कांग्रेस आर्थिक सुधारों की समर्थक होने का दिखावा कर रही है – पार्थ जे शाह

पार्थ जे शाह देश के जानेमाने उदारवादी चितंक और अर्थशास्त्री है। इसके अलावा वे दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फार सिविल सोसायटी के संस्थापक और अध्य़क्ष है। अर्थशास्त्र के कई क्षेत्रों में उन्होंने महत्वपूर्ण शोधकार्य किया है। इसकेअलावा फ्रीडमैन आन इंडिया, प्रोफाइल इन करेज :डिसेंट आन इंडियन सोशलिज्म, डू कार्पोरेशन्स हैव सोशल रिसपांसिबिलिटी?, सोशल पालिसी एड चेंज आदि कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं और कई पुस्तकों का संपादन किया है। बौद्धिक हल्कों में आर्थिक स्वतंत्रता के विषय पर उनके चिंतन को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। हाल ही में सतीश पेडणेकर ने बजट पर उनकी राय जाननी चाही। प्रस्तुत है इस बातचीत के कुछ अंश।

जिस तरह भारत सरकार को वित्तीय घाटा बढ़ता जा रहा है उसे देखते हुए यह माना जा रहा था कि इस बजट में वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी घाटे पर काबू पाने के लिए कठोर कदम उठाएंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। अब भी वित्तीय घाटा 5.1 प्रतिशत तो रहेगा ही। अपका इस बारे में क्या कहना है ?

इस बार सरकार की आर्थिक स्थिति बहुत नाजुक है। ऐसी हालत में घाटा कम करने का के दो ही तरीके हो सकते थे या तो टैक्स बढाएं  या फिर खर्चा कम करें। राजनीतिक स्थिति ऐसी है कि सरकार बहुत ज्यादा टैक्स बढ़ा पाने की स्थिति में नहीं थी। खर्चा कम करने के लिए उसने कुछ किया नहीं। वैसे सरकार चाहती तो नई नौकरियों पर पांबदी लगा सकती थी। जो सरकारी कंपनियां घाटे में चल रही हैं उनके बारे में कुछ किया जा सकता था। विभिन्न मदों पर दी जानेवाली सब्सिडी पर भी भारी खर्च होता है। वित्तमंत्री आर्थिक सुधार करके उनमें काफी कटौती कर सकते थे। इससे कुछ खर्च कम होता।

लोगों को इस बजट से यह उम्मीद थी कि आर्थिक सुधारों के लिए कुछ ठोस कदम उठाए जाएंगे। लेकिन यह उम्मीद बजट पूरी नहीं हुई। हालांकि प्रणव मुखर्जी ने सब्सिडी को सकल घरेलू उत्पाद के दो प्रतिशत तक सीमित रखने की बात कही लेकिन सब्सिडी के डायरेक्ट डीलीवरी की भी बात कही. लेकिन यह तो केवल बातें ही हैं कोई ठोस कदम नही उठाया।

इस तरह की बातें प्रणव मुखर्जी ने पिछले बजट में भी कहीं थीं। सब्सिडी के मामले में  नंदन निलंकनी की अध्यक्षता में टास्क फोर्स भी बनाई गई थी जिसने अपनी रपट भी दे दी है। इस बार उसपर अमल के लिए ठोस कदम उठाने की घोषणा की जानी चाहिए थी। लेकिन उन्होंने जो कहा है वह तो मजाक है। जनता को भुलावे में रखने की कोशिश है।

इस बार भी बजट में 30000 करोट रूपये के विनिवेश का प्रावधान है लेकिन विनिवेश का लक्ष्य पूरा तो नहीं हुआ। आज जिस तरह के हालात है उसमें विनिवेश का लक्ष्य पूरा हो पाएगा?

पिछले साल का विनिवेश का लक्ष्य पूरा करने के नाम पर सरकार ने लोगों की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश की। सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी औएनजीसी के शेअर बेचकर अपना विनिवेश का लक्ष्य पूरा किया। इसे कैसे विनिवेश कहा जा  सकता है। एक सरकारी कंपनी ओएऩजीसी ने शेअर बेचे और दूसरी सरकारी कंपनी जीवन बीमा निगम (एलआईसी न) ने खरीदे। तो फिर सरकार को क्या फायदा हुआ। यह तो अपनी अक्षमता पर पर्दा डालने की कोशिश भर है।

बजट में सरकार ने एक तरफ एक हाथ से थोड़ी छूट दी है तो दूसरी तरफ दूसरे हाथ से उससे कहीं ज्यादा निकाल ली है। एक तरफ आयकर की सीमा बढ़ाई है दूसरी तरफ सर्विस टैक्स और एक्साइज ड्यूटी बढ़ा दिए हैं। सर्विस टैक्स का दायरा भी बढ़ा दिया गया है। क्या टैक्स के इतने बड़े पैमाने पर बढने से क्या मुद्रास्फीति बढ़ेगी।

टैक्स और मुद्रास्फति का कोई संबंध नहीं है। असल बात यह है कि कुल कितना खर्चा हो रहा है। टैक्स लगने पर एकमात्र परिवर्तन यह होता है कि पहले जो पैसा लोग खर्च करते उसे अब सरकार खर्च करेगी। लेकिन खर्च की कुल रकम में फर्क नही आनेवाला है। टैक्स और महंगाई का कोई संबंध नहीं है। यह संबंध मीडिया का गढ़ा हुआ है।

सभी की नजर इस बात पर लगी थी सरकार बहुचर्चित और विवादास्पद खुदरा क्षेत्र में मल्टी ब्रांड में विदेशी निवेश के बारे में क्या फैसला करती है। इस बारे में भी सरकार ने कोई फैसला नहीं किया। केवल इतना भर कहा कि वह इस बारे में आमराय बनाने की कोशिश करेगी। उड्डयन क्षेत्र में विदेशी निवेश बढ़ाने पर गंभीरता से विचार किया जाएगा। दोनों ही मामलों में केवल बाते ही की गई है कदम कोई नहीं उठाया गया। यह किस बात का प्रतीक है। 

दरअसल कांग्रेस की मंशा आर्थिक सुधार करने की है नहीं लेकिन वह आर्थिक सुधार की समर्थक होने का दिखावा कर रही है। इसके लिए वह विरोधियों और यूपीए गठबंधन के अपने सहयोगी दलों का इस्तेमाल कर रही है। वह ऐसा दिखा रही है कि यूपीए के उसके सहयोगी दल उस पर अपनी शर्तें लाद रहे हैं। जबकि हकीकत यह है कि वह खुद ही आर्थिक सुधारों को लेकर गंभीर नहीं है। तृणमूस कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी  ने कई महीने पहले रिटेल क्षेत्र के मल्टी ब्रांड में विदेशी निवेश का विरोध किया था। यदि कांग्रेस सचमुच इस पर अमल करना चाहती थी तो उसे ममता बनर्जी से इस मामले में बात करना चाहती है लेकिन उसने ऐसा किया हो ऐसा नहीं लगता। इस कारण बजट में इस बारे में कोई कदम नहीं उठाया गया कोरी बातें ही की गई है ताकि लोगों में यह भ्रम बना रहे कि कांग्रेस आर्थिक सुधारों की समर्थक है।

बजट के बाद वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने कहा कि यह स्थिरता का बजट है। आपकी नजर में यह आर्थिक स्थिरता का बजट है या राजनीतिक स्थिरता का।

यह बजट न तो  आर्थिक स्थायित्व की दृष्टि से न ही राजनीतिक लाभ की दृष्टि से कारगर साबित होनेवाला है। वह जमाना गया जब वोटर को सब्सिडी, आरक्षण आदि का लालच देकर खरीदा जा सकता था। हाल ही में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने वोटरों लुभाने के लिए आरक्षण और आर्थिक पैकेज के कितने वादे किए लेकिन क्या हुआ। कांग्रेस को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। वह पार्टी जीती जो बिजली, सड़क, पानी की बात कर रही थी। इससे कांग्रेस को सबक लेना चाहिए कि इस तरह वोटरो को खरीदा नहीं जा सकता। उन्हें विकास चाहिए। इसलिए यह बजट न ही आर्थिक दृष्टि से कारगर है न ही राजनीतिक दृष्टि से बुद्धिमत्तापूर्ण।