राजनीतिक दलों की नीति और चंदे की राजनीति

जानकारी के मुताबिक पिछले पांच वर्षों के दौरान भारतीय कंपनियों ने छह बड़े राजनीतिक दलों को 4,400 करोड़ रुपये से अधिक धनराशि दान में दी है। इन दलों के नाम हैं- कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), बहुजन समाज पार्टी (बसपा), माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा), समाजवादी पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा)। भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा जुटाए गए ये आंकड़े टाइम्स ऑफ इंडिया समाचार पत्र द्वारा प्रकाशित किए गए हैं। राजनीतिक दलों को जिस पैमाने पर धन की आवश्यकता होती है उस लिहाज से देखा जाए तो यह धनराशि काफी कम प्रतीत होती है। लेकिन यह याद रखना होगा कि कारोबारी घरानों द्वारा दिया जाने वाला चंदा राजनीतिक दलों को कई स्रोतों से मिलने वाले चंदे का महज एक हिस्सा होता है।

इसके बावजूद भारतीय कंपनियों की ओर से राजनीतिक दलों को मिलने वाली आर्थिक सहायता का आंकड़ा कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। अनुमान के मुताबिक कांग्रेस को लगभग 1,660 करोड़ रुपये की राशि मिली। पिछले पांच सालों के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों को मिलने वाली धनराशि में यही सबसे बड़ा हिस्सा था। बसपा तकरीबन 1,226 करोड़ रुपये की धनराशि के साथ दूसरे स्थान पर रही। इसके बाद भाजपा 852 करोड़ रुपये, माकपा 335 करोड़ रुपये, समाजवादी पार्टी 200 करोड़ रुपये और राकांपा 140 करोड़ रुपये का क्रम था। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो कारोबारी घरानों की ओर से छह प्रमुख राजनीतिक दलों को मिलने वाला चंदा वर्ष 2007-08 से 2011-12 के दौरान औसतन हर वर्ष 870 करोड़ रुपये रहा।

इस आंकड़े में दो तथ्य चौंकाने वाले हैं। पहला, माकपा जैसे राजनीतिक दल को हर वर्ष औसतन 67 करोड़ रुपये का चंदा मिला। सवाल यह उठता है कि माकपा को आखिर किन कंपनियों ने चंदा दिया होगा? यह हकीकत है कि वाम मोर्चा पश्चिम बंगाल और केरल में कई वर्षों तक सत्ता में रहा है और इस अवधि में कई कंपनियों ने अपने चंदे के जरिये माकपा को प्रसन्न करने की कोशिश की होगी। लेकिन माकपा का बिना किसी हिचकिचाहट के कारोबारी घरानों द्वारा दिया जाने वाला चंदा स्वीकार करना एक ऐसी स्थिति को दर्शााता है जिसमें यह कहा जा सकता है कि इसका असर पार्टी की कारोबारी और आर्थिक नीतियों पर भी लाजिमी तौर पर पड़ेगा। या फिर शायद इसका असर दिखाई देने भी लगा है और दान के आंकड़े बदलाव की वजह की पुष्टि ही करते हैं।

बसपा हर वर्ष 245 करोड़ रुपये जुटाने में कामयाब रही। इससे अधिक सालाना चंदा केवल कांग्रेस ने जुटाया, जिसकी चंदे की राशि हर वर्ष 330 करोड़ रुपये से अधिक रही। बसपा चंदा जुटाने के मामले में भाजपा से आगे कैसे रही? भाजपा ने चंदे के रूप में सालाना 170 करोड़ रुपये जुटाए। ऐसा लगता है कि निर्वाचन आयोग के पास बसपा को चंदा देने वाली कंपनियों में से किसी के बारे में कोई जानकारी नहीं है। पिछले पांच वर्षों के दौरान बसपा ने चंदे के रूप में जो भी धनराशि एकत्रित की है वह 20,000 रुपये के गुणक में या उससे कम रही है। इस वजह से बसपा के लिए अपने चंदे के स्रोत का खुलासा करना जरूरी नहीं है। ऐसे में हो सकता है कुछ कंपनियों ने बसपा को चंदा दिया हो लेकिन किसी को उन कंपनियों की पहचान अथवा उनके द्वारा दिये गए चंदे के बारे में कोई जानकारी नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि शेष राजनीतिक दलों ने ऐसे कारोबारी चंदे का पूरा खुलासा कर दिया हो। यहां तक कि माकपा ने भी ऐसा नहीं किया है। अधिकांश कारोबारी चंदे से संबंधित आंकड़ों को राजनीतिक दल गुप्त ही रखते हैं। इस वर्ष के अंत तक दो अन्य राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और उसके बाद जल्द ही देश वर्ष 2014 के आम चुनावों की तैयारी में जुट जाएगा। ऐसे में निर्वाचन आयोग के लिए यह महत्त्वपूर्ण है कि वह राजनीतिक दलों को मिलने वाले कारोबारी चंदे की निगरानी की व्यवस्था को और अधिक सख्त तथा खामी रहित बनाए।

राजनीतिक दलों को कंपनियों की ओर से मिलने वाले चंदे की निगरानी करने वाली नई नीतिगत व्यवस्था को यह ध्यान में रखना चाहिए कि कंपनियां भी अब पहले की तरह ऐसे चंदे को गुप्त नहीं रखना चाहती हैं। बल्कि वे इनके खुलासे करने की मंशा रखती हैं। देश में अब ऐसी अनेक कंपनियां हैं जो राजनीतिक दलों को दिये जाने वाले चंदे का जिक्र अपनी सालाना रिपोर्ट में करती हैं। ऐसे में नए नीतिगत माहौल के लिए यह बहुत महत्त्वपूर्ण होगा कि वह अधिकाधिक कंपनियों को ऐसे खुलासे करने के लिए प्रेरित करे। ऐसे राजनीतिक दलों को कंपनियों से चंदा लेने से रोक दिया जाना चाहिए जो ऐसा चंदा लेना तो चाहते हैं लेकिन जिनको कंपनी के नाम के खुलासे से आपत्ति है। इसके अलावा कंपनियों से राशि एकत्रित करने की प्रक्रिया को भी राजनीतिक दलों के लिए आसान बनाया जाना चाहिए।

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो एक ऐसी व्यवस्था जिसमें कि पांच वर्ष की अवधि के दौरान विभिन्न कंपनियों से 4,400 करोड़ रुपये की धनराशि जुटाने वाले राजनीतिक दलों में से 90 फीसदी इस भारी धनराशि को लेकर किसी तरह का कोई खुलासा नहीं करते हैं, देश के प्रशासन के लिए खतरनाक हो सकती है। कोई राजनीतिक दल सत्ता में हो अथवा नहीं, उसे मिलने वाले सभी तरह के कारोबारी अनुदान को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। देश के लोगों को अधिकार है कि वे यह जान सकें कि क्या किसी खास नीतिगत मुद्दे पर किसी राजनीतिक दल का कदम उसे चंदा देने वाले कारोबारी पक्ष के हितों से प्रभावित हो रहा है अथवा नहीं? यह केवल तभी संभव होगा जब विभिन्न राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे के स्रोत का पूरा खुलासा किया जाएगा। इस मूलभूत राजनैतिक सुधार को लागू करना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि आर्थिक सुधारों को लागू करना। अगर ऐसा होगा तभी राजनीतिक दलों को प्रभावित करने में कंपनियों की भूमिका पारदर्शी तरीके से सामने आ सकेगी। राजनीतिक दलों को कंपनियों के चंदे का स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन केवल तभी जबकि यह जानकारी सबके पास हो कि किस कंपनी ने किस राजनीतिक दल को कितना चंदा दिया है।

- ए के भट्टाचार्य
(हिंदी बिजनेस स्टैंडर्ड से साभार )