पुलिस सुधार को मिले प्राथमिकता

वर्ष 2008 में मुंबई पर हुए आतंकी हमलों को रोकने में हमारी पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की नाकामी 2009 के आम चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बन गई थी। आम चुनाव से पहले कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में वादा किया था कि ‘हम देश के हर नागरिक को अधिकतम सुरक्षा की गारंटी देते हैं। हम आतंकवाद को कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे, फिर उसका स्रोत चाहे कोई भी हो।’ घोषणा पत्र में यह भी कहा गया था कि ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पुलिस सुधारों की जरूरत को समझती और स्वीकार करती है। इसके लिए राजनीतिक एक्जीक्यूटिव और पुलिस प्रशासन के बीच स्पष्ट अंतर किया जाएगा। हाउसिंग और शैक्षिक सुविधाओं के मामले में पुलिस बल के लिए अधिक बेहतर प्रबंधन किया जाएगा। पुलिस बल की विश्वसनीयता को एक संस्थागत स्वरूप दिया जाएगा।’

इसके बावजूद कांग्रेस ने पुलिस सुधारों के एजेंडे को ठंडे बस्ते में डाल दिया। २२ सितंबर 2006 को सर्वोच्च अदालत ने पुलिस सुधारों के लिए दूरगामी निर्देश दिए थे, जिन्हें मार्च 2007 तक अमल में लाना था। किंतु न तो कांग्रेसशासित और न ही भाजपाशासित राज्यों ने गंभीरतापूर्वक उन निर्देशों का अनुपालन किया। इससे भी चिंतनीय बात यह है कि मुंबई के सत्ता संचालकों ने 2008 के आतंकी हमलों के बाद तय किए गए कुछ बुनियादी सुरक्षा उपायों को भी लागू नहीं किया। इनमें शहर में 700 हाईटेक सीसीटीवी कैमरे लगाना, पुलिसकर्मियों के लिए बुलेटप्रूफ जैकेट खरीदना या केंद्र और राज्य की खुफिया एजेंसियों के बीच समन्वय के लिए नोडल अधिकारी की नियुक्ति करना जैसे महत्वपूर्ण बिंदु शामिल हैं। इसीलिए हैरानी नहीं होनी चाहिए कि 13 जुलाई 2011 को जब मुंबई में फिर बम धमाके हुए तो मुंबई पुलिस पूरी तरह संज्ञाशून्य पाई गई थी।

यहां तक कि दिल्ली में भी पुलिस के ‘पुख्ता सुरक्षा इंतजामों’ के बावजूद एक के बाद एक बम धमाके हो रहे हैं। किसी क्षेत्र की सुरक्षा के नाम पर पुलिस के निशाने पर केवल स्ट्रीट वेंडर ही होते हैं, जबकि अध्ययन बताते हैं कि सड़कों पर अपनी आजीविका अर्जित करने वाले ये लोग वास्तव में अपनी मौजूदगी से शहर को अधिक सुरक्षित ही बनाते हैं। इसके अलावा वे असामाजिक तत्वों के विरुद्ध पुलिस के महत्वपूर्ण सहयोगी भी बन सकते हैं, क्योंकि अक्सर उनके पास अपराधियों और गैंगस्टरों के बारे में विश्वसनीय सूचनाएं होती हैं। चूंकि वे रोज कुआं खोदने और रोज पानी पीने वाले लोगों में से होते हैं, इसलिए अमन-चैन कायम रहना उनके लिए बहुत जरूरी है। लेकिन पुलिस का उनसे संपर्क केवल उन्हें आतंकित करने और उनसे घूस लेने तक ही सीमित रहता है।

स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, दिवाली या ईद जैसे महत्वपूर्ण दिवसों और पर्वो से पहले सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद कर दी जाती है, लेकिन असामाजिक तत्वों को घेरने के नाम पर पुलिस अनेक गरीब रिक्शाचालकों, भिखारियों और अन्य बेसहारा लोगों को भी लॉकअप में ठूंस देती है। ये लोग अपने लिए किसी वकील की सेवाएं लेने या जमानत देने का खर्चा वहन नहीं कर सकते, इसलिए इनमें से अधिकांश या तो लॉकअप में कई दिनों तक कैद रहते हैं या उन्हें घूस देकर छूटने को विवश होना पड़ता है। वास्तविकता तो यह है कि अधिकांश गरीब लोगों को आपराधिक स्थानों से भी ज्यादा डर हमारे पुलिस स्टेशनों से लगता है।

यह हमारी मौजूदा पुलिस प्रणाली पर एक सवालिया निशान ही है कि जहां एक तरफ लोग उससे भयभीत रहते हैं या घृणा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ वह देश की सुरक्षा व्यवस्था के मोर्चे पर भी वह विफल रहती है। स्थिति तो यह है कि हमारी पुलिस यातायात के कानूनों को भी दक्षतापूर्वक लागू नहीं कर पाती, आतंकवाद का दृढ़तापूर्वक मुकाबला करने की बात तो खैर रहने ही दें। कम्युनिटी कवर्ड कैम्पस की बढ़ती तादाद और सक्षम लोगों द्वारा सुरक्षा के समानांतर प्रबंध करना बताता है कि पुलिस प्रणाली में नागरिकों का भरोसा किस कदर घटता जा रहा है। शेष आम जनता ‘भगवान भरोसे’ जी रही है। एक बंगाली कहावत है, जो पुलिस के प्रति आम जनता की भावनाओं को बहुत अच्छी तरह व्यक्त करती है : Rबाघे काटेर सोलह घाव, पोलिस काटेर बत्तीस घाव।ञ्ज हैरानी की बात नहीं है कि गांव-देहातों में पुलिस के आने की खबर सुनकर लोगों में सुरक्षा के स्थान पर भय और आशंका की भावनाएं जागने लगती हैं।

आतंकवादियों और गैंगस्टरों के बारे में विश्वसनीय जानकारियां जुटाने के लिए विशेषज्ञता और दक्षता की दरकार है। साथ ही इसके लिए नागरिकों का भरोसा जीतना भी जरूरी है। लेकिन अधिकांश पुलिसकर्मियों में आतंकी नेटवर्को का पता लगाने के लिए जरूरी कौशल का अभाव दिखता है। अपराध को शरण देना भी चिंता का विषय है। अब तो बॉलीवुड भी कई बार यह दिखा चुका है कि अंडरवर्ल्ड को संरक्षण देने में मुंबई पुलिस की क्या भूमिका रही है। खबरें हैं कि अब पाकिस्तानी आतंकवादी अपनी वारदातों को अंजाम देने के लिए स्थानीय आपराधिक गिरोहों की मदद ले रहे हैं, जिन्हें भारतीय पुलिस से निपटना अच्छी तरह आता है। ऐसे में भला कौन पुलिस को सूचना देने का बीड़ा उठाकर अपनी जान जोखिम में डालना चाहेगा? आतंकवादी जनता और पुलिस के बीच भरोसे की इसी खाई का बखूबी फायदा उठाते हैं।

असामाजिक और राष्ट्रविरोधी तत्वों की जमीनी स्तर पर निगरानी करने के लिए सबसे प्राथमिक और प्रभावी संस्था है स्थानीय थाना। आतंकरोधी अभियान केवल तभी कामयाब हो सकते हैं, जब कानून का पालन करने वाले नागरिक पुलिस के ‘आंख और कान’ भी बनें। दुर्भाग्य से अभी तो यह स्थिति है कि पुलिस का ‘मुखबिर’ होना निंदासूचक माना जाता है। अचरज नहीं कि पुलिस का खुफिया तंत्र इतनी मुश्किलों से जूझ रहा है। लेकिन यदि जमीनी स्तर पर ही सुधार नहीं होंगे तो शीर्ष स्तर पर संस्थाएं गठित करने से भी क्या होगा?

- मधु किश्वर

Add new comment

Filtered HTML

  • Lines and paragraphs break automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <blockquote> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.

Plain text

  • No HTML tags allowed.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Lines and paragraphs break automatically.