वादे हैं वादों का क्या?

सुप्रीम कोर्ट ने केरल सरकार के मामले में यह बिलकुल सही कहा कि सरकारों का नीतिगत वायदे कर उनसे मुकरना ठीक नहीं है, लेकिन इसमें संदेह है कि सरकारों और राजनीतिक दलों पर इसका कोई सही असर पड़ेगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि इस तरह का कोई नियम-कानून नहीं है कि राजनीतिक दल चुनाव के दौरान अथवा अपने चुनावी घोषणापत्र के जरिये किस तरह के वायदे कर सकें और किस तरह के नहीं। इस संदर्भ में इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि पिछले कुछ वर्षो से मतदाताओं को लुभावने वायदों से आकर्षित करने के चलन ने कुछ ज्यादा ही जोर पकड़ लिया है। पहले तो लोगों की जरूरतों को पूरा करने, समस्याओं का समाधान करने के ही वायदे किए जाते थे, लेकिन पिछले कुछ समय से उन्हें तरह-तरह की सामग्री और सुविधाएं प्रदान करने के वायदे किए जाने लगे हैं। टेलीविजन, मंगलसूत्र, साइकिल आदि से शुरू हुआ सिलसिला अब लैपटॉप तक आ चुका है।
यह सिलसिला थमेगा, इसकी संभावना कम ही है। संभावना इसलिए और भी कम है, क्योंकि राजनीतिक दल इस तरह की लोक-लुभावन घोषणाओं को अपना अधिकार मानने लगे हैं और इस संदर्भ में वे चुनाव आयोग का भी सहयोग करने के लिए तैयार नहीं। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में इस आशय की एक याचिका भी दाखिल की गई थी कि राजनीतिक दलों को मनमाने आश्वासन करने से रोका जाए। इस पर उसने व्यवस्था बनाने के लिए निर्वाचन आयोग को कुछ निर्देश दिए थे। इस मामले में राजनीतिक दलों का जैसा रुख-रवैया है उसे देखते हुए यह स्पष्ट है कि जब तक सुप्रीम कोर्ट कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं देता तब तक लोक-लुभावन घोषणाओं पर लगाम लगना मुश्किल ही है। इसके विपरीत किस्म-किस्म की सुविधाओं और रियायतों की घोषणाओं का सिलसिला और तेज हो सकता है।
यह स्पष्ट ही है कि राजनीतिक दल इसकी कहीं कोई परवाह नहीं करते कि अगर वे सत्ता में आते हैं तो अपने वायदों को पूरा कर पाने में सक्षम होंगे या नहीं? वे न तो राज्य की आर्थिक स्थिति पर निगाह डालते हैं और न ही संभावित बजट अथवा केंद्रीय सहायता पर। इसके बजाय अब तो वे अपने वायदों को पूरा करने के लिए केंद्र सरकार पर आर्थिक सहायता देने के लिए दबाव डालते हैं। इस क्रम में यह भी देखने को मिल रहा है कि वायदों को आधे-अधूरे ढंग से अथवा कामचलाऊ तरीके से पूरा करने की कोशिश की जाती है और जब ऐसी कोशिश होती है तो जनता खुद को ठगा हुआ महसूस करती है।
बावजूद इसके राजनीतिक दल यही प्रचार करते हैं कि उन्होंने जो घोषणा की थी उसे पूरा कर दिखाया और यदि वे किसी कारण से ऐसा करने में सक्षम नहीं रहते हैं तो इसका दोष किसी अन्य पर मढ़ते हैं। राज्य सरकारों के लिए केंद्र को दोषी ठहराना सबसे आसान होता है। मुश्किल यह है कि केंद्रीय सत्ता का नेतृत्व करने वाले दल भी इस तरह की घोषणाएं करने में पीछे नहीं हैं। इस तरह की घोषणाएं अब बजट में भी शामिल होने लगी हैं। यह ठीक है कि भारत कुल मिलाकर निर्धन देश है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि आर्थिक हालात की अनदेखी कर मनमाने तरीके से रेवड़ियां बांटने का दिखावा किया जाए। यह जो रेवड़ियां बांटने की राजनीति हो रही है वह आर्थिक नियमों के खिलाफ तो है ही, राजनीतिक मूल्यों-मर्यादाओं के भी विरुद्ध है।
 
- अविनाश चंद्र