आउटसोर्सिंग से लाभ कई

पिछले 10-15 सालों में भारत में आउटसोर्सिंग उद्योग ने बहुत प्रगति की है. आउटसोर्सिंग से ना सिर्फ लाखो लोगो को रोज़गार मिला, देश की GDP (सकल घरेलू उत्पाद) को भी इसकी वजह से एक बड़ा उछाल मिला. विश्व के बड़े और विकसित देश आज भारत सरीखे कई अन्य विकाशील देशों से अपने काम सस्ती दरों पर कराते हैं. सस्ती जगहों में अपना काम आउटसोर्स करने के कई फायदे हैं. अव्वल तो इन देशों को कम दरों पर काम करने वाले पर काबिल कर्मचारी मिल जाते हैं. खासतौर पर भारत में काम करने लायक युवा जनता ना सिर्फ अच्छी अंगेजी बोलना जानती है, वो कंप्यूटर का भी ज्ञान रखती है. अमरीका सरीखे अन्य देशों के लिए ये एक बहुत लुभावनी बात साबित होती है की उनका सारा काम बहुत कम दाम में और उच्च गुणवत्ता के साथ हो जाता है. इसके अलावा भारत में तेज़ी से सुधरता आधारभूत ढांचा, स्थायी सरकार और निवेश समर्थक कानून  आउटसोर्सिंग में सहायक साबित रहे हैं.

हालांकि 2008 की आर्थिक मंदी के बाद आउटसोर्सिंग उद्योग को काफी झटका लगा. विश्व की बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां जो नियमित रूप से भारत काम भेजा करती थी, अपने स्वयं के व्यवसाय को नुकसान से बचाने में लगी थीं. भारत के अग्रणी सॉफ्टवेर क्षेत्र में खासतौर पर मंदी का असर देखा गया. फलस्वरूप, इनफ़ोसिस, विप्रो, टी सी एस और पटनी जैसी बड़ी सॉफ्टवेर कम्पनियां अमरीका और यूरोप में आलोचना का भी बड़ा शिकार बनी.

इन देशों के राजनीतिज्ञों ने आरोप लगाया की ये कम्पनियां वहाँ की नौकरियां छीन कर भारत ले जा रही हैं. अमरीका के नए राष्ट्रपति बराक ओबामा को तो काफी नकरात्मक प्रचार का सामना करना पड़ा.

हाल ही में अपनी भारत यात्रा पर रवाना होने से पहले जब ओबामा से आउटसोर्सिंग पर उनके प्रशासन की नीतियों पर भारत की चिंताओं के बारे में पूछा गया तो अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा, "राष्ट्रपति होने के नाते मेरी जिम्मेदारी अमेरिकी लोगों के लिए नौकरियों और रोजगार के अवसर सुनिश्चित करना है और मुझे लगता है कि भारत अमेरिकी आर्थिक संबंध दोनों देशों को लाभ पहुंचा सकते हैं और पहुंचाना भी चाहिए."

अपने देशवासियों की रोज़गार सम्बन्धी चिंताएं शांत हो सकें, इसके लिए उन्होने भारत के साथ 10 अरब डालर के 20 समझौतों पर भी बाद में हस्ताक्षर किये.

अपनी तरफ से  प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि भारत अमेरिकी रोजगार चुराने वाला काम नहीं कर रहा है, आउटसोर्सिग [भारत में व्यावसायिक कार्य कराने] से अमेरिका की उत्पादन क्षमता तथा उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिली है।

आउटसोर्सिंग साझा व्यापार का ही एक सुन्दर उदारहण  है. ये एक ऐसी व्यापारिक प्रक्रिया है जिस से दोनों भाग लेने वाले देशों का फायदा है. आउटसोर्सिंग पर प्रतिबन्ध लगाने जैसे और अन्य व्यापार रक्षावादी नियम अमरीका और किसी भी देश के लिए लाभकारी नहीं होंगे. अमरीका में आउटसोर्सिंग के विरोध में उठे हालिया प्रचार के चलते वहाँ सीनेट में आउटसोर्सिंग विरोध बिल तो पास नहीं हो पाया पर  वीसा नियम थोडे कड़े कर दिए गए और विदेशी कर्मचारियों के लिए वीसा फीस भी बढ़ा दी गयी. इन कदमों की वजह से भारतीय कम्पनियाँ दूसरे देशों जैसे जापान, चीन, एशिया पसिफिक, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में आउटसोर्सिंग कारोबार की संभावनाएं तलाशने लगी हैं. 50 बिलियन डालर वाला भारत का सॉफ्टवेर उद्योग किसी भी हालत में अपना नुकसान नहीं होने देगा. उलटे अमेरिका को देखना होगा की वो  कड़े नियम अपना कर अपनी चरमरायी हुई अर्थव्यवस्था का भला कर रहा है या बुरा.

मुक्त व्यापार नीति के प्रणेता पश्चिमी देशों को चाहिए की वो विपरीत परिस्थितियों में अपनी ही विचारधारा से पीछे ना हटें और तेज़ी से ऊपर आते भारत और चीन के विकास में सहायक बनें.

- स्निग्धा द्विवेदी