स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी क्रांतिकारी सरकारी पहल

अप्रैल 2012 से देश में लागू हो चुकी बारहवीं पंचवर्षीय योजना में स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निजी सरकारी साझेदारी के तहत सुधार की संभावनाएं तलाशने की योजना को कम्प्यूटरीकरण के बाद स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े क्रांतिकारी पहल के तौर पर देखा जाना चाहिए। इससे न केवल शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधारात्मक प्रयासों को बल मिलेगा बल्कि देश की मेधा को वांछित स्वरूप भी प्राप्त होगा। देखा जाए तो आजादी के बाद देश ने रक्षा और तकनीकी क्षेत्र में तो काफी विकास किया लेकिन स्वास्थ्य व शिक्षा के मामले यह फिसड्डी ही रहा। रक्षा के क्षेत्र में विकास तो भारी भरकम बजट का परिणाम है लेकिन तकनीकी क्षेत्र में विकास बजट नहीं बल्कि 90 के दशक में उदारीकरण के तहत निजी कंपनियों को मौके उपलब्ध कराने का परिणाम है।

यह निजी प्रयासों की ही देन है कि साफ्टवेयर के क्षेत्र में भारत दुनियाभर में अपनी एक अलग पहचान स्थापित करने में सफल रहा है। दरअसल, उदारीकरण के तहत जिन राष्ट्रों ने अपने यहां प्रतियोगिता की स्थित पैदा की और निजी कंपनियों को मौके उपलब्ध कराए उन सभी ने जबरदस्त आर्थिक विकास प्राप्त किए। भारत में भी विगत कुछ वर्षों में इंफ्रास्ट्रक्चर, रियल स्टेट, ट्रांसपोर्टेशन (सीमित) आदि के क्षेत्र में प्रगति देखने को मिली है। जबकि शिक्षा व स्वास्थ्य के क्षेत्र की स्थति दयनीय बनी रही। हालांकि 90 के दशक में कुछ छिटपुट प्रयास किए गए लेकिन गैर नियोजित होने के कारण ये प्रयास नाकाफी रहे।

यूं भी देखे तो वैश्विक स्तर पर खराब स्वास्थ्य स्तर के कारण भारत की जितनी खिंचाई हुई है उतनी किसी अन्य क्षेत्रों के कारण नहीं। उदाहरण के लिए यदि हम एक दशक पूर्व के हालातों पर दृष्टिपात करें तो पता चलता है कि लाखों युवा 12वीं के बाद व्यवसाय परक पाठ्यक्रमों के विकल्प की अनुपलब्धता के कारण ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन आदि पाठ्यक्रम करने को मजबूर होते थे। परिणाम स्वरूप देश में शिक्षित बेरोजगारों की संख्या में भारी इजाफा हो गया और युवा वर्ग के बीच अवसाद की स्थति पैदा हो गई। हालांकि बाद में निजी इंजीनियरिंग संस्थानों के अस्तित्व में आने के कारण देश में इंजीनियरों, प्रबंधकों व रोजगार परक शिक्षा हासिल कर एंटरप्रेन्योर बनने वालों की संख्या में जबरदस्त वृद्धि हुई जिसका फायदा देश को आर्थिक विकास के रूप में प्राप्त हुआ।

चूंकि देश में शिक्षा को लाभ के लिए किया जाने वाले उद्योगों की श्रेणी में नहीं रखा गया है। इसके अतिरिक्त स्कूल खोलने के लिए तमाम लाइसेंसों की आवश्यकता, कर्मचारियों को सरकारी वेतनमान, खेल के मैदान की अनिवार्यता, अध्यापक-छात्र संख्या का निश्चित अनुपात आदि जैसे तमाम बंदिशों के कारण चाहते हुए भी उद्योग घरानों ने इस क्षेत्र से दूरी बनाए रखी। यह हाल तो तब है जबकि स्वयं के स्कूलों में उक्त नियमों को लागू करने के बाद भी सरकारें कुछ हासिल नहीं कर सकीं।

कमोबेश यही स्थति स्वास्थ्य सेवाओं के साथ भी है। कुषोषण, शिशु मृत्युदर, संक्रमण, डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया आदि बीमारियों के कारण आज भी हमारे देश में पाकिस्तान, बांगलादेश, श्रीलंका यहां तक कि कहीं अधिक गरीब अफ्रीकी देशों से ज्यादा मौतें होती हैं। स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में भी आज जो परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं वे भी निजी प्रयासों के बदौलत ही है। यह निजी निवेशकों की ही देन है कि देश का स्वास्थ्य क्षेत्र अब दुनिया के लिए मेडिकल टूरिज्म स्पॉट में बदलने लगा है।इस प्रकार, शिक्षा व स्वास्थ्य के क्षेत्र में अपार संभावनाओं को देखते हुए यदि सरकार ने अब पीपीपी मॉडल के तर्ज पर कुछ करने की योजना बनाई है तो इसका स्वागत ही किया जाना चाहिए। बल्कि सरकार को एक कदम और आगे बढ़ते हुए गुणवत्ता सुनिश्चत करने के लिए दोनों क्षेत्रों को पूरी तरह से निजी हाथों में दे देना चाहिए।

गरीबों व सस्ती शिक्षा के नाम पर किसी क्षेत्र को पूर्णतया नियंत्रण में रखने के दुष्प्रभाव के तौर पर प्रतिवर्ष दाखिले के समय स्कूल कालेजों के बाहर छात्रों और अभिभावकों की भारी हुजूम को देखा जा सकता है। और कहीं न कहीं भ्रष्टाचार को न्योता भी यहीं से मिलता है। जो सक्षम होते हैं वो रिश्वत, डोनेशन, मैनेजमेंट कोटा आदि के माध्यम से दाखिला ले लेते हैं जबकि मारा गरीब ही जाता है। यदि निजी स्कूल कालेजों की शिक्षा महंगी हुई भी तो कम से कम सक्षम छात्र उसमे दाखिला ले सकेगा और इस प्रकार खाली सीट गरीब छात्र के हिस्से आएगी। पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति में शिक्षा सरकारी स्कूलों के बराबर अथवा और कम भी हो सकती है जैसा अन्य क्षेत्रौं में देखा जा चुका है।

इसी प्रकार, स्वास्थ्य क्षेत्र में भी एम्स, सफदरजंग, गंगाराम आदि जैसे देश के गिनेचुने कुछ अच्छे अस्पतालों की भारी भीड़ को भी स्वास्थ्य क्षेत्र में निजीकरण और प्रतियोगिता की स्थिति पैदाकर नियोजित किया सकता है। हालांकि कुछ राजनैतिक दल निहित स्वार्थों के तहत अभी से इस योजना आयोग की मंशा का विरोध करना शुरु कर दिया है। लेकिन यदि योजना आयोग और सरकार अन्य दलों व वोट बैंक के दबाव में आए बगैर योजना को लागू कराती है तो पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा देश में कम्प्यूटरीकरण के फैसले के बाद सबसे बड़ा क्रांतिकारी फैसला होगा। हालांकि इसके लिए रणनीतिकारों को राजीव गांधी द्वारा झेले गए विरोध और दबाव के तर्ज पर ही इस दबाव से निपटना होगा।

- अविनाश चंद्र