सुधार में उलझाव का क्या काम

आर्थिक सुधार स्पष्ट और सरल होने चाहिए। तमाम शर्तों के उलझाव से बंधे हुए नहीं। यूपीए सरकार इस बात को काफी पहले भूल चुकी है। वह तो सबको साथ लेकर चलने के नाम पर हर बदलाव से पहले यह सुनिश्चित कर लेना चाहती है कि इसके जरिये कितने वोट बैंकों को संतुष्ट कर पाएगी। यह नजरिया भूमि अधिग्रहण बिल जैसे सबसे जरूरी बदलावों को भी बहुत सारी शर्तों, लटकाऊ जुगाड़ों और लालफीताशाही के बीच उलझा देता है। ऐसे में आरबीआई के नए गवर्नर रघुराम राजन के बैंकिंग सुधार ताजी हवा के झोंके जैसे हैं। उन्होंने कहा कि कोई भी बैंक अपनी नई शाखा आरबीआई से इजाजत लिए बगैर भी खोल सकता है। अभी तक आरबीआई हर बैंक शाखा को एक स्वतंत्र इकाई की तरह देखता था और लंबी जांच-पड़ताल के बाद ही उसे खोलने की इजाजत देता था। और तो और, एक बार उसने हर एटीएम को बैंक की एक अलग शाखा की तरह देखना शुरू कर दिया था। राजन ने इस नजरिये को ही खारिज कर दिया कि जब तक किसी चीज की इजाजत न दी जाए तब तक वह प्रतिबंधित है।

वही पुरानी पॉलिसी

इसकी तुलना जरा आनंद शर्मा की सोच से करके देखें, जिन्हें कैबिनेट के सबसे ज्यादा मार्केट-फ्रेंडली मंत्रियों में से एक माना जाता है। अपने अथक प्रयासों से उन्होंने मल्टीब्रैंड रिटेल में 51 और सिंगल ब्रैंड रिटेल में 100 फीसदी एफडीआई को संसद से पास कराया। उनका ख्याल था कि विदेशी निवेशक इससे बड़े प्रभावित होंगे। लेकिन हकीकत क्या है? क्रांतिकारी कहे जाने वाले इन सुधारों के एक साल बाद भी एक डॉलर का एफडीआई इस क्षेत्र में नहीं आया है। कारण? शर्मा ने विदेशी निवेशकों के सामने यह शर्त रख दी कि उन्हें अपने स्टोर में बिकने वाले सामानों का कम से कम 30 फीसदी हिस्सा 20 लाख डॉलर से कम स्थायी निवेश वाली छोटी कंपनियों से खरीदना होगा और अपने कुल प्रारंभिक निवेश का आधा हिस्सा बैक-एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने में लगाना होगा।

इन दोनों शर्तों से इतनी उलझनें खड़ी हो गईं कि एक साल मामला साफ करने में ही गुजर गया। आइकिया ने कहा कि भारत में उसका इरादा तेजी से विस्तार करने का है, लिहाजा जिन कंपनियों से वह सामान खरीदेगी, वे भी तेजी से बढ़ेंगी। इस पर काफी बहस के बाद सरकार सप्लायर कंपनियों का आकार बढ़ने की बात मान गई। सवाल यह है कि छोटे उद्योगों को आरक्षण देने की पुरानी घटिया नीति पर हम दोबारा वापस क्यों लौट रहे हैं। इस तरह के आरक्षण 1970 के दशक में गढ़े गए थे और इनके भयंकर नतीजे सामने आए थे। बढ़ने के बजाय छोटा रहने को फायदेमंद मानकर कुछ उद्यमों ने अपनी फैक्टरियों को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ दिया, ताकि हर एक को निर्धारित निवेश सीमा से नीचे रखा जा सके। बाकियों ने मशीनरी खरीदने के बजाय उसे लीज पर लेना शुरू कर दिया, ताकि उनका कारोबार निवेश सीमा से बाहर न निकलने पाए। यह नीति अपनी धारणा में ही मूर्खतापूर्ण थी, क्योंकि विस्तार और उत्पादकता की कमी को इसमें दुर्गुण के बजाय सदगुण मान लिया गया था।

1991 में जब सुधार शुरू हुए तो स्मॉल-स्केल लॉबी ने रिजर्वेशन खत्म करने का पुरजोर विरोध किया। नतीजा यह हुआ कि आरक्षण हटाने की प्रक्रिया बहुत धीरे-धीरे आगे बढ़ी और 2005 में जाकर ही अपने अंजाम तक पहुंच पाई। अफसोस की बात है कि सरकार अभी बिना किसी व्याख्या के पुरानी नीति को वापस लेती आई है। इसका अकेला तर्क वोट बैंक पॉलिटिक्स का है। इसी नजरिये ने सरकारी विभागों और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के लिए सन 2012 से अपनी कुल खरीद का 20 प्रतिशत हिस्सा छोटे और मंझोले उद्यमों से खरीदना जरूरी बना दिया है। इस 20 फीसदी के भीतर 4 प्रतिशत का उप-कोटा दलित और आदिवासी मालिकाने वाले उद्यमों का रखा गया है। इसका अगला कदम संभवत: मुस्लिम कोटे का होगा, जिसका एक हिस्सा सलमान खुरशीद पसमांदा मुसलमानों के लिए सुरक्षित रखना चाहेंगे।

वोट बैंक की चिंता

उत्पादकता और होड़ को छोड़कर बाकी हर चीज के लिए देश में कोई न कोई लॉबी सक्रिय है। ये लॉबियां ऊंची आमदनी और कम कीमतों के खेल से ही उपजी हुई हैं। ऊंची उत्पादकता के लिए देश के उद्यमों में अंतहीन रोकटोक और शर्तों से मुक्त होकर खुली होड़ में उतरने और फलने-फूलने की क्षमता मौजूद होनी जरूरी है। यूपीए सरकार उत्पादकता अथवा होड़ का स्तर ऊंचा करने में कोई रुचि नहीं दिखाती और सारा ध्यान शर्तों तथा कोटा-परमिट के उलझाव खड़े करने में लगाती है, ताकि हर तरह के वोट बैंक को संतुष्ट रखा जा सके। अर्थव्यवस्था के रसातल में जाने का एक बड़ा कारण यही है। और समाधान क्या है? कहीं ज्यादा स्पष्ट और उलझन मुक्त सुधार, कुछ उसी तरह के, जिनकी शुरुआत रघुराम राजन ने अभी-अभी की है।

 

स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर

साभारः नवभारत टाइम्स

 

स्वामीनाथन अय्यर

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