दलबदल का दंश

आज जिस तरह नेतागण दलबदल कर रहे हैं, उससे भारतीय राजनीति के चरित्र को लेकर कुछ जरूरी सवाल खड़े हो गए हैं। अब जैसे कांग्रेस से बीजेपी में कलैया मारने वाले उत्तराखंड के सतपाल महाराज का उदाहरण लें। उनका कहना है कि वह राज्य में आई प्राकृतिक आपदा के दौरान राहत कार्यों के वितरण में हुई गड़बड़ियों से नाराज हैं। यह नाराजगी उन्होंने इतने दिन छुपाकर क्यों रखी? बदइंतजामी की याद उन्हें चुनाव के मौके पर ही क्यों आई? राहत कार्यों का वितरण एक प्रशासनिक मामला है। इसके लिए तत्कालीन राज्य सरकार जिम्मेदार मानी जाएगी। फिर वे पूरी कांग्रेस पार्टी को दोषी क्यों मान रहे हैं? जाहिर है, उनके लिए सत्ता महत्वपूर्ण है। बीजेपी की लहर दिखी तो उन्होंने कमल पकड़ लिया। 
 
उधर दिग्गज कांग्रेसी बूटा सिंह बीजेपी में जाते-जाते समाजवादी पार्टी में चले गए। सिर्फ इसलिए कि वहां उन्हें टिकट मिलने की गारंटी नजर आई। सत्ता तक पहुंचने की थोड़ी भी संभावना देखकर उन्होंने उस पार्टी को ठुकराने में जरा भी देर नहीं लगाई, जिसमें जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा गुजारा है। इसी तरह अनेक छोटे-बड़े कांग्रेसी नेता बीजेपी की बढ़त को भांपकर उसमें चले आए हैं। रामविलास पासवान जैसे नेता ने बीजेपी से गठबंधन कर लिया ताकि हर बार की तरह इस बार भी किसी न किसी मंत्रालय में उनकी जगह पक्की रहे। उलटी बयार केवल छत्तीसगढ़ में बही, जहां पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी करुणा शुक्ला बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गईं।
 
कांग्रेस और बीजेपी देश की दो अहम राष्ट्रीय पार्टियां हैं। ये अलग-अलग विचारधाराओं के प्रतिनिधित्व का दावा करती हैं। खासकर बीजेपी इस बात को जोर-शोर से कहती है कि वह कांग्रेसी संस्कृति के सख्त खिलाफ है। लेकिन उसी कांग्रेसी संस्कृति में रचे-बसे नेताओं को अपनाने में उसे जरा भी हिचक नहीं होती। उसका सिर्फ एक मकसद है- चुनाव में जीत हासिल करना। राजनीति में नैतिकता जैसी कोई चीज अब नहीं रह गई है। दलबदल के लिए सुविधाजनक तर्क ढूंढ लिए जाते हैं। इस बार दलबदलुओं ने दोनों प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों में सिद्धातों के थोड़े बहुत फर्क को धो-पोंछ कर किनारे कर दिया है। अब बीजेपी और कांग्रेस दो विचारों की जगह सियासत का धंधा करने वालों दो गुटों की तरह नजर आ रही हैं। हवा के रुख के हिसाब से इनमें आपसी आवाजाही जारी रहेगी।
 
समाजवाद, सेक्युलरिज्म जैसे मुहावरे जंग खाए साइनबोर्ड जैसे दिखने लगे हैं। गौर से देखें तो दलबदल एक ढाल भी है। कई दागी नेता बीजेपी के खेमे में सिर्फ इसलिए आ रहे हैं ताकि बीजेपी को सत्ता मिलने पर वे कानूनी फंदे से बच सकें। बीजेपी या दूसरे कई दल ऐसे नेताओं को अपने यहां जगह देकर नैतिकता को ही नहीं, कानून को भी मुंह चिढ़ा रहे हैं। कर्नाटक के पूर्व सीएम बीएस येदियुरप्पा को जेल जाता देख उन्हें पार्टी से निकाला गया, लेकिन सियासी जरूरत के तहत उन्हें फिर इज्जत से वापस भी बुला लिया गया। जनता सब कुछ देख रही है। चुनाव चाहे कोई जीते या हारे, लेकिन राजनीतिक पार्टियों के प्रति लोगों का सम्मान तेजी से कम हो रहा है।
 
 
साभारः नवभारत टाइम्स