहरों में अति उत्पादकता वाले औद्योगिक क्षेत्रों से जोड़े बगैर बड़े पैमाने पर गरीबी हटाने में सफलता हासिल नहीं कर सका है।

भारत में शहरी और औद्योगिक वृद्धि दर सरकारी नीतियों के कारण अवरुद्ध है। ये नीतियां निजी कंपनियों की प्रगति में रुकावट डालती हैं। आधारभूत ढांचे को अपंग बनाती हैं और युवाओं के कौशल विकास की अनदेखी करती हैं। सच तो यह है कि सरकार ने दूसरा रास्ता चुना है। वह ग्रामीण इलाके के लोगों को झूठी उम्मीदों का सहारा देने के लिए तोहफे बांट रही है और योजनाएं शुरू कर रही है। ऐसा करके वह ग्रामीणों को आगे और ऊपर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने के बजाय वहीं ठहरे रहने का प्रलोभन देती है।

 

- टोनी जोसेफ (बिजनेसवर्ल्ड के पूर्व संपादक और मीडिया सर्विस फर्म के चेयरमैन)

सभारः दैनिक भास्कर

<p>टोनी जोसेफ</p>