प्रधानमंत्री का ध्यान कृषि की तरफ आकर्षित करने के लिए किसान और क्या करें ?----(2)

भाग (1) से जारी

इस समय कृषिभूमि को अच्छे दाम मिल रहे हैं इसलिए नेता और उद्योगपति येनकेन प्रकारेण किसानों की जमीन को हथियाने में लगे हैं। भारत के कुछ इलाकों में तो कुछ नेताओं ने एक एकड जमीन छोड़े बगैर सारी जमीन हथिया ली है। इसके अलावा सरकार द्वारा चलाई गई कुछ योजनाएं किसानों को बहुत कम मुआवजा देकर खेती का व्यवसाय छोड़ने के लिए मजबूर कर रही हैं। उदाहरणार्थ महाराष्ट्र में स्पेशल एकानामिक झोन के लिए लगभग 15 हजार हेक्टेयर जमीन अधिग्रहित की गई है। रोजगार गारंटी योजना में बिना काम किए रोजगार मिलता है यह जानने के बाद कृषि के लिए काम करनेवाले बहुत से मजदूर रोजगार गारंटी योजना में जाकर उपस्थिति पत्रक पर दस्तखत करके कृषि की मजदूरी के मुकाबले 40 से 50 प्रतिशत मजदूरी कमाना पसंद करते हैं। इसलिए कृषि क्षेत्र में काम करनेवालों की संख्या घट रही है। इसके विपरित औद्योगिक क्षेत्र में मजदूरों की संख्या को कम करने के लिए उनके सामने गोल्डन शैकहैंड या स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति जैसी आकर्षक योजनाएं रखी गईं।सैंकड़ों वर्षों तक घाटे का व्यवसाय चलाने के बाद कम से कम कृषि उत्पादों को न सही लेकिन कृषिभूमि को ज्यादा दाम मिलने लगे हैं। उसका फायदा किसानों को दिलाने के लिए यदि सरकार कोई कृषि निर्गमन योजना घोषित करती तो उचित ही होता।

प्रधानमंत्री के भाषण में ऐसी किसी योजना का जिक्र नहीं था। न कृषि में होनेवाले घाटे को कम करने की कोई योजना थी। संक्षेप में क्या सरकार की यह इच्छा है कि किसान बार-बार कर्जदार बने और किसी महामारी की तरह वह हजारों लाखों लोगों को आत्महत्या के लिए प्रवृत करे ? खेती में खेती की जमीन जितना ही या शायद उससे ज्यादा ही कृषि तकनीक का भी महत्व है। चार सौ साल पहले माल्थस ने यह सिद्दांत प्रतिपादित किया था कि जमीन तो कम ही बढ़ती है लेकिन उसपर पैदा होनेवाला अन्न खानेवालों की तादाद तो कई गुना बढ़ती है । इसकारण जल्दी ही महामारी और भुखमरी का फैलना सुनिश्चित है। सौभाग्यवश माल्थस का यह सिद्धांत उस समय गलत साबित हुआ। एक दाने से हजारों लाखों दाने पैदा करनेवाले बीज विकसित हुए। उनकी रक्षा करनेवाले कीटनाशक और खादों का अविष्कार हुआ। उनके इस्तेमाल से प्रचुर पानीवाले क्षेत्रों में हरित क्रांति घटित हुई।  प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में पानी के संकट का जिक्र किया । लेकिन किस फसल को कितना पानी लगता है उसके आधार पर फसलों के नियोजन की योजना प्रस्तुत नहीं की। दुनियाभर में गन्ने की खेती बारिश के पानी के जरिये की जाती है।भारत एकमात्र देश है जो सिंचाई के पानी से गन्ने की खेती करता है।इसलिए जिन जिन राज्यों में गन्ने की केती होती है वहां वहां पानी का अकाल है।बड़े-बड़े नेता दूसरे जिलों के पानी को मोड़कर अपने राज्य में लाने की कोशिश करते हैं। भारत के उत्तर पूर्वी क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से ही बांबू की बड़े पैमाने पर पैदावार होती है वहां अगर बांबू जाति के गन्ने की फसल उगाई जाए तो पानी के अकाल की स्थिति पैदा नहीं होगी और उत्तर पूर्वी क्षेत्र की भी कई समस्याएं हल हो जाएंगी। भारत को एक मशहूर अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के रूप में मिला है.लेकिन उसका ध्यान मुख्यरूप से वित्तीय और औद्योगिक सुधारों की तरफ है ।यदि दो लाख किसानों द्वारा आत्महत्या किए जाने के बाद भी प्रधानमंत्री का ध्यान खेती की तरफ नहीं जाता तो उनका ध्यान आकर्षित करने के लिए किसान और क्या करें?

- शरद जोशी
जानेमाने अर्थशास्त्री और शेतकरी संगठना के संस्थापक