घोषणापत्रों की सार्थकता

मतदान के पहले चरण से आठ दिन पहले तक इस आम चुनाव में सत्ता के सबसे बड़े दावेदार दल भारतीय जनता पार्टी ने अपना घोषणा-पत्र जारी नहीं किया है। कांग्रेस ने केवल ग्यारह दिन पहले जनता के सामने अपनी नीतियों, कार्यक्रमों एवं वादों का दस्तावेज पेश किया। क्या यह व्यावहारिक रूप से संभव है कि इतने कम समय में इस पुलिंदे को ये पार्टियां देश के कोने-कोने तक पहुंचा पाएंगी? या हर चुनाव के पहले घोषणा-पत्र जारी करना सिर्फ औपचारिकता बन कर रह गया है?
 
ये प्रश्न इस खबर से और गंभीर हो गए हैं कि भाजपा ने अपना बहुचर्चित दृष्टि पत्र (विजन डॉक्यूमेंट) अब चुनाव तक न जारी करने का फैसला किया है। राजनैतिक पार्टियों द्वारा घोषणापत्र जारी करने में की जा रही देरी क्या ये बताने के लिए काफी नहीं कि कि नीतियों और लक्ष्यों के बजाय चेहरों और चुनावी समीकरणों पर ही इन्हें ज्यादा भरोसा है। जबकि मतदाताओं ने समय समय पर उन्हें झटके देकर यह साबित करने प्रयास किया है कि अब वे उसी को वोट देंगे जो विकास की बात करेगा। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से राजनैतिक दल इस बात को समझने की कोशिश नहीं कर रहे। वे अब भी ये माने बैठे हैं कि भारतीय मतदाता सरकार के कामकाज को उतनी तरजीह नहीं देते। उनका अब भी यह मानना है कि धनबल, बाहुबल और जातीय/धार्मिक समीकरण ही सत्ता तक पहुंचने की कुंजी है। अपराधियों, भ्रष्टाचारियों, दलबदलुओं को टिकट देने के पीछे क्या यही मानसिकता काम नहीं करती? इसके अलावा  चूंकि घोषणापत्रों के हवाई वायदे जमीनी हकीकत से अलग होने के कारण चुनाव आयोग की सतर्क निगाहों में भी आएंगे, इसलिए भी शायद कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियां ठोक-बजाकर घोषणापत्र जारी करना चाहती हैं।
 
लेकिन यह क्यों न मानें कि इन पार्टियों के लिए घोषणापत्र का आनुष्ठानिक महत्व ही है। अलबत्ता जिन राजनीतिक दलों ने अपने घोषणापत्र जारी कर दिए हैं, उन्हें कितनी गंभीरता से लिया जाए? अन्नाद्रमुक ने बहुत पहले इस दिशा में पहल की थी। केंद्र की सत्ता में आने पर जहां उसने पूरे देश के मतदाताओं को मुफ्त में मिक्सर-ग्राइंडर बांटने का वायदा किया है, वहीं उसके घोषणापत्र में दस करोड़ रोजगार और स्वतंत्र तमिल ईलम के गठन का दावा भी है। इस घोषणापत्र में मतदाता को अपने एजेंडे के प्रति आश्वस्त करने के बजाय लालच देने का भाव ही है।
 
माकपा ने शिक्षा और स्वास्थ्य पर जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा खर्च करने का वायदा है। लेकिन नंदीग्राम और सिंगुर में किसानों से जबरन जमीन छीनने वाली पार्टी को अब इस मामले में किसानों की सहमति की जरूरत याद आई है! ठेठ बंगाल की राजनीति करने वाली तृणमूल कांग्रेस ने 'रोटी, कपड़ा और मकान' के पुराने नारे के जरिये राष्ट्रीय राजनीति में वैसी ही दखलंदाजी का इरादा जताया है, जैसा अन्नाद्रमुक जता रही है।
 
जयललिता की तरह ममता बनर्जी ने भी घोषणापत्र में विदेश नीति और अर्थनीति पर अपनी पार्टी का नजरिया सामने रखा है। लेकिन जो सरकार पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था को उबारने में कामयाब नहीं हो पाई है, उससे राष्ट्रीय स्तर पर कोई किस स्तर की अर्थनीति की उम्मीद करेगा? ये घोषणापत्र इन्हें जारी करने वाली राजनीतिक पार्टियों के लिए मुफीद हो सकते हैं, लेकिन मतदाताओं के लिए इनका बहुत महत्व शायद ही है।
 
 
- अविनाश चंद्र