संपत्ति मस्तिष्क से पैदा हुई है मसल्स से नहीं - ओशो

बुद्ध के जमाने में हिन्दुस्तान की आबादी दो करोड़ थी। यह आबादी दो करोड़ ही रहती ज्यादा नहीं हो सकती थी क्योंकि दस बच्चे पैदा होते थे और नौ को मरना ही पड़ता था। क्योंकि न तो भोजन था न दवा थी। न जगह थी न मकान था, न इंतजाम था। उनके शरीर को बचाने का कोई उपाय न था। पिछले डेढ सौ वर्षों में दुनिया में एक्सप्लोजन हुआ है मनुष्यजाति का। आज साढ़े तीन अरब लोग हैं। ये साढ़े तीन अरब लोग पूंजीवाद की व्यवस्था के कारण जीवित हैं अन्यथा वे जीवित नहीं रह सकते थे – पूंजीवादी व्यवस्था के बिना कल्पना से बाहर है कि साढ़े तीन अरब पृथ्वी पर जी जाएं।

पूंजीवाद ने क्या किया? मनुष्य की जगह मशीन को ईजाद किया, मनुष्य को हटाया श्रम से और मशीन को लगाया श्रम में। इसके दो परिणाम हुए। मशीन मनुष्य से हजार गुना काम कर सकती है, लाख गुना काम कर सकती है, करोड़ गुना भी कर सकती है। मशीन की संभावनाएं अनंत हैं। मनुष्य की संभावनाएं बहुत सीमित हैं। मशीन की वजह से संपत्ति का इतना ढ़ेर लगना शुरू हुआ। और दूसरा काम जैसे ही मशीन आई मनुष्य गुलामी से मुक्त हो सका। पूंजीवाद की दूसरी बड़ी देन है दासता का अंत, गुलामी की समाप्ति। अगर मशीन नहीं आती तो मनुष्य की गुलामी कभी मिट नहीं सकती थी। आदमी की गुलामी मिटाना असंभव था। आदमी को गुलाम रहना ही पड़ता, क्योंकि आदमी से काम लेना और आदमी से पीछे उसकी छाती पर या तो कोई सवार हो कोई, पीछे से कोड़े लेकर तभी उसकी हड्डी तोडकर काम लिया जा सकता है।मशीन स्थापित हुई,सब्सिटीट्यूट हुई तो ही मनुष्य मुक्त हो सकता है।

पृथ्वी पर आज आदमी गुलाम नहीं है मुक्त है। लेकिन समाजवाद ने एक झूठी, भ्रामक बात  पैदा करनी शुरू की है कि संपत्ति और पूंजी श्रमिक पैदा कर रहा है। श्रमिक संपत्ति पैदा नहीं कर रहा है। श्रमिक संपत्ति पैदा करने का बहुत गौण हिस्सा है और आज नहीं तो कल श्रमिक सुपरफ्लुअस –व्यर्थ हो जाएगा क्योंकि मशीन उसे पूरी तरह से सब्सिट्यूट कर देगी। पचास साल के भीतर दुनिया में लेबर श्रमिक जैसा आदमी नहीं होगा। होने की जरूरत भी नहीं है।

अशोभन है कि किसी आदमी को मशीन का काम करना पड़े जो मशीन कर सकती है। श्रमिक व्यर्थ हो जाएगा। संपत्ति  के पैदा करने में  श्रमिक धीर-थीरे व्यर्थ होता गया और पचास साल में बिल्कुल बेकार हो जाएगा। श्रमिक की कोई जरूरत नहीं रह जाएगी क्योंकि श्रम गैर जरूरी हिस्सा है। जरूरी हिस्सा उत्पादक बुद्धि है। लेकिन समाजवाद ने यह भ्रम पैदा किया है कि संपत्ति मसल्स से पैदा हुई है। झूठी है यह बात। संपत्ति मस्तिष्क से पैदा हुई है मसल्स से  नहीं। और समाजवाद ने यह जिद की और मसल्स को मस्तिष्क के ऊपर बिठा दिया तो मस्तिष्क विदा हो जाएगा और मसल्स वहीं पहुंच जाएंगी  जहां हजार साल पहले गरीबी और भुखमरी थी, उससे आगे नहीं।

सारी संपत्ति मस्तिष्क की ईजाद है। और सारे लोगों ने संपत्ति पैदा करने का श्रम भी नहीं उठाया है। एक आइंस्टीन ईजाद करता है सारे लोग फायदे लेते हैं। एक फोर्ट संपत्ति पैदा करता है और सारे लोगों तक संपत्ति बिखर जाती है। लेकिन ऐसा समझाया जा रहा है कि पूंजीपति जो है वह लोगों से संपत्ति शोषित करता है। इससे बड़ी झूठी बात कोई हो नहीं सकती। जो संपत्ति है ही नहीं उसका शोषण होगा कैसे? उस संपत्ति का शोषण हो सकता है जो कहीं हो। लेकिन जो संपत्ति कहीं है ही नहीं उस संपत्ति का शोषण कैसे हो सकता है? पूंजीवाद संपत्त्ति का शोषण नहीं करता है संपत्ति पैदा करता है। लेकिन जब संपत्ति पैदा होने लगती है तो दिखाई पड़ना शुरू होती है और हजारों आंखों में ईर्ष्या का कारण बनती है।

समाजवाद के प्रभाव का कारण यह नहीं है कि हर आदमी को दूसरे आदमी के समान समझता है। समाजवाद के बुनियादी प्रभाव का कारण मनुष्य की जन्मजात ईष्य़ा है- उनके प्रति जो सफल हैं, उनके प्रति जो समृद्ध हैं, उनके प्रति जिन्होंने कुछ पाया है। मनुष्य जाति के एक बड़े हिस्से ने न तो ज्ञान पैदा किया है, न संपत्ति पैदा की है, न शक्ति पैदा की है।लेकिन मनुष्य जाति का एक बड़ा हिस्सा ईर्ष्या से प्रेरित जरूर हो गया है । उसे दिखाई पड़ रहा है –संपत्ति है,ज्ञान है,बुद्धि है,लोगों के पास कुछ है और निश्चित ही करोड़ों लोगों की ईर्ष्या को जगाया जा सकता है।रूस में जो क्रांति हुई वह ईर्ष्या से ,चीन में जो क्रांति हुई वह ईर्ष्या या से और इस देश में भी जो समाजवाद की बातें हो रही हैं वे ईर्ष्याजन्य हैं। लेकिन ध्यान रहे कि ईर्ष्या से कोई समाज निर्मित नहीं होता है और यह भी ध्यान रहे कि ईर्ष्या से समाज का  किया गया रूपांतरण फलदायी ,सुखदायी और मंगलदायी नहीं होगा।यह भी ध्यान रहे कि ईर्ष्या से हम किसी समाज को तोड़ तो देंगे लेकिन नई व्यवस्था का सृजन नहीं कर पाएंगे। ईर्ष्या क्रिएटीव नहीं डिस्ट्रक्टीव है।ईर्ष्या कभी भी सृजनात्मक शक्ति नहीं है । वह तोड़ सकती है ,मिटा सकती है ,बना नहीं सकती है ।बनाने की कल्पना ही ईर्ष्या में नहीं होती।

अब यह जो आदमी है  जी रहा है ईर्ष्या में ।मकान बड़े हो सकते हैं सृजन से ईर्ष्या से नहीं।हां ईर्ष्या से बड़े मकान छोटे बनाए जा सकते हैं। लेकिन ईर्ष्या से छोटे मकान बड़े नहीं बनाए जा सकते। ईर्ष्या के पास सृजनात्मक शक्ति नहीं है। ईर्ष्या जो है वह मृत्यु की साथी है जीवन की नहीं।लेकिन सारी दुनिया में समाजवाद का जो प्रभाव है उसकी बुनियाद में ईर्ष्या आधार है।लेकिन मजा यह है कि जिस गरीब को यह ईर्ष्या सता रही है और शायद गरीब को उतनी नहीं सता रही है जितनी अमीर और गरीब के बीच में जो नेता खड़े हैं उनको सता रही है।यह जो ईर्ष्या इनको सता रही है वह ईर्ष्या अमीरो के खिलाफ उतना नुक्सान पहुंचाएगी,वह उतना बड़ा नहीं है। इसका अंतिम नुक्सान गरीबों को ही पहुंचनेवाला है ।क्योंकि अमीर जो संपत्ति पैदा कर रहा है वह अंतत: गरीब तक पहुंच रही है,पहुंचती है,पहुंच ही जाती है। उसे रोकने का कोई उपाय नहीं है।

मैं निकल रहा था ,एक ट्रेन से।दिल्ली जा रहा था ।मेरे कंपार्टमेंट में एक सज्जन थे,रास्ते में एक बड़ा मकान था और उस मकान के आसपास दस पांच छोटे झोपड़े थे ।उन्होंने मुझे देखकर कहा,देखते हैं आप,यह मकान बड़ा हो गया है,इन मकानों को छोटा करके।मैंने कहा आप गलत देख रहे हैं। इस बड़े मकान को बीच से हटा दें तो यह जो आसपास के दस मकान हैं वह बड़े नहीं हो जाएंगे। ये मकान नदारद हो जाएंगे। उस बड़े मकान के बनने से ये दस मकान भी आसपास बन जाते हैं,बनने ही पड़ते हैं। कोई मकान अकेला नहीं बनता है।एक बड़ा मकान जब बनता है तो दस छोटे मकान बन ही जाते हैं क्योंकि उस बड़े मकान को बनाएगा कौन? उस बड़े मकान को बीच से हटा दें तो ये दस मकान विदा हो जाएंगे।