आधुनिक मनुष्य अभी तक अस्तित्व में आया ही नहीं: ओशो

दिल्‍ली गैंग रेप के बाद कोई भारत-इंडिया में भेद को इसका कारण बता रहा है, कोई बॉलिवुड को गाली दे रहा है, कोई अश्‍लीलता तो कोई महिलाओं के कपड़े और उसकी जीवनशैली पर ऊंगली उठा रहा है, कोई पश्चिमीकरण को इसका दोषी ठहरा रहा है, कई खुद को महिला स्‍वतंत्रता के पैरोकार साबित करने में जुटे हैं। सच तो यह है कि अभी ये खुद ही समकालीन मनुष्‍य नहीं हैं। आइए जानते हैं इस सदी के प्रबुद्ध चेतना ओशो समकालीन मनुष्‍य किसे मानते हैं....

ओशोः आधुनिक मनुष्य अभी तक अस्तित्व में आया ही नहीं है। दुनिया के सभी लोग बहुत पुरातन और बहुत प्राचीन हैं। किसी भी समकालीन व्यक्ति से भेंट कर पाना बहुत दुर्लभ है। कोई दस हजार वर्ष पूर्व स्थापित किए गए धर्म से संबंधित है, कोई दो हजार वर्ष पूर्व स्थापित किए गए धर्म से जुड़ा है--ये लोग समकालीन नहीं हैं। ये लोग आधुनिक युग में तो रह रहे हैं, पर ये आधुनिक हैं नहीं।

और इसी कारण एक बड़ी समस्या पैदा हो गई है: तकनीकी और वैज्ञानिक प्रगति की आवश्यकता है, जिससे कि आधुनिक मनुष्य इसका उपयोग करे और आधुनिक मनुष्य उपलब्ध है नहीं। टेक्नॉलजी, प्रौद्योगिकी उपलब्ध है, विज्ञान उपलब्ध है, लेकिन वे व्यक्ति जो इसका रचनात्मक उपयोग कर सकें, उपलब्ध नहीं हैं।

फलतः परिणाम विनाशकारी सिद्ध हुए हैं। क्योंकि इन लोगों को जो समकालीन नहीं हैं, विज्ञान ने तकनीकी यंत्र, मशीनें दे दी हैं जो कि खतरनाक हैं। यह बच्चे के हाथ में तलवार दे देने जैसा है: वह दूसरे को या स्वयं को ही घायल कर रहा है; वह तलवार चलाना नहीं जानता है, वह इसके लिए प्रशिक्षित नहीं है।

आदमी पीछे रह गया है और टेक्नॉलजी उससे बहुत आगे निकल गई है। वह नहीं जानता कि इसका क्या करे, इसका उपयोग कैसे करे, और जो कुछ भी वह करेगा वह गलत होने ही वाला है।

परमाणु ऊर्जा मनुष्यता के लिए एक बड़ा वरदान बन सकती थी। यह संपूर्ण गरीबी को दूर कर सकती थी। लेकिन गरीबी हटाने की जगह, मनुष्य के जीवन को समृद्ध बनाने की जगह, इसने हिरोशिमा और नागासाकी में निर्दोष लोगों को नष्ट कर दिया, जिन्होंने किसी का कुछ भी नहीं बिगाड़ा था।

और अब तो वे परमाणु बम जिन्होंने नागासाकी और हिरोशिमा को नष्ट कर दिया था, खिलौनों की भांति हैं, क्योंकि अब तो हमारे पास परमाणु अस्त्र इतने शक्तिशाली हैं कि वे पूरी की पूरी पृथ्वी को सात सौ बार नष्ट कर सकते हैं। और कोई यह आशा भी नहीं कर सकता कि रोनाल्ड रीगन या इस तरह के लोग समकालीन हो भी सकते हैं।

उसके पास एक चिम्पांजी था, वही उसका एकमात्र मित्र था। इन अरबों व्यक्तियों में उसे अपना मित्र बनाने योग्य कोई व्यक्ति नहीं मिला...एक चिम्पांजी! और तुम्हारा संग-साथ तुम्हारे विषय में कुछ दर्शाता है। और जब रीगन अमरीका का राष्ट्रपति बना, पहले ही दिन वह अपने चिम्पांजी को लेकर समुद्र-तट पर सैर करने गया। एक वृद्ध आदमी ने उसे देखा और वह तो अपनी आंखों पर भरोसा ही न कर सका। उसने सोचा कि यह तो पूरे देश के लिए अपमान की बात है कि राष्ट्रपति एक चिम्पांजी को साथ लेकर सुबह की सैर पर निकले। वह आगे बढ़ा उन दोनों को रोका और बोला: 'राष्ट्रपति महोदय, क्या आप सोच सकते हैं कि क्या यह ठीक लगता है कि कोई एक महान देश का राष्ट्रपति हो, और उसका मित्र एक चिम्पांजी हो?'

रोनाल्ड रीगन कुछ कहने ही वाला था कि बूढ़े ने उससे कहा: 'तुम चुप रहो! मैं तुमसे नहीं पूछ रहा हूं; मैं राष्ट्रपति महोदय से बात कर रहा हूं।' वह सोच रहा था कि चिम्पांजी राष्ट्रपति महोदय थे--और शायद वह सही था। कभी-कभी मजाक गंभीर होते हैं।

आधुनिक तकनीक और विज्ञान ने आदमी को भ्रष्ट नहीं किया है। आदमी आधुनिक विज्ञान और टेक्नॉलजी को सही ढंग से उपयोग करने में समर्थ नहीं है। आधुनिक मनुष्य अभी पैदा ही नहीं हुआ है।

मुझे एच.जी.वेल्स का स्मरण आता है जिसकी गणना दुनिया के सर्वश्रेष्ठ इतिहासविदों में की जाती है। जब उसकी पुस्तक प्रकाशित हुई, किसी इंटरव्यू लेने वाले ने उससे पूछा: 'सभ्यता के बारे में आपका क्या विचार है?' एच.जी. वेल्स ने कहा: 'मेरा विचार? सभ्यता एक अच्छा विचार है, परंतु अभी तो यह होनी है। अभी तो यह एक विचार ही है, किसी को तो इसे वास्तविक बनाना ही चाहिए।' टेक्नॉलजी और विज्ञान समस्याएं नहीं हैं। समस्या है अविकसित मनुष्य। मगर हम भी विचित्र लोग हैं। हम सदा विचित्र ढंग से सोचते हैं।

महात्मा गांधी सोचते थे कि यदि चरखे के बाद मनुष्य और उसकी बुद्धि द्वारा विकसित सारे विज्ञान और टेक्नॉलजी को समुद्र में डुबो दिया जाए, तब सारी समस्याएं हल हो जाएंगी। और मजेदार बात इस देश ने उनका विश्वास कर लिया! और न केवल इस देश ने बल्कि दुनिया में लाखों लोगों ने उनका विश्वास कर लिया कि चरखा सारी समस्याओं का समाधान कर देगा।

रेलगाड़ियों को रोक दिया जाना चाहिए, हवाई जहाजों को रोक दिया जाना चाहिए, डाकघरों को बंद कर देना चाहिए, तार, टेलीफोन को नष्ट कर देना चाहिए--क्योंकि ये सभी चीजें चरखे के बाद आई हैं। सच तो यह है कि कोई नहीं जानता कि क्या बचाया जा सकता है। बिजली?--नहीं। चिकित्सा विज्ञान?--नहीं। सच तो यह है कि यह मालूम करना पड़ेगा कि चरखे का आविष्कार कब किया गया...शायद बैलगाड़ी बचाई जा सके, आग बचाई जा सके...बस इतना ही: आग, बैलगाड़ी और चरखा, और फिर हर व्यक्ति महात्मा है--और सारी समस्याएं अपने से ही समाप्त हो जाती हैं।

टेक्नॉलजी का तो सवाल ही नहीं है। यही तो महात्मा गांधी भी जोर दे रहे थे कि टेक्नॉलजी ही मनुष्य को भ्रष्ट कर रही है। मेरी लड़ाई महात्मा गांधी से इसी बात पर है कि मनुष्य ही अविकसित है, मनुष्य की टेक्नॉलजी का सही उपयोग करने में समर्थ नहीं है।

टेक्नॉलजी कैसे मनुष्य को भ्रष्ट कर सकती है? क्या तुम सोचते हो कि यदि महावीर आ जाएं, और एक बंदूक देख लें, बंदूक महावीर करे भ्रष्ट कर देगी, और वह इधर-उधर गोली चलाना प्रारंभ कर देंगे, इस तरफ और उस तरफ, क्योंकि बंदूक ने उनको भ्रष्ट कर दिया है।

तकनीक किसी को भ्रष्ट नहीं कर सकती। तकनीक तो बस एक साधन है तुम्हारे हाथों में, और तुम इससे जो बनाना चाहो बना सकते हो। चिकित्सा विज्ञान सोचता है कि मनुष्य तीन सौ वर्ष तक जी सकता है: बुढ़ापे से बचा जा सकता है, बीमारियां समाप्त की जा सकती हैं, आदमी तीन सौ वर्ष तक जवान, स्वस्थ जी सकता है। पर उस ओर कोई उत्सुक नहीं है, कोई राजनीतिज्ञ उसमें उत्सुक नहीं है। उनकी उत्सुकता है कि मृत्यु-किरणें कैसे निर्मित की जाएं।

और यदि मृत्यु किरणें निर्मित की जा सकती हैं, तो क्या तुम सोचते हो कि यह अकल्पनीय है कि जीवन-किरणें भी निर्मित की जा सकें? वही प्रतिभा, वही वैज्ञानिक जो मृत्यु किरणें बना सकता है, वह जीवन किरणें बनाने में भी समर्थ है। लेकिन जीवन-किरणों को तो कोई भी नहीं चाह रहा है। मांग तो मृत्यु-किरणों की है, और जहां तक संभावना है, सोवियत संघ और अमरीका दोनों ही के पास मृत्यु किरणें हैं भी। फिर परमाणु बम के साथ मिसाइल छोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है; मृत्यु-किरणों को एक विशेष दिशा में निर्देशित किया जा सकता है, और वे मनुष्यों से उन्हें इस भांति मारते हुए गुजरेंगी... वे किसी और चीज को नष्ट नहीं करेंगी।

तुम्हारा फर्नीचर, तुम्हारे घर, तुम्हारी कारें बच जाएंगी -- वे केवल जीवन को विनष्ट करेंगी। कैसी अदभुत दुनिया है। अगर मृत्यु-किरणें प्रयोग में लाई जाएं, घर खड़े रहेंगे, कारें रहेंगी, रेलगाड़ियां रहेंगी; बस जीवन कहीं नहीं होगा। जीवन समाप्त हो जाएगा।

क्या टेक्नॉलजी मनुष्य को भ्रष्ट कर रही है? नहीं, इस गांधीवादी विचार से मैं सहमत नहीं हूँ। मैं आशा करता हूं कि हम जीवन-किरणें निर्मित कर सकेंगे, ताकि जीवन किरणें यदि किसी गांव से होकर गुजरें, सारा गांव जवान, जीवन से भरपूर हो जाए। लेकिन धर्म मेरे विचार को पसंद नहीं करेंगे, क्योंकि फिर तो बूढ़े लोग भी प्रेम में पड़ना प्रारंभ कर देंगे। जीवन किरणें?--कोई धर्म तैयार न होगा। मृत्यु किरणें बिलकुल ठीक हैं।

वेटिकन से गुजरती जीवन-किरणें...पोप किसी स्त्री के प्रेम में पड़ जाता है, और डिस्को में नृत्य करना प्रारंभ कर देता है, एक स्त्री मित्र ढूंढ लेता है। जहां तक मेरा संबंध है, मैं तो यह हो जाना बहुत पसंद करूंगा। कंटेम्प्रेरी, समकालीन मनुष्य को अस्तित्व में लाना है। वही मेरा काम है। यही कारण है कि हर कोई मेरे विरुद्ध है--क्योंकि वे लोग समकालीन नहीं हैं। मैं हर किसी के विरुद्ध एक लड़ाई लड़ रहा हूं, क्योंकि यहां पर इस दुनिया में पुराने, प्राचीन, मृत कंकाल हैं...

यदि समकालीन मनुष्य जीवन में आ जाए, सारी टेक्नॉलजी, सारी प्रौद्योगिकी उसकी सेवक हो जाएगी। किसी मनुष्य को फिर नौकर की भांति काम करने की आवश्यकता नहीं होगी; टेक्नॉलजी वह कर सकती है। मनुष्य के काम के घंटे करीब-करीब समाप्त हो सकते हैं। यंत्र वह काम, जितना मनुष्य कभी कर सके, उससे अधिक क्षमता से कर सकते हैं। और यदि सभी काम टेक्नॉलजी और यंत्रों द्वारा संभव हो जाए, मनुष्य अपनी चेतना को विकसित करने के लिए स्वतंत्र हो सकेगा। उसके पास पर्याप्त समय होगा ध्यान के लिए, इस जीवन का अतिक्रमण करने के लिए, भावातीत, अमरत्व में प्रवेश करने के लिए।

और यंत्र चमत्कार कर सकते हैं। तुम्हें दिल का दौरा पड़ता है--कितने लोग दिल के दौरे से मरते हैं--और अब प्रयोगात्मक रूप से तुम्हारे दिल को प्लास्टिक के दिल से बदलना संभव है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम्हारा प्रेम भी प्लास्टिक जैसा हो जाएगा, बल्कि तुम्हारा दिल इतना मजबूत हो जाएगा कि इसके फूल हो जाने की कोई संभावना ही न रहेगी। मनुष्य का शरीर हर संभव तरीके से सुधारा जा सकता है। प्लास्टिक सर्जरी लोगों को इतना सुंदर बना सकती है जिसकी कि कल्पना भी नहीं की जा सकती।

लेकिन राजनैतिक मूढ़ बस इसी बात में उत्सुक हैं कि विनाश कैसे किया जाए। मनुष्य को दीर्घायु बनाने में, मनुष्य को जवान, चिरयुवा, खेलपूर्ण, आनंदित बने रहने देने में उनकी उत्सुकता नहीं है। वे इस पृथ्वी को उत्सव, आनंद, गीत और नृत्य का स्थल नहीं बनने देना चाहते; और वे मनुष्यता को इतना समय भी नहीं देना चाहते कि वह अस्तित्व के नये-नये आयामों में विकसित हो सके। वे पुरानी, तिथि-बाह्य मनुष्यता से पूरी तरह संतुष्ट हैं। इसलिए मैं फिर दोहराता हूं: नया आदमी, समकालीन आदमी अभी संसार के रंगमंच पर नहीं आया है। हमें उसके आगमन की घोषणा करनी है।

आधीआबादी.कॉम पर ओशो वर्ल्ड के साभार प्रकाशित
वास्तविक लेख के लिए क्लिक करें - http://aadhiabadi.com/spirituality/osho-vani-hindi/475-osho-on-modern-man

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