2014 की चुनौतियां और अवसर

वर्ष 2014 में भारत के समक्ष जो सबसे बड़ी संभावना और चुनौती होगी, वह आर्थिक विकास की उच्च दर को वापस लौटाने की होगी, जैसा कि कुछ वर्ष पहले था। यह केवल उच्च विकास ही है जो हमारे देश की सतत समृद्धि को सुनिश्चित करेगी। 2014 के आम चुनावों में हमें अवश्य ही एक ऐसे उम्मीदवार और पार्टी के पक्ष में मतदान करना चाहिए जो विकास को वापस पटरी पर लौटा सके।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि अर्थव्यवस्था में एक फीसद की बढ़ोतरी से प्रत्यक्ष तौर पर 15 लाख नौकरियों का सृजन होता है। हर एक नौकरी से अप्रत्यक्ष तौर पर तीन और नौकरियों का सृजन होता है और प्रत्येक नौकरी से पांच लोगों के परिवार का पालन-पोषण होता है। इस प्रकार अर्थव्यवस्था में एक फीसद के विकास से देश के तीन करोड़ लोग समृद्ध अथवा लाभान्वित होते हैं। आर्थिक सुधार और इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च बढ़ाने से विकास में मदद मिलती है, जबकि कल्याणकारी कार्यों और लोकलुभावन योजनाओं पर खर्च से विकास दर में गिरावट आती है। 2014 में बनने वाली नई सरकार को विकास के पहलू पर अनिवार्य रूप से ध्यान देना होगा।

ढाई साल पहले पूरी दुनिया भारत से ईष्र्या कर रही थी। यह वैश्विक वित्तीय संकट से बच निकला था और इसकी अर्थव्यवस्था नौ प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी। रोजगार के अवसर पैदा हो रहे थे और लाखों लोग गरीबी के चंगुल से बाहर निकल रहे थे। यह स्थिति 1991 में शुरू हुए मुक्त बाजार सुधारों का इनाम थी। जैसे ही सरकार ने व्यापार से नियंत्रण कम किया, अनेक कंपनियों ने देश में शानदार प्रदर्शन कर विदेश में भी सफलता के झंडे गाड़ने शुरू कर दिए। 1991 के बाद से भारत की तमाम सरकारों ने सुधार की प्रक्रिया जारी रखी, किंतु धीमी रफ्तार से। और इस धीमी रफ्तार के बावजूद भारत विश्व की दूसरी सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था बन गया। किंतु कांग्रेस के नेतृत्व में वर्तमान संप्रग-2 सरकार ने भारी गलती कर दी। सोनिया गांधी और उनकी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के प्रभाव में आकर सरकार ने निष्कर्ष निकाला कि भारत के मुक्त बाजार सुधारों और उच्च विकास दर का गरीबों को कोई लाभ नहीं मिल रहा है। इसने गरीबों के कल्याण पर धन खर्च करने पर ध्यान केंद्रित किया। सड़कें, बिजली घर और अन्य ढांचागत निर्माण के बजाय यह सस्ता खाद्यान्न, सस्ती ऊर्जा और किसानों की ऋण माफी आदि योजनाओं पर काम करने लगी। इसका मुख्य कार्यक्रम था ग्रामीण क्षेत्रों में कम से कम सौ दिनों के रोजगार की गारंटी देना। नई परियोजनाओं को हरी झंडी देना करीब-करीब थम सा गया। इसमें सबसे बड़ी बाधा बना पर्यावरण विभाग। परिणामस्वरूप, निवेशकों का विश्वास डिग गया, महंगाई आसमान छूने लगी और आर्थिक विकास दर 4.5 पर आ गई। यह विनाशकारी गलती थी, जिसकी वजह से 12 करोड़ लोगों को मुसीबतों का सामना करना पड़ा।

इस गलती का एक कारण यह है कि सुधारवादी देश के इन सुधारों को लोगों को नहीं बेच पाए। अधिकांश लोगों की यह धारणा बन गई कि मुक्त बाजार से केवल अमीरों को फायदा हुआ, आम लोगों को नहीं। इसलिए सरकार ने अचानक इन सुधारों को तिलांजलि दे दी।?किसी भी पार्टी ने बाजारवादी और व्यापार समर्थित सुधारों के बीच के अंतर को जनता को समझाने की कोशिश नहीं की। बाजारवादी नीतियों से तात्पर्य ऐसी नीतियों से है जो प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देती हैं, जिस कारण कीमतें नहीं बढ़तीं। उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाती हैं और नियम आधारित पूंजीवाद और आर्थिक विकास को प्रोत्साहन देती हैं। इससे केवल अमीरों को नहीं बल्कि देश के सभी लोगों को लाभ होता है। इसके विपरीत व्यापारवाद में राजनेता और अधिकारी आर्थिक फैसले लेते हैं। इस व्यवस्था में सत्ता के करीबी पूंजीपतियों को लाभ होता है।

अब इस सरकार को अपनी गलती का एहसास हुआ है और इस वर्ष में वित्त मंत्री ने कुछ सुधारों को लागू करने का प्रयास किया है। किंतु अब बहुत देर हो चुकी है। और इस बीच भी सरकार गलतियां कर रही है। 1991 के बाद के सबसे भीषण आर्थिक संकट के बीच मेें सरकार ने खाद्य सुरक्षा कानून बना डाला। इसके तहत दो-तिहाई भारतीयों को बाजार भाव के दस प्रतिशत मूल्य पर खाद्यान्न दिया जाएगा। इस नीति से बहुत से लोगों को झटका लगा है क्योंकि आधिकारिक सर्वे के अनुसार देश में महज दो प्रतिशत लोग ही भुखमरी का शिकार हैं। वैसे भी अतीत का उदाहरण बताता है कि इस प्रकार की योजनाओं में आधे से भी कम खाद्यान्न सही लोगों तक पहुंच पाता है। शेष कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है।

विकास और सुधार पर जोर देने के बजाय नई सरकार को शासन में सुधार लाना होगा। अंत में, भारत की कहानी निजी क्षेत्र की सफलता और सार्वजनिक क्षेत्र की विफलता को दर्शाती है। कुशासन के बावजूद देश में संपन्नता बढ़ रही है। जहां सरकार की सबसे अधिक जरूरत होती है यानी कानून और व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य और पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित करने में, वहीं इसका बुरा प्रदर्शन है। जहां इसकी जरूरत नहीं है, वहां यह अति सक्रियता दिखा रही है जैसे शासन में लालफीताशाही को बढ़ावा देना। इस प्रकार की स्थिति में या तो आप देश की क्षमता बढ़ाइए और या फिर अपनी आकांक्षाओं को सीमित रखिए। खाद्य सुरक्षा कानून या फिर मनरेगा जैसी योजनाओं के बजाय गरीबों को सीधे नकद भुगताने से श्रम या खाद्य बाजार पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। मनरेगा जैसी योजनाओं के बजाय नियमन और अन्य बाधाओं को दूर कर रोजगार के टिकाऊ अवसरों को पैदा करने की कोशिश क्यों नहीं की जा रही है?

भारत में आर्थिक सुधारों से भी कहीं जरूरी प्रशासनिक, न्यायिक और पुलिस सुधार हैं। त्वरित फैसले लेने, उन्हें क्रियान्वित करने, कानून का शासन लागू करने, भ्रष्टाचारियों को दंडित करने और सरकार को लोगों के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए एक मजबूत उदारवादी राष्ट्र की जरूरत है। भारत की उम्मीदें इसकी युवा शक्ति पर टिकी हैं, जो मध्यम वर्ग में प्रवेश कर चुके हैं या फिर इसकी दहलीज पर हैं। अभी इनकी संख्या कुल आबादी की एक-तिहाई है और आने वाले दशक में ये बढ़कर आधे हो जाएंगे। वे हैरान-परेशान हैं कि जो देश उन्हें धार्मिक और राजनीतिक स्वतंत्रता देता है, वह आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान करने में विफल क्यों है?

एक ऐसे देश में जहां पांच में से दो व्यक्ति स्वरोजगार में लगे हैं, नया व्यवसाय शुरू करने में औसतन 42 दिन लग जाते हैं। उद्योगपति लालफीताशाही और भ्रष्ट इंस्पेक्टरों के उत्पीड़न के शिकार हैं। 1991 में सुधारों की शुरुआत के दो दशक बाद भी भारत चीन जैसा विनिर्माता नहीं बन सका है। भारत में दक्षिणपंथी रुझान वाली पंथनिरपेक्ष राजनीतिक स्थान खाली है। भारत की राजनीतिक पार्टियों में से कोई भी इसे नहीं भर सकती। नई आम आदमी पार्टी कुछ ज्यादा ही समाजवादी है और इसका विकास, उदारीकरण और सुधार में कोई विश्वास नहीं है। इसलिए देश में एक नई उदार पार्टी की जरूरत है, जिसका आर्थिक विकास के लिए राजनेताओं और नौकरशाहों के बजाय बाजार पर विश्वास हो।

 

 

- गुरचरण दास

साभारः दैनिक जागरण

गुरचरण दास