राजनीतिक दलों की असलियत

राजनीतिक दलों को सूचना अधिकार (आरटीआइ) के दायरे में लाने के केंद्रीय सूचना आयोग (सीआइसी) के हालिया फैसले से यह पुष्टि हो गई है कि अधिकांश राजनीतिक दल धनराशि जुटाने, पार्टी टिकट देने और इस प्रकार के अन्य अंतर्दलीय मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही के खिलाफ हैं। सबसे अधिक निराशा यह देखकर हुई कि कभी खुद को अलग तरह की पार्टी बताने वाली भारतीय जनता पार्टी भी घोटालों की दागी कांग्रेस की राह पर चल रही है और आदेश की वैधानिकता पर सवाल उठाकर कांग्रेस को बचाने का प्रयास कर रही है। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस ने सीआइसी के आदेश को एडवेंचरिस्ट बताया और यह अजीबोगरीब बयान जारी किया कि राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता की मांग करने वाला आदेश लोकतांत्रिक संस्थानों को चोट पहुंचाएगा क्योंकि इससे दलों की निजता भंग होगी। शुरू में इस आदेश का समर्थन करती दिख रही भाजपा का एक दिन बाद ही रुख पलट गया और इसने तर्क गढ़ लिए कि आदेश में बहुत से बिंदु अस्पष्ट हैं और इसमें चुनाव आयोग व सीआइसी के अधिकारों का अतिक्रमण हो रहा है।

माकपा ने भी इस आदेश को अस्वीकार्य करार दिया। जनता दल (यू) का कहना है कि वह इस कदम के बिल्कुल खिलाफ है। सुनवाई के दौरान केवल भाकपा ने राजनीतिक दलों के धन संग्रह में पारदर्शिता का समर्थन किया था, लेकिन सीआइसी के आदेश के बाद इसकी भी भाषा बदल गई। इसके सचिव डी राजा ने आदेश को विवादित बताया। राजनीतिक तबके की प्रतिक्रियाओं से एक बात बिल्कुल स्पष्ट है कि वे लोगों को यह जानने से वंचित करने का पुरजोर प्रयास करेंगे कि उन्हें कितना धन मिलता है और कहां से मिलता है। क्या इतने महत्वपूर्ण विषय को गोपनीय के पर्दे में छिपाना उचित है? कांग्रेस प्रवक्ता जनार्दन द्विवेदी का दावा है कि सीआइसी आदेश राजनीतिक दलों की निजता को प्रभावित करेगा। उनकी फिजूल की चिंता के कारण इस तथ्य से स्पष्ट हो जाते हैं कि राजनीतिक दलों द्वारा जमा की गई राशि में से 80 प्रतिशत के व203ओत संदिग्ध हैं और इनका चुनाव आयोग में खुलासा नहीं किया जाता। यह मुद्दा सबसे पहले एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स (एडीआर) के अनिल बैरवाल ने उठाया था। अक्टूबर, 2010 में उन्होंने आरटीआइ के माध्यम से भारत के छह राष्ट्रीय दलों से बड़े दानकर्ताओं के नाम बताने को कहा। कांग्रेस ने यह कहकर सूचना देने से मना कर दिया कि वह आरटीआइ के दायरे में नहीं आती। एनसीपी ने कहा कि इस प्रकार के असामान्य सवालों का जवाब देने के लिए उसके पास स्टाफ नहीं है। भाजपा, बसपा और माकपा ने कोई जवाब ही नहीं दिया। भाकपा एकमात्र दल रहा जिसने दस बड़े दानकर्ताओं के नाम बताए। मई 2011 में एससी अग्रवाल ने भाजपा और कांग्रेस से जानकारी मांगी कि घोषणापत्र में किए गए वादों में से कितने पूरे किए गए और प्रमुख दानकर्ता कौन हैं? दोनों दलों ने इस दलील पर सूचना देने से इन्कार कर दिया कि वे आरटीआइ के दायरे से बाहर हैं।

इसके पश्चात आरटीआइ दायर करने वालों ने केंद्रीय सूचना आयोग में याचिका दायर की और निर्देश देने को कहा कि क्या राजनीतिक दल सार्वजनिक संस्थानों और आरटीआइ के अनुच्छेद 2(एच) के दायरे में आते हैं? मामले की जटिलता को देखते हुए मुख्य सूचना आयुक्त ने आयोग की पूर्ण पीठ गठित की, जिसकी अध्यक्षता मुख्य सूचना आयुक्त सत्येंद्र मिश्र ने की। सूचना आयुक्त एमएल शर्मा और अन्नपूर्णा दीक्षित भी पीठ में शामिल थे।

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि राजनीतिक दल भी सार्वजनिक संस्थान हैं और इसलिए आरटीआइ के दायरे में आते हैं। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों का संवैधानिक और कानूनी दर्जा है, ये ही सरकार सरकार बनाते हैं और रेडियो व दूरदर्शन पर मुफ्त समय, आयकर में छूट तथा नाममात्र की कीमत पर भवन व जमीन मिलने के कारण ये सार्वजनिक संस्थानों की सूची में शामिल हैं। उन्होंने बताया कि राजनीतिक दलों को केवल 20 प्रतिशत आय ही दान के माध्यम से मिलती है और इसी की घोषणा वे चुनाव आयोग में करते हैं। शेष 80 फीसद आय का व203ओत गोपनीयता के आवरण में है। इसी के कारण राजनीति में काला धन खपने की धारणा बनी है। याचिकाकर्ता अनिल बेरीवाल ने छहों राष्ट्रीय दलों का आय-व्यय का लेखा-जोखा पेश किया जिसमें दलों को मोटा मुनाफा हुआ था। उन्होंने बताया कि 2006-07 के बाद के तीन वर्षो के दौरान ही कांग्रेस को 300 करोड़ रुपये की कर छूट मिली, जबकि भाजपा को 141 करोड़ रुपये की। बसपा को कर छूट में 40 और माकपा को 18 करोड़ रुपये का फायदा हुआ। इसी प्रकार 2009 के चुनाव के दौरान आल इंडिया रेडियो पर राजनीतिक दलों को 28.56 लाख रुपये का मुफ्त समय दिया गया जबकि दूरदर्शन पर 10.75 करोड़ रुपये का।

सरकार की ओर से राजनीतिक दलों को असल फायदा मिला भूमि और भवन के रूप में। कोड़ियों के भाव बेशकीमती भवन किराये पर और जमीन लीज पर दी गई है। बेरीवाल ने गणना की कि मौजूदा बाजारू दरों पर कांग्रेस को 1036 करोड़ रुपये, भाजपा को 557, माकपा को 241, भाकपा को 78 और राष्ट्रीय जनता दल को 123 करोड़ रुपये का फायदा हुआ है। दिल्ली में राजनीतिक दलों को दिए गए भूखंडों का वर्तमान मूल्य 2556 करोड़ रुपये है। आयोग ने इसकी प्रतिक्रिया के लिए तमाम राष्ट्रीय दलों को लिखा, लेकिन उन्होंने सीआइसी के सवालों का जवाब देने की जहमत नहीं उठाई। अपने आदेश में सीआइसी ने कहा कि आरटीआइ कानून का लक्ष्य प्रत्येक सार्वजनिक अधिसत्ता की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देना है। इसके अलावा इसका उद्देश्य नागरिक में सजगता बढ़ाने, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और सरकार व उसके उपकरणों को शासन के प्रति जवाबदेह बनाना है। राजनीतिक दल महत्वपूर्ण राजनीतिक संस्थान हैं, इसलिए वे आरटीआइ के दायरे में आते हैं।

केंद्रीय सूचना आयोग के आदेश ने तमाम राजनीतिक दलों को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनने का मौका दिया है। दुर्भाग्य से, भाजपा और कम्युनिस्ट भी कांग्रेस की धारा में बहे जा रहे हैं जिस पर भारत के इतिहास में अब तक की सबसे भ्रष्ट सरकार चलाने का दाग लगा हुआ है। क्या ये दल समझ से काम लेंगे और क्या लोग देख पाएंगे कि कम से कम एक प्रमुख राजनीतिक दल तो ‘अलग तरह की पार्टी’ साबित होगा।

 

- ए. सूर्यप्रकाश (लेखक संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)

साभारः दैनिक जागरण