पर्युषण का सार और मीट बैन

जैन पर्व पर्युषण को देखते हुए पिछले दिनों मांस खाने पर सरकार द्वारा लगाये गए प्रतिबन्ध को लेकर काफी विवाद हुआ। कई जगह विरोध प्रदर्शन भी हुए। पर्युषण वैसे तो बीस दिन चलता है। फिर भी महारष्ट्र सरकार ने चार दिन तक जानवर वध और मीट की बिक्री पर बैन लगाया था। हालाँकि इस बैन में मछली बेचना और खाना बैन नहीं था क्योंकि सरकार की दलील थी कि मछली का वध नहीं किया जाता। वह पानी से निकालने पर खुद ब खुद मर जाती है। ये बैन महारष्ट्र से निकल, कुछ अन्य राज्यों में भी गया।  
 
इस अस्थायी बैन पर काफी कड़ी प्रतिक्रिया हुई. चार दिन के अस्थायी प्रतिबंध को लेकर आम नागरिकों और महाराष्ट्र के प्रमुख राजनीतिक दल शिवसेना ने भी कड़ी आलोचना की। 
 
नाराज मीट विक्रताओं ने कहा कि नगर निगमों की कमान राष्ट्रवादी हिंदू पार्टी बीजेपी के हाथों में होने के कारण ही पहले के दो दिन के बजाए इस बार बैन चार दिनों तक बढ़ा दिया गया. कुछ लोगों ने ये भी कहा कि ये बैन उन लोगों की रोज़ी रोटी पर लात मारने जैसा है जो मीट बेच कर अपने परिवार का गुजर बसर करते हैं। इस बैन का चार दिनों तक विस्तार करने के मामले पर महाराष्ट्र में बीजेपी के साथ मिलकर साझा सरकार बनाने वाली शिवसेना ने भी अपना विरोध जताया। दक्षिणपंथी शिवसेना और विपक्षी दल महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) ने इसके विरोध में सड़कों पर प्रदर्शन भी किया। हालाँकि मुंबई में जैन पूजा स्थलों के बाहर मीट बना कर या जैन बहुल सोसाइटियों के बाहर मीट बेच कर विरोध जताना कतई सही नहीं था।
 
आदेश के अनुसार कसाईखाने  10, 13, 17 और 18 सितंबर को बंद रखे जाने थे. बैन के पहले दिन 10 सितंबर को मुंबई का सरकारी कसाईखाना बंद रहा. मीट डीलरों ने बताया कि इसके कारण अगले दिन बाजारों में मीट की सप्लाई नहीं हो सकी । बाद में अन्य राज्यों जैसे पंजाब , हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में भी कुछ समय के लिए मीट पर बैन लगाया गया। 
 
बैन से नाराज़ मीट व्यवसाइयों ने हाई कोर्ट में सरकार के खिलाफ अपील की जिस पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा था कि त्योहार के दिनों में स्लॉटर हाउस नहीं खुलेंगे, लेकिन मीट की बिक्री जारी रहेगी। यानी कहीं और से मीट लाकर बेचा जा सकता है। हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ जैन समुदाय ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की लेकिन कोर्ट ने इस पर दखल देने से इंकार कर दिया ।
 
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सहिषुणता की भावना होनी चाहिए लेकिन इसे किसी को सिखाया नहीं जा सकता।
अब सवाल ये उठता है कि क्या इस तरह का बैन सही है? हम सभी एक धर्म निरपेक्ष देश में रहते है जहाँ हर किसी को अपना धर्म मानने की पूरी छूट है। इसी तरह अपने मन का खाना खाने की भी पूरी छूट है। हम किसी को रोक नहीं सकते। जो चीज़ एक धर्म में खानी गलत समझी जाती हैं, वही दूसरे धर्म में उसे गलत नहीं मना जाता। जैसे जैन धर्म में आलू और अन्य जमीकन्द खाना (खासकर बरसात के चार महीनो में ) सही नहीं समझा जाता क्योंकि जैन धर्म के अनुसार जब हम किसी पौधे की जड़ को उखाड़ते हैं तो इसमें छोटे छोटे जीवों की हत्या होने का डर होता है। जबकि अन्य धर्मों ऐसा कुछ भी नहीं माना जाता। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो क्या खाना है क्या नहीं ये पूरी तरह से हर व्यक्ति  निजी चॉइस का मामला है।  इसे किसी पर थोपा नहीं जा सकता।  
 
एक उदाहरण से इसे समझते हैं।  नवरात्रि में कई चाट खोमचे वाले प्याज़ रखनी ही बंद कर देते हैं जबकि कई रखते हैं तो टिक्की पर प्याज़ डालने से पहले ग्राहक से पूछ लेते हैं कि प्याज़ डालें या नहीं?  लेकिन ज़बरदस्ती किसी पर भी नहीं होती कि वह नवरात्रि में प्याज़ खा ही नहीं सकता या अपनी दुकान में बेच भी नहीं सकता। ये हर दुकानदार का निजी फैसला होता है। 
 
पर्युषण दरअसल आत्मा की शुद्धि का पर्व  है।  ये हमें प्रेरित करता है कि हम मन वचन और काया से शुद्ध हो। हमारा आचरण शुद्ध हो।  हम किसी का बुरा न करें, किसी को अपशब्द न कहें। हमारे मन से नफरत और मलिनता मिट जाये और हमारे विचार शुद्ध हों। खान पान पर सोच विचार करने से हम अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण करना सीखते हैं। यही पर्युषण सार है।
                                                                                              
 
पारुल जैन (लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं)