सियासत की तंगनजरी

राष्ट्रपति के साहबजादे अभिजीत मुखर्जी का बयान आया, जिसमें उन्होंने इंडिया गेट पर बैठी महिला प्रदर्शनकारियों को इन शब्दों में जलील करने की कोशिश की, ‘मेरी नजरों में ये रंगी हुई (लिपिस्टिक से), घिसी हुई औरतें कॉलेज की छात्राएं बिल्कुल नहीं हो सकतीं।’ यह कह कर वे खुद जलील हुए। लेकिन उनके बयान से कई सवाल पैदा होते हैं, जो मैं अपने आपसे पूछती रही हूं जब से प्रदर्शन शुरू हुए इंडिया गेट पर उस बच्ची के बलात्कार को लेकर।

प्रदर्शनकारी शुरू के दिनों में ज्यादातर नौजवान लड़कियां थीं, जिन्होंने बड़ी शांति से अपना आक्रोश जाहिर करने की कोशिश की। महिलाओं का एक जुलूस दुहाई मांगने के इरादे से राष्ट्रपति भवन तक पहुंचा। अगर उस समय राष्ट्रपति ने उनको दर्शन दिए होते तो मुमकिन है कि मामला आंसू गैस और लाठियों तक पहुंचता ही नहीं। किसी भी बड़े राजनेता ने इंडिया गेट तक आने की तकलीफ की होती और प्रदर्शनकारियों का गुस्सा समझने की कोशिश की होती तो मुमकिन है प्रदर्शनों का सिलसिला घट गया होता अब तक। कहते हैं कि सोनिया गांधी ने देर रात को दर्शन दिया था कुछ छात्रों को। लेकिन किसी ने नहीं देखा तो स्थिति बिगड़ती ही गई और हिंसा तक पहुंच गई। युद्ध का मैदान बन गया राजपथ, जिसमें एक तरफ सरकार की नुमाइंदगी करती पुलिस थी और दूसरी तरफ जनता।

यह देख कर मुझे समझ में आई वह बात जो शायद हमारे राजनेता अभी तक समझ नहीं पाए हैं। एक नए किस्म का ‘आम आदमी’ पैदा हो गया है भारत देश में, एक नए किस्म का मतदाता। उसके मुख्य नक्श ये हैं। मध्यवर्गी है, शहरी है, समृद्ध भारत के सपने देखता है, अपनी तरक्की के सपनों के साथ और तंग आया हुआ है भ्रष्ट राजनेताओं से, रद्दी सरकारी सेवाओं से, अन्याय से। वैसे तो हमने इस नए किस्म के भारतीय नागरिक को देखा अण्णा हजारे के आंदोलन में शामिल होते हुए। लेकिन मौजूद था पहले से, 2009 के लोकसभा चुनाव से।

उस समय इस नए मतदाता ने अपना वोट दिया कांग्रेस पार्टी को भारत के तकरीबन हर शहर में। इस नए मतदाता के वोटों से कांग्रेस की लोकसभा में सीटें 1991 के बाद पहली बार दो सौ से ज्यादा आर्इं। लेकिन न राहुल गांधी इस नए मतदाता को पहचान सके न उनकी अम्मा। उनके सलाहकार, जो अक्सर वामपंथी मिजाज के हैं, उनसे भी कम पहचान सके इन नए मतदाताओं को तो उन्होंने चुनाव नतीजों का विश्लेषण गलत किया।

विश्वास दिलाया कांग्रेस की अध्यक्ष और उनके पुत्र को कि जीत सिर्फ मनरेगा के कारण हुई। तो 2009 के बाद सोनिया जी ने अपनी सलाहकार समिति को सौंप दिया काम गरीबों में और भी खैरात बांटने का। बड़ी-बड़ी समाज कल्याण सेवाएं तैयार हुर्इं, जिनका मकसद था ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों को गरीबी में राहत पहुंचाना। किसी ने शहरों में मध्यवर्गीय आक्रोश की तरफ देखा तक नहीं, जब तक कि अण्णा हजारे का आंदोलन शुरू नहीं हुआ।

फिर ऐसे निकले शहरों में मधयवर्गीय मतदाता कि सारे के सारे राजनीतिक दल दंग रह गए। ऐसा लगने लगा जैसे राजनेताओं का जनता से संपर्क टूट गया हो। जहां राजनेताओं में घबराहट दिखी वहीं सोनिया जी के सलाहकारों में चतुराई। वे अच्छी तरह जानते हैं कि उनकी जो राजनीति है उसमें मध्यमवर्गीय लोगों के लिए कोई जगह नहीं है, क्योंकि उनकी राजनीति में गुरबत का हमेशा-हमेशा के लिए मौजूद रहना जरूरी है।

सो, चिल्लाने लगे ये लोग ऊंची आवाजों में, टीवी पर और अखबारों में भी कि आर्थिक सुधारों का कसूर है सारा कि संपन्नता सिर्फ कुछ मुट्ठी भर लोगों को नसीब हुई है। भारत के ‘आम आदमी’ को कोई लाभ नहीं हुआ है। न आर्थिक सुधारों से और न विदेशी निवेशकों के आने से। इनसे मेरी जब भी भेंट होती है तो मैं पूछती जरूर हूं कि उनके समाजवादी दौर में गरीबी कम हुई थी या इस नए दौर में और अक्सर इस सवाल का उनके पास कोई जवाब नहीं होता है।

सच तो यह है कि भारत में जिस आर्थिक परिवर्तन के कारण तीस करोड़ लोग मध्यम वर्ग में शामिल हुए हैं उस परिवर्तन को बहुत कम राजनेताओं ने समझा है। उनको समझ में आती है सिर्फ पुराने किस्म की राजनीति, जिसमें सरकार को चुनौती देने की हिम्मत कभी भी गरीब जनता में नहीं होती थी। सो, जब प्रदर्शनकारियों ने अपना धरना शुरू किया इंडिया गेट पर और धीरे-धीरे कारवां इतना बढ़ा कि विजय चौक तक फैल गया तो भारत सरकार ने वही किया, जो हमेशा करती आई है: बरसा दिए आंसू गैस के गोले और लाठियां। लेकिन प्रदर्शनकारी नहीं भागे और न आज तक भागे हैं, क्योंकि जमाना भी बदल गया है और जमाने के लोग भी बदल गए हैं। आ गया है जमाना हम जैसी ‘रंगी हुई, घिसी हुई औरतों का’। भागो अभिजीत साहब आपके लिए यह जगह ठीक नहीं।

तवलीन सिंह
(जनसत्ता से साभार)