मर्ज बढ़ता गया, ज्यों ज्यों दवा की...

वैश्विक गांव में तब्दील हो चुकी दुनिया के तमाम देश जहां वस्तुओं, सेवाओं व खाद्यान्नों की विनिमय प्रक्रिया को अपनाकर देश को प्रगति व देशवासियों को समृद्धि की ओर अग्रसर करने में जुटे हैं वहीं, आश्चर्यजनक रूप से हमारे देश के कुछ राजनैतिक दलों और उनके समर्थकों का अब भी मानना है कि बाजार का नियमन कर कीमतों को नियंत्रित किया जा सकता है। कम से कम पश्चिम बंगाल में आलू की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए राज्य सरकार द्वारा उठाये जा रहे कदम तो यही साबित करते हैं। ममता बनर्जी सरकार ने राज्य में आलू की लगातार बढ़ती कीमतों से निबटने के लिए कीमतों पर सरकारी नियंत्रण लगाया है। आलू के थोक व फुटकर भाव क्रमशः 11 रूपए व 12 रूपए प्रति किलो तय किए गए हैं।

महंगाई की मार झेल रही जनता को राहत दिलाने के लिए किए गए प्रयास का नतीजा ये हुआ कि आलू बाजार से ही गायब हो गया। कोई फुटकर विक्रेता 12 रूपए किलो आलू बेचने को तैयार ही नहीं था, क्योंकि मंडी से 11 रूपए किलो आलू खरीदकर किराया भाड़ा आदि लगाकर 12 रूपए किलो बेचने का कोई मतलब ही नहीं बनता था। लेकिन सरकार अपनी जिद पर अड़ी रही। फैसला लिया गया कि सरकार के नुमाइंदे मंडी से 11 रुपए किलो आलू खरीदकर सरकारी वाहन से बाजार में लाकर फुटकर विक्रेताओं को देंगे। फुटकर विक्रेता उसे 12 रूपए किलो की दर से बेचेंगे। लेकिन ऐसा भी न हो सका। कायदे से तो इन उपायों के कारण आलू की कीमतें कम हो जानी चाहिए थीं लेकिन मंडी से भी आलू विक्रेता गायब हो गए। कारण यह कि सरकार को आलू बेचने के तमाम नुकसान थे।

फुटकर दुकानदार जहां आलू कैश देकर खरीदते हैं वहीं सरकार आलू के बदले उनके मूल्यों के बराबर के चेक देती है। साथ ही पैन नंबर सहित तमाम तरह के फार्म, खरीद बिक्री की सहमति, पावती रसीद जैसी तमाम प्रक्रियाएं भी अपनाई जाती हैं, जो कि एक आलू विक्रेताओं के लिए झंझट से भरा कार्य होता है। तमाम परेशानियों से बचने के लिए थोक व्यापारियों ने आलू बेचने के काम से ही तौबा कर लिया। उधर, सरकार भी ये समझने को तैयार नहीं है कि वाहन चाहे सरकारी हों या निजी ईंधन का खर्च कुल लागत में ही जोड़ा जाता है। यदि यह खर्च सरकार वहन करती है तो ये एक प्रकार की सब्सिडी ही हुई। उपर से तुर्रा ये कि सब्सिडी का फायदा किसी को नहीं मिल रहा। बेहतर होता कि सरकार अप्रत्यक्ष सब्सिडी पर होने वाली खर्च को सीधे आलू विक्रेताओं या उपभोक्ताओं को ही उपलब्ध करा देती। लोग अपने पसंद की जगह से आलू खरीद लेते। लेकिन सरकार तो सरकार ठहरी। वह लोगों को विकल्प क्यों उपलब्ध कराने लगी? 

परिणाम ये हुआ कि आलू को लेकर अब भी लड़ाई जारी है। कभी सरकार और आलू विक्रेताओं का तो कभी आलू विक्रेताओं और ग्राहकों के बीच। महंगाई से त्रस्त लोगों द्वारा आलू व सब्जियों को बाजार से लूटना। यह सब दर्शा रहा है कि स्थिति कितनी खराब है। सरकार यहां भी नहीं रुकी और आलू को प्रदेश से बाहर बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया।

उधर, व्यापारी भी क्यों कम रहते। कीमत नियंत्रित करने को पश्चिम बंगाल से आलू निर्यात पर जारी प्रतिबंध को असंवैधानिक बताते हुए व्यवसायी सरकार के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने की तैयारी में है। राज्य सरकार द्वारा प्रतिबंध के लिए जारी अधिसूचना के खिलाफ व्यवसायी हाईकोर्ट जा रहे हैं। भारत के संविधान में किसी भी राज्य के अंदर व बाहर हर नागरिक को व्यवसाय करने का अधिकार है। व्यवसायियों का कहना है कि यह प्रतिबंध उक्त अधिकार का हनन है। इसी को आधार बना कर आलू व्यवसायियों का एक वर्ग सरकार के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने पर आमादा है।

अवकाश प्राप्त न्यायाधीश भगवती प्रसाद बनर्जी का कहना है कि संविधान की धारा 301 के तहत देश के हर नागरिक को राज्य में या फिर अन्य राज्यों में अबाध व्यवसाय करने का अधिकार है। इस अधिकार पर कोई भी राज्य किसी तरह का प्रतिबंध, रोक या फिर शर्त नहीं लगा सकती। परंतु, धारा 304 के अनुसार राज्यों को प्रतिबंध लगाने के लिए अधिकार सीमित है, पर कानूनी रूप से रोक लगाने के लिए उसका अनुमोदन राष्ट्रपति से लेना आवश्यक है। बंगाल सरकार ने आलू पर प्रतिबंध के लिए जो अधिसूचना जारी की है, उसके लिए राष्ट्रपति से अनुमोदन नहीं लिया गया है। आखिर राज्य सरकार ने अनुमोदन क्यों नहीं लिया? क्या बिना कानूनी मशविरा लिए ही ऐसा किया गया? ऐसे कई सवाल उठ रहे हैं। हालांकि बाजार की सहज मांग और आपूर्ति प्रणाली पर विश्वास करने की बजाय सरकार व नीति निर्धारकों द्वारा अब भी यह माना जा रहा है कि सरकार ने जो फैसला किया था, उसके पीछे लोगों के हितों की रक्षा की बात है। क्योंकि आलू की कीमतें आसमान छूने लगी थी। आलू का यदि निर्यात जारी रहता तो शायद स्थिति जो अब धीरे-धीरे सामान्य हो रही है वह नहीं होती।

 

- अविनाश चंद्र