अब खत्म करें जातीय आरक्षण

गुजरात में चला पाटीदारों का आंदोलन सचमुच स्वागत योग्य है, क्योंकि यह आरक्षण- जैसी सड़ी-गली व्यवस्था को खत्म करने का कारण बनेगा। यह आंदोलन बड़े मजबूत तर्क पर आधारित है। यह कहता है कि यदि आप अन्य पिछड़ों को आरक्षण दे रहे हो तो हमें भी क्यों नहीं? या तो हमें भी आरक्षण दो या फिर किसी को मत दो। इसने आरक्षण के पिटारे को खोल दिया है। आरक्षण को लेकर अहमदाबाद की बड़ी सभा ने नेताओं के छक्के छुड़ा दिए। देश के सारे नेता, वे भी जो अपने आपको तीस मार खां समझते हैं, नहीं जानते कि क्या करें? गुजरात के पटेलों का विरोध करें या समर्थन! जो विरोधी नेता मोदी-विरोधी हैं, उन्होंने पटेलों की मांग का तत्काल समर्थन कर दिया, लेकिन जिन्होंने सारे मामले पर दूरंदेशी से सोच-विचार किया है, उन्होंने सोचा कि पटेल लोग गरीबों का आटा गीला कर रहे हैं।
 
सरकारी नौकरियों में कुल 27 प्रतिशत आरक्षण है और सैकड़ों जातियां पहले से उसे लपकने पर आमादा हैं और अब ये भी कूद पड़े। पटेलों के कूदने से आरक्षण की रेवड़ियों में बंदरबांट बढ़ेगी और यादव व कुर्मियों वगैरह का नुकसान हो जाएगा। पटेलों का विरोध करने के लिए सभी पहले से आरक्षित पिछड़े अब उठ खड़े होंगे। पटेल आंदोलन का अर्थ होगा-पिछड़ों का पिछड़ों के विरुद्ध गृहयुद्ध!
 
पिछड़ों का कुल आरक्षण तो 27 प्रतिशत है। यह प्रतिशत तो बढ़ने वाला नहीं है। इस पर संवैधानिक पाबंदी है। अगड़ों की सीटों में तो कोई कमी होने वाली नहीं है। जो भी घाटा होगा, वह उन्हीं पिछड़ों का होगा, जो पहले से आरक्षित हैं, इसीलिए हार्दिक पटेल की भोपाल की सभा फुस्स हो गई है। अखिल भारतीय आरक्षण गुर्जर संगठन ने भी उसका विरोध किया है। उसका कहना है कि इन पटेलों ने हमेशा गुर्जर-आरक्षण का विरोध किया है। वास्तव में 1977 के आस-पास जब गुजरात में खाम (क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी, मुस्लिम) अभियान चला तो इन जातियों को आरक्षण देने का सबसे तगड़ा विरोध पटेलों ने किया। लगभग 100 लोग मारे भी गए। माधवसिंह सोलंकी के नेतृत्व में ‘खाम’ जातियों ने कांग्रेस को अपूर्व विजय भी दिलवाई। पटेलों ने भाजपा का साथ दिया। मोदी की जीतों का आधार भी वे ही रहे, लेकिन अब वे बगावत में उठ खड़े हुए हैं।
 
यदि पटेल आंदोलन को भाजपा ठीक से संभाल नहीं पाई तो गुजरात में तो उसका सूपड़ा-साफ ही समझ लीजिए, सारे भारत में भी उसे अब जाटों, गुर्जरों, कुर्मियों, कम्माओं, रेड्‌डियों, वोकालिग्गाओं आदि का मुकाबला करना पड़ेगा। ये सब जातियां मूलतः खेतिहर हैं। ग्रामीण हैं, गरीब हैं, शिक्षा और नौकरियों में पिछड़ी हैं, लेकिन इन्हीं जातियों में 5-10 प्रतिशत ऐसे लोग भी हैं, जो राजनीति, व्यवसाय, नौकरियों और शिक्षा में अग्रणी हैं। वे इतने अग्रणी हैं कि बड़े-बड़े अगड़े उनके आगे पानी भरें। गुजरात के पटेल का मतलब है, चौधरी! गांव में जो सबसे समर्थ हो, उसे ही पटेल कहा जाता है। पटेल अगर सचमुच पिछड़े होते तो गुजरात के इतने मुख्यमंत्री पटेल कैसे होते? विधानसभा और संसद में दर्जनों पटेल कैसे होते? आज से 70-80 वर्ष पहले सरदार वल्लभ भाई पटेल जिस मुकाम पर पहुंचे, कैसे पहुंचते? आज अमेरिका में जितने भी प्रवासी भारतीय रहते हैं, उनमें पटेलों की संख्या सबसे ज्यादा है। अमेरिका में‘मोटेलों’ के मालिकों में पटेलों की संख्या इतनी ज्यादा है कि वहां ‘मोटेल’ को लोग ‘पोटेल’ बोलते हैं। इन पटेलों को आरक्षण की जरूरत क्यों महसूस हो रही है?
 
वे इसलिए आरक्षण मांग रहे हैं कि ‘माले-मुफ्त, दिले बेरहम’? जब सब बहती गंगा में डुबकी लगा रहे हैं तो वे क्यों न लगाएं? गुजरात और केंद्र की सरकार, दोनों ही हतप्रभ हैं। एक ने गोली चला दी और दूसरी सिर्फ जबान चलाकर शांति की अपील कर रही है। आरक्षण की मांग का कोई जवाब दोनों के पास नहीं है। वरना पटेलों और आरक्षण मांगने वाली नई जातियों से वे पूछते कि तुम अपनी खेती और काम-धंधे छोड़कर नौकरी, जिसे ‘अधम चाकरी’ कहा जाता है, क्यों करना चाहते हो? और फिर यह बताओ कि हर साल ऊंचे दर्जे की कुल कितनी नई सरकारी नौकरियों निकलती हैं? सिर्फ पांच-छह हजार! हर प्रदेश में कुछ सौ! इनका 27 प्रतिशत कितना हुआ? यानी दो-चार दर्जन नौकरियों के लिए हमारे स्वाभिमानी पटेल लोग भीख का पल्ला क्यों पसारें? जो पिछड़े आरक्षित नौकरियां झपट लेते हैं, वे अक्सर मालदार, ओहदेदार, ताकतवर और प्रभावशाली पिछड़ों के बेटे-बेटियां ही होते हैं। उन्हें ही सर्वोच्च न्यायालय ने समाज की क्रीमी लेयर कहा है। ये मलाई पर हाथ साफ करने वाले मुट्‌ठीभर नेता अपनी जाति के लाखों लोगों को आंदोलन की भट्‌ठी में झोंक देते हैं। यह नौकरियां का आरक्षण अयोग्यता और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है। यदि आरक्षण लाभकर होता तो पिछले सात दशकों में इसकी जरूरत पूरी हो जाती। यदि डाॅ. आंबेडकर और डाॅ. लोहिया आज जिंदा होते तो इस आरक्षण की भ्रष्ट व्यवस्था को उखाड़ फेंकते।
 
डाॅ. आंबेडकर ने ‘जाति-व्यवस्था का समूलनाश’ पुस्तक लिखी और लोहियाजी ने ‘जात तोड़ो’ आंदोलन चलाया। दोनों ने आरक्षण का समर्थन कुछ समय के लिए इसीलिए किया था कि समता फैलेगी और जात टूटेगी, लेकिन इसने जातिवाद के जहर को भारत की नस-नस में फैला दिया है। इसीलिए जन्म आधारित सारे आरक्षण तुरंत खत्म किए जाने चाहिए। आरक्षण सिर्फ असमर्थों को, गरीबों को, वंचितों को दिया जाना चाहिए। जन्म के नहीं, कर्म के आधार पर! नागरिकों को थोक में आरक्षण देना उन्हें मवेशी बनाना है।
 
काका कालेकर ने जब 1955 में पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष के रूप में अपनी रपट राष्ट्रपति को दी थी तो लिखा था कि उन्होंने पिछड़ापन जातियों के आधार पर जो तय किया है, वह मजबूरी में किया है। उस समय जनगणना के वैज्ञानिक और तकनीकी तरीके कम उपलब्ध थे। अब तो हर नागरिक की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का राज्य को पता होता है। ऐसी स्थिति में अंधों की तरह रेवड़ियां क्यों बांटी जाएं? सिर्फ शिक्षा में आरक्षण दिया जाए। उसे पचास प्रतिशत से बढ़ाकर साठ प्रतिशत कर दिया जाए।
 
शिक्षण-संस्थाओं में जाति का विचार किए बिना हर गरीब के बच्चों को शिक्षा, भोजन, वस्त्र, निवास आदि की सभी सुविधाएं मुफ्त दी जाएं। यह मौलिक परिवर्तन करने की हिम्मत हमारे वोटप्रेमी नेताओं में है या नहीं? यह अकेले मोदी सरकार नहीं कर सकती। क्या इस बड़े संवैधानिक संशोधन के लिए हमारे सभी राजनीतिक दल तैयार हैं? मोदी सरकार के पास अभी भी मौका है कि वह पटेलों के आंदोलन के जवाब में एक आयोग बिठा दे, जो आरक्षण के लाभ-हानि पर विचार करे। उसे जारी रखने या खत्म करने पर विचार करे। यदि आरक्षण दिया जाए तो उसका आधार क्या हो? क्या आरक्षण को जारी रखना जरूरी है? यदि आरक्षण देना ही है तो किन जातियों को रखा जाए और किनको हटाया जाए? यदि सरकारी नौकरियों में आरक्षण देना जरूरी है तो फौज, अदालतों और निजी नौकरियों में क्यों नहीं दिया जाए?
 
 
- वेदप्रताप वैदिक (लेखक भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)
साभारः दैनिक भास्कर
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