संसदीय प्रणाली की गुणवत्ता पर सवाल

एक अध्ययन का यह निष्कर्ष भारत की संसदीय प्रणाली की गुणवत्ता पर नकारात्मक टिप्पणी है कि संसदीय कार्यों में भागीदारी न तो अपनी पार्टी से दोबारा टिकट पाने की गारंटी है और न ही मतदाताओं द्वारा पुनर्निर्वाचित किए जाने की। संसदीय एवं राजनीतिक प्रक्रिया पर निगाह रखने वाली दो गैर-सरकारी संस्थाओं की रिपोर्टों पर आधारित इस अध्ययन का नतीजा यह है कि भारतीय राजनीति में सफलता का एकमात्र सूत्र 'चुनाव जीत सकने' की क्षमता है।
 
इस बिंदु पर जातीय एवं सांप्रदायिक समीकरण तथा धन-बल की ताकत सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। नतीजतन, संसद में उपस्थित रहने, प्रश्न पूछने, बहसों में भाग लेने आदि जैसी गतिविधियों में अपना समय लगाने वाले सांसद प्रतिष्ठा भले अर्जित करते हों, मगर सत्ता-राजनीति में अपनी हैसियत नहीं बढ़ा पाते। इस समस्या की जड़ें आम जन-मानस से लेकर राजनीतिक दलों के ढांचे एवं वैधानिक प्रावधानों तक में निहित हैं। सांसद का प्राथमिक कार्य क्या है? संसदीय व्यवस्था की मूल भावना के मुताबिक इसका उत्तर होना चाहिए विधायी प्रक्रिया में शामिल होना। परंतु वास्तव में ऐसा सोचने वाले कितने लोग होंगे?
 
अक्सर अपने देश में सांसदों से वे अपेक्षाएं की जाती हैं, जो नगर-पार्षदों या पंचायत सदस्यों से की जानी चाहिए। राजनीतिक दलों ने जनमानस को नेतृत्व देने का कार्य बहुत पहले छोड़ दिया है। वे लोगों की सोच से प्रभावित होकर उसी के मुताबिक जीत का जुगाड़ बैठाते हैं। फिर अब सवाल उठाना भी जरूरी हो गया है कि क्या दल-बदल विरोधी कानून के बाद मजबूत हुई ह्विप संस्कृति ने सांसदों की भूमिका को मशीनी नहीं बना दिया है? वे अपने विवेक से व्यवहार नहीं कर सकते, तो संसदीय प्रक्रियाओं में रचनात्मक भूमिका कैसे निभा सकते हैं? एक अन्य बड़ी समस्या आलाकमान कल्चर है। चूंकि टिकट वितरण की विकेंद्रित प्रणाली अपने यहां नहीं है, अत: आलाकमान को नाखुश न करना, या उसे हर हाल में खुश रखना सांसदों के लिए सर्वोपरि बना रहता है। नतीजतन, ज्यादातर सांसद उस काम में सबसे कम रुचि लेते हैं, जिसके लिए उन्हें निर्वाचित किया जाता है। दूसरी तरफ जो सांसद अपना कर्तव्य निभाते हैं, उन्हें उसकी बदौलत दोबारा सदन में पहुंचने तक का आश्वासन नहीं रहता। इस हाल में संसदीय प्रतिमानों में गिरावट कैसे रोकी जा सकती है?