स्कूल जहां आने पर रोज मिलते हैं 10 रूपए

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक स्कूल ने लड़कियों को पढ़ाई छोड़ने से रोकने के लिए एक अनोखी तरक़ीब अपनाई है.
ये स्कूल दिल्ली से क़रीब 125 किलोमीटर दूर बुलंदशहर ज़िले के उप प्रखंड अनूपशहर में स्थित है.
इस स्कूल में छठी कक्षा से ऊपर की हर छात्रा को कक्षा में आने के लिए प्रतिदिन 10 रुपए दिए जाते हैं.
यह पैसा छात्राओं के बैंक खातों में जमा कर दिया जाता है.
इसके अलावा स्कूल की ओर से हर छात्रा को दो जोड़ी ड्रेस, एक स्वेटर और एक जोड़ी जूते, किताबें और दवाएं भी ख़रीदकर दी जाती हैं.
यह स्कूल इन लड़कियों की देश या विदेश में होने वाली उच्च शिक्षा का आधा खर्च भी उठाता है.
 
टॉयलेट बनवाने की मुहिम
स्कूल ने छठी कक्षा की छात्रा मनीषा के घर टॉयलेट बनाने में मदद की. मनीषा के मां-बाप नहीं हैं.
इन सबसे अलग, यह स्कूल ऐसी छात्राओं के घर शौचालय भी बनवाता है, जो अपनी कक्षा में शीर्ष तीन में आती हैं.
यह स्कूल एक एनआरआई वीरेंदर 'सैम' सिंह की संस्था परदादा परदादी एजुकेशन सोसाइटी (पीपीईएस) की ओर से चलाया जा रहा है.
पिछले चार साल में इस स्कूल ने सैकड़ों लड़कियों की पढ़ाई का खर्च उठाया और अब तक लगभग 90 शौचालय बनवाए हैं.
इस स्कूल की शुरुआत वर्ष 2000 में 45 छात्राओं और दो टीचरों के साथ हुई थी.
 
शिक्षा और रोज़गार
आज इस स्कूल में 1300 छात्राएं और 60 टीचर हैं.
यह स्कूल अपनी छात्राओं को सौ फ़ीसदी रोज़गार की गारंटी देता है और उन्हें योग, नर्सिंग, कंप्यूटर इंजीनियरिंग, होटल मैनेजमेंट और खेल प्रशिक्षण जैसे व्यावसायिक क्षेत्रों में जाने के लिए प्रेरित करता है.
स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद सैम साल 2000 में अनूपशहर के अपने गांव लौट आए थे.
यहां आकर उन्होंने ऐसा स्कूल खोलने की सोची, जहाँ छात्राओं के पास 12वीं पास करने के बाद व्यावसायिक प्रशिक्षण लेने का विकल्प हो.
 
आर्थिक मदद
'सैम' का दावा है कि उनकी 85 'बेटियां' विभिन्न शहरों में काम कर रही हैं, 45 उच्च शिक्षा ग्रहण कर रही हैं और 42 लड़कियां इस सत्र से देश के विभिन्न संस्थानों में प्रशिक्षण लेने वाली हैं.
यह संस्था साल 2013 तक अपने छात्राओं की उच्च शिक्षा का पूरा ख़र्च उठाती थी, लेकिन पिछले दो साल से इस सुविधा को आधे छात्राओं तक सीमित कर दिया गया है.
शेष छात्राओं की मदद बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थाओं के ज़रिए की जाती है.
इसी तरह छह साल तक सभी छात्राओं को प्रतिदिन 10 रुपए दिए गए, लेकिन साल 2006 से इसे कक्षा छह और इससे ऊपर के छात्राओं के लिए सीमित कर दिया गया.
 
जागरूकता
यह संस्था केवल छात्राओं के रोज़गार पर ही ध्यान नहीं देती है, बल्कि इस बात को भी सुनिश्चित करती है कि वह 'सामाजिक और आर्थिक रूप से स्वतंत्र और जागरूक मां बनें.'
ये लड़कियां बाल विवाह, पर्दा प्रथा, लिंग भेदभाव और परिवार नियोजन को लेकर इस इलाके में जागरूकता भी फैला रही हैं जो जो ऑनर किलिंग, सामंती सोच और अपराध के लिए कुख्यात है.
इस स्कूल के पहले बैच में सीनियर सेकेंड्री की शिक्षा पाने वाली 14 लड़कियों में से एक प्रीति चौहान पर्दा को ख़ारिज कर चुकी हैं.
वह इसी स्कूल में प्रबंधकीय सहायक के रूप में काम करती हैं और अपने ससुराल से स्कूल तक रोजाना मोटरसाइकिल से आती-जाती हैं.
 
पर्दा प्रथा के ख़िलाफ़
स्कूल में सहायक के रूप में काम करती हैं प्रीति चौहान.
स्कूल की कई छात्राओं ने प्रेम विवाह किया है और अधिकांश ने अपनी पसंद से पति चुना. और इनमें से लगभग हर लड़की ने अपने ससुराल में पर्दा प्रथा को ख़त्म किया.
दो बच्चों की मां आशा, अपने पति दाल चंद के साथ अभिभावकों को अपनी बेटियों की पढ़ाई बीच में छुड़वाने के ख़िलाफ़, समझाने और मनाने की ज़िम्मेदारी निभाती हैं.
कम्प्यूटर इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए जल्द ही अमरीका जाने वाली रीता कहती हैं कि उन्होंने स्कूल में लैंगिक बराबरी पर विश्वास करना सीखा.
रीता कहती हैं, “यहां आप एक-दूसरे का ध्यान रखना और अपना सम्मान करना सीखते हैं. ठीक-ठाक अंग्रेज़ी आपके आत्मविश्वास को बढ़ाती है.”
 
शर्त
सरिता सागर ने इसी साल ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की है. अब वो तीन साल के कम्प्यूटर इंजीनियरिंग का कोर्स करने जा रही हैं.
अनूपशहर में ही मदार गेट के इलाक़े में देह व्यापार में लगी एक महिला की बेटी सोनम भी इसी स्कूल में पढ़ती हैं. वे कहती हैं, “अच्छी अंग्रेजी बोलना मेरा सपना है.”
यह स्कूल मुख्य रूप से डोनेशन पर चलता है और इसको मदद करने वालों में अर्न्स्ट एंड यंग, भारती फ़ाउंडेशन, एक्सिस बैंक फ़ाउंडेशन, डीएलएफ़ फ़ाउंडेशन और ड्यूपोंट इंडिया शामिल हैं.
लड़कियों के बैंक खाते में जमा पैसे निकालने के लिए स्कूल की कुछेक शर्तें भी हैं, इनमें से एक शर्त ये है कि उन्हें 21 साल की उम्र से पहले शादी नहीं करनी होगी.
 
 
- नरेंद्र कौशिक ( बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए)
फोटो साभारः नरेंद्र कौशिक