क्या नहीं देखा जाताः पी.ए.बब्बर का मामला

फ्रेडरिक बास्तियात ने अपने बहुचर्चित प्रभावी लेख, “क्या देखा जाता है और क्या नहीं देखा जाता” में लिखा है कि हम कैसे मान लेते हैं कि एक सामाजिक प्रणाली का एक तय परिणाम ही होगा, जबकि इसके कई परिणाम हो सकते हैं। ये सभी विरोधाभासी भी हो सकते हैं। सच में तो हम यह भी सोच सकते हैं कि “न देखी गई बात को देखने” की सोच तो कथनात्मक प्रक्रिया है, जिसमें लगातार कुछ न कुछ जोड़ते रहने की जरुरत है। और वाकई, ‘क्या नहीं देखा जाता’ वाकई दृष्टिकोण का मामला है। और जितने ज्यादा लोग उतने ज्यादा दृष्टिकोण। इसी अलग-थलग बात में मैं कॉमनवैल्थ गेम्स के संबंध में अपने कुछ विचार जोड़ना चाहूंगा।

मेरा निरीक्षण इस बात से जुड़ा है कि कैसे इन खेलों ने प्रॉपर्टी एजेंट बंटी बब्बर की किस्मत को प्रभावित किया। पी.ए.बब्बर ने कॉमन वैल्थ गेम्स का जश्न फिर से शादी करके, नई होंडा जेज़ और यामाहा आर 15 खरीदकर मनाया। बब्बरजी उत्तरी दिल्ली की एक कॉलोनी विजय नगर में काम करते हैं। एक ऐतिहासिक इलाका और दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैम्पस के छात्रों के लिए घर की तरह ही है। कॉलोनी में टूटे-फूटे फ्लैट हैं जो एक के ऊपर एक जमे हुए हैं, दो लंबी कतारों में। एक बेहद गंदे और कूड़े भरे रास्ते के दोनों ओर। पहली पीढ़ी के अधिकांश बुजुर्ग या फिर 1947 के निर्वासितों की दूसरी पीढ़ी के बेरोजगार, छात्रों का अपनी जिंदगी, दिल और जेब में स्वागत करते हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रों के अलावा कौन इस करामाती और रहस्यमयी विजय नगर में सुकून पा सकता है।

रोजमर्रा की जिंदगी जीने वालों के लिए कॉलेजों के होस्टल हैं, जो कॉलेज में उपस्थिति और ऐसी ही छोटी-मोटी बातों के काम आते हैं। होस्टलों ने ही दरअसल विजय नगर को आबादी के विस्फोट से बचा रखा है। हालांकि दिल्ली सरकार और संबंधित कॉलेज के अधिकारियों द्वारा कॉमनवैल्थ गेम्स के लिए छात्रों को होस्टलों से बेदखल करने के कारण विजय नगर की तो चांदी हो गई। मांग बढ़ते ही विजय नगर के फ्लैट्स की कीमतों में भारी उछाल आ गया।

यही वो बात है जिसमें पी.ए.बब्बर की भूमिका शुरू होती है। पी.ए. बब्बर ने अपनी बातूनी और चतुर जुबान के बूते विजय नगर के प्रॉपर्टी के कारोबार में एकछत्र राज सा कायम कर लिया। वो वास्तव में क्या करते हैं यह बात मुझे कुछ असमंजस में डाल देती है, लेकिन मैं जानता हूं कि जब आपको वहां फ्लैट खरीदना हो तो उनकी मौजूदगी लाजमी है। और पी.ए. बब्बर अपने इस बेहद अपरिभाषित से सहयोग के लिए फ्लैट के किराये का आधा कमीशन के तौर पर लेते हैं। होस्टल खाली कराने के आदेश ने न केवल बब्बर जी बल्कि मकान मालिकों की भी चांदी कर दी । दोनों ने ही मिलकर फ्लैट्स के दाम दोगुने कर दिए। हालांकि जैसे ही होस्टल की जिंदगी के आदी छात्र लौट जाएंगे, फ्लैटों की कीमत में गिरावट आएगी. फक्कड़ किस्म के छात्र निश्चित तौर पर राहत की सांस लेंगे। इसलिए फ्लैट के मालिकों और किरायेदारों के बीच गेम्स से पहले और बाद को लेकर अपने-अपने दृष्टिकोण हैं, लेकिन इन सबमें पी.ए. बब्बर का क्या? आइए अब हम समझ सकते हैं कि उन्होंने दिल्ली में कॉमनवैल्थ गेम्स का क्यों स्वागत किया था। वो दोहरा कमीशन कमा सकेंगे। पहले तो गेम्स के कारण आई फ्लैट्स की मांग में इजाफे से और फिर फ्लैट्स की मांग में गिरावट से।

इसीलिए भले ही वो जोर-जोर से दिल्ली सरकार को कोस रहे हों, आज वो इतना कमा रहे हैं कि सुरेश कलमाड़ी और शीला दीक्षित को भी चुनौती दे सकते हैं.

जो नहीं देखा जाता का इससे आसान उदाहरण और क्या होगा। मैं नहीं जानता लेकिन आप चाहें तो जाकर विजय नगर इलाके में उनकी उपयोगिता पर सवाल उठा सकते हैं, लेकिन लगता नहीं कि आप सुरक्षित बाहर निकल सकेंगे।