पद्मावती: विरोध प्रदर्शन के निहितार्थ

मशहूर कवि मलिक मुहम्मद जायसी आज जिंदा होते तो ‘पद्मावत’ लिखने के बाद इस समय कुछ ऐसे संगठनों का विरोध झेल रहे होते जिन्हें कोई जानता तक नहीं है। वो लाख दावा करते कि उनकी लिखी ‘पद्मावत’ काल्पनिक पात्रों पर आधारित है लेकिन राजपूती आन बान शान के रखवाले उनकी किताब की होली जला रहे होते। ऐसे में खुद जायसी भी ‘पद्मावत’ को प्रकाशित करने की बजाय अपनी पांडुलिपि को रद्दी में बेचना ज्यादा पसंद करते पर अफसोस निर्माता निर्देशक संजय लीला भंसाली ऐसा नहीं कर सकते। 250 करोड़ रुपये लगाकर उन्होंने इतिहास को काल्पनिक जामा पहना रुपहले पर्दें को जीवंत कर फिल्म पद्मावती बनाई है लेकिन विरोध थमने का नाम नहीं ले रहा। एक दिसंबर की रिलीज टलने के बाद अब ‘पद्मावती’ मल्टीप्लेक्स में कब दिखेगी कोई नहीं जानता?

पद्मावती के बहाने जो भी देश में चल रहा है वो लोकतंत्र, संविधान और कानून के तहत किसी भी मायने में सही नहीं है। हमारे संविधान ने अभिव्यक्ति की आजादी दी है लेकिन इसी की आड़ लेकर ज्यादातर कलाकारों और फिल्मों को निशाना बनाया जा रहा है।

संजय लीला भंसाली कह रहे हैं कि उनकी पद्मावती काल्पनिक कहानी पर है लेकिन दुनिया जानती है कि पद्मावती या पद्मिनी सिर्फ राजस्थान ही नहीं, पूरे देश में वीर योद्धा के रूप में जानी जाती हैं। मध्ययुग के प्रसिद्ध कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने अपनी महान कृति ‘पद्मावत’ में चित्तौड़ की इस महारानी का ऐसा सुंदर चरित्र-चित्रण किया है कि वे भारतीय नारी का आदर्श बन गई हैं। अगर ऐसी पूजनीय देवी का कोई फिल्म, कविता या कहानी में अपमान करे तो उसका विरोध होना चाहिए, पर सलीके से। लेकिन ये भी जरूरी है कि विरोध करने से पहले उस कला-कृति को देखा जाए, पढ़ा जाए और उसका विश्लेषण किया जाए। पर जो संगठन इस फिल्म का विरोध कर रहे हैं, उन्होंने और उनके नेताओं ने ये फिल्म देखी भी नहीं है।

खुद को राजपूतों का संगठन कहने वाले करणी सेना के अलावा कई राजनेता फिल्म का ये कह कर विरोध कर रहे है इसमें इतिहास को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है। कई हिंदूवादी संगठन भी फिल्म के विरोध में है। बीजेपी शासित राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात के मुख्यमंत्री कह चुके हैं फिल्म को सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन यानि सीबीएफसी का सर्टिफिकेट मिलने के बाद भी अपने राज्यों में वो पद्मावती को रिलीज नहीं होने देंगे। फिल्म पर रोक लगाने को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा तो उसने ये कहकर मामले को खारिज कर दिया की अभी फिल्म को सीबीएफसी ने पास ही नही किया है तो वो रोक कैसे लगा सकता है?

एक ऐसे विषय पर फिल्म जोकि धार्मिक नहीं, महज एक काल्पनिक कहानी पर है का विरोध बेमानी है। 'पद्मावत' मालिक मोहम्मद जायसी का एक काल्पनिक काव्य है। ये कुछ ऐसा ही है जैसे देश में हीर-रांझा और लैला-मजनू का वजूद माना जाता है। लेकिन अब कोई सिरफिरा हीर-रांझा और लैला-मजनू को धार्मिक और राजनीतिक रूप देकर लड़ना शुरू कर दे, तो कैसा लगेगा? ऐसे में ये विवाद और विरोध हास्य और मूर्खता से लबरेज दिखाई देगा।

ताज्जुब इस बात का है कि पद्मावती अभी सीबीएफसी से पास नहीं हुई है। ना ही विरोध करने वालों ने इस फिल्म को देखा है। संजय लीला भंसाली ने कुछ नामचीन लोगों को ये फिल्म दिखाई है। सभी ने इसके बड़े कैनवास और विषय वस्तु की खुले दिल से तारीफ की है। इस तारीफ से सीबीएफसी आग बबूला है कि बिना उसकी अनुमति के फिल्म दिखा कैसे दी गई। अपनी छीछालेदर से अब सीबीएफसी बैक फुट पर है।

सीबीएफसी को संक्षेप में सेंसर बोर्ड भी कहा जाता है। इसकी स्थापना 1952 में सिनेमैटोग्राफ एक्ट के तहत इस मकसद से की गई थी कि किसी भी फिल्म और विज्ञापन को प्रसारित करने से पहले सेंसर बोर्ड से पास कराना जरूरी होगा लेकिन  सेंसर बोर्ड इन दिनों फिल्म पास करने की बजाय अब अपने आपको समाज सुधारक की भूमिका में ज्यादा देख रहा है। सेंसर बोर्ड को लगता है कि देश को सुधारने की नैतिक जिम्मेदारी उसकी है। इससे लीक से हटकर बनी फिल्में सेंसर बोर्ड में आकर फंस रही है और फिल्माया गया सच पर्दें पर नहीं आ पा रहा।

पेड़ के इर्दगिर्द घूमने वाले प्रेमी प्रेमिका को छोड़कर किसी भी निर्माता निर्देशक ने लीक से हटकर फिल्म बनाने की कोशिश की तो सेंसर बोर्ड लड़की के पिता की तरह विलेन बनकर उसकी राह में रोड़े अटकाने के लिए तैयार नजर आया है।

सेंसर बोर्ड का काम फिल्म की विषय वस्तु के हिसाब से उन्हें  ‘ए’, ‘यू’, ‘ए/यू’ अथवा ‘एस’ प्रमाण-पत्र देना है लेकिन 1952 से अपने वजूद के बाद से ही ये राजनीतिक दखलंदाज़ी से अछूता नहीं रहा है।  इसने 1959 में ‘नील आकाशेर नीचे’ फिल्म से शुरू करके किस्सा कुर्सी का, गरम हवा, सिक्किम, बैंडिट क्वीन, कामसूत्र, उर्फ प्रोफेसर और फायर जैसी दर्ज़नों बोल्ड फिल्मों को प्रतिबंधित कर दिया

19 जनवरी, 2015 को एनडीए सरकार ने पहलाज निहलानी को सेंसर बोर्ड की जिम्मेदारी दी। निहलानी फिल्मों पर आए दिन कैंची चलाते थे और बात-बात पर सिनेमैटोग्राफ एक्ट 1952 की नियमावली से बंधे होने की दुहाई देते थे। लेकिन सब जानते हैं इक्कीसवीं सदी में बाबा आदम के ज़माने के दिशा-निर्देश बेमानी हैं। चुम्बन, अंतरंग व शराब का उपयोग दिखाने वाले दृश्य से तो निहलानी को इस कदर चिड़ थी कि निर्माता-निर्देशकों से उनका पंगा हो जाता था.  अपनी इसी समझ के चलते उन्होंने अलीगढ़, उड़ता पंजाब, अनफ्रीडम, बॉडीस्केप, लिपिस्टिक अंडर माय बुरका, इंदु सरकार, बाबूमोशाय बंदूक़बाज़ जैसी बीसियों फिल्मों की राह में रोड़े खड़े कर दिए। उन्होंने स्पेक्टर, एटॉमिक ब्लॉण्ड, डेडपूल, ट्रिपल एक्स: रिटर्न ऑफ ज़ेंडर केज, द हेटफुल एट जैसी कई हॉलीवुड ब्लॉकबस्टर्स को भी नहीं बख़्शा। फिल्म उड़ता पंजाब को तो अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा जिसके हक़ में फैसला सुनाते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि सीबीएफसी फिल्मों को सेंसर नहीं कर सकता।

सेंसर बोर्ड को समझना चाहिए कि तकनीक और ज़माने के साथ हर माध्यम का फलक विस्तृत होता चला जाता है। फिल्म निर्माताओं का दृष्टिकोण, विषय-वस्तु और कंटेंट के साथ उनका बर्ताव भी बदलता है। लेकिन सेंसर बोर्ड की सुई 1952 में ही अटकी हुई है। इसके दिशा-निर्देश भी बहुत अस्पष्ट हैं जिनकी व्याख्या सदस्यगण अपनी-अपनी समझ और श्रद्धानुसार करते आए हैं। जैसे एक दिशा-निर्देश है- ‘अगर फिल्म का कोई भी हिस्सा भारत की सम्प्रभुता एवं अखंडता के हितों के विरुद्ध है, भारतीय राज्य की सुरक्षा के लिए ख़तरा पैदा करता है, विदेशी मुल्कों से दोस्ती में दरार डालता है, क़ानून-व्यवस्था अथवा शिष्टता का उल्लंघन करता है, न्यायालय की अवमानना करता है, या फिर लोगों की भावनाएं भड़काने में मुब्तिला होता है, तो उस फिल्म को प्रमाणित नहीं किया जाएगा। इसके अलावा सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष को इतनी शक्ति हासिल हैं कि वह फिल्मकार के सौंदर्य बोध पर अकेले ही झाड़ू फिरा सकता है।

पहलाज निहलानी ने इस साल जुलाई में निर्माता-निर्देशक मधुर भंडारकर की फिल्म ‘इंदु सरकार’ को 14 कट्स लगाने का आदेश दिया। सेंसर बोर्ड ने फिल्म में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और 1977 में जनता पार्टी की सरकार के प्रधानमंत्री रहे स्व. मोरारजी देसाई के नाम को भी इस्तेमाल करने की परमीशन नहीं दी। इतना ही नहीं, सेंसर बोर्ड फिल्म में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानि आरएसएस के नाम के इस्तेमाल से भी खफा था। इमरजेंसी के बाद कांग्रेस की रैलियों में गाने से इंकार करने के बाद बैन हुए गायक किशोर कुमार के नाम को भी इस्तेमाल करने की इजाजत सेंसर बोर्ड से नहीं मिली।

फिल्म के प्रोमो में एक डायलॉग था - ‘अब इस देश में गांधी के मायने बदल गए हैं।’ सेंसर की ओर से इस डायलॉग पर भी ऐतराज जताया गया। दिलचस्प ये है कि फिल्म के ट्रेलर में इस संवाद पर सेंसर की ओर से कोई आपत्ति नहीं की गई थी। मधुर को सेंसर बोर्ड की ओर से इस बात का भी आदेश दिया गया कि फिल्म के शुरू में दो डिस्केलमर लगाए जाएं, जिनमें कहानी और पात्रों के काल्पनिक होने की बात हो। इतने दिशा निर्देशों से भंडारकर नाराज हो गए और इसे अभिव्यक्ति की आजादी के विपरीत बताया। बाद में इन्दु सरकार किसी तरह रिलीज हो पाई।

फिल्मफेयर और कई नेशनल अवॉर्ड जीत चुके फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल ने सेंसर बोर्ड की कार्यप्रणाली में बदलाव को लेकर 2016 में केंद्र को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। लेकिन सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया जबकि उस रिपोर्ट में कुछ ऐसे सुझाव दिए हैं कि सीबीएफसी को फिल्में सेंसर करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, सिर्फ उचित श्रेणी में उनका प्रमाणन करना पड़ेगा।

पहलाज निहलानी के जरूरत से ज्यादा सेंसर बोर्ड में फिल्मों पर कैंची चलाने को लेकर उनकी विदाई हो गई। अब उनकी जगह प्रसून जोशी मोर्चे पर है। प्रसून से पूरी फिल्म इंडस्ट्री ने बड़ी उम्मीद लगा रखी है क्योंकि वह पूर्वाग्रह से ग्रसित इंसान नहीं हैं। कुछ साल पहले उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था- ‘हमें ऐसा समाज गढ़ने की जरूरत है जहां किसी प्रकार की सेंसरशिप की जरूरत ही ना रहे.’। एक परिचर्चा में प्रसून ने सरकार के सेंसर करने के अधिकार पर ही सवाल उठा दिए थे। लेकिन वह तब की बात थी जब वह सिस्टम का हिस्सा नहीं थे। लेकिन अब उनकी पहली बड़ी परीक्षा ‘पद्मावती’ ले रही है। ‘पद्मावती’ सेंसर बोर्ड के पास है और बोर्ड उस पर कितने कट लगाता है और कैसे रिलीज के लिए हिम्मत जुटा पाता है उस पर पूरे देश की नजर है।
                           

- नवीन पाल (लेखक वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं)

नवीन पाल