स्कूल खोलने में देरी ठीक नहीं!

- लॉकडाउन 1 के दौरान से स्कूलों के खुलने पर लगी रोक के दुष्परिणाम दूरगामी होंगे
- मॉल्स, थिएटर्स, पार्क खोलने की मिल चुकी है अनुमति, शादी समारोहों पर भी नहीं है रोक
- सरकारी और बजट स्कू लों के छात्रों का शैक्षणिक भविष्य खतरे में, स्कूल ड्रॉपआउट्स की संख्या में वृद्धि का आशंका बलवती

कोरोना महामारी के विस्तार को रोकने के लिए मार्च 2019 से लागू किया गया देशव्यापी लॉकडाउन कुछ प्रतिबंधों और दिशा निर्देशों के साथ लगभग लगभग समाप्त हो गया है। देश के अनलॉक होने की प्रक्रिया मुख्य रूप से 6 चरणों में संपन्न हुई। इस दौरान कंटेनमेंट जोन्स को छोड़ एक एक कर रेल, सड़क परिवहन, वायु सेवा, मेट्रो सेवा, मॉल्स एवं व्यापारिक केंद्रों, सभी प्रकार की व्यावसायिक गतिविधियों, सिनेमा हॉल, पार्क, विवाह समारोहों, राजनैतिक व अन्य रैलियों के आयोजन की अनुमति दे दी गई। हालांकि इन सभी गतिविधियों के दौरान मास्क, सेनेटाइजर व सुरक्षित दूरी जैसे प्रावधानों का अनुपालन आवश्यक किया गया है। आश्चर्यजनक रूप से शिक्षा क्षेत्र को अनलॉक की प्रक्रिया से अलग रखा गया विशेष रूप से प्राथमिक व उच्च प्राथमिक कक्षाओं वाले स्कूलों को।

नवंबर माह में अनलॉक प्रक्रिया के छठें चरण के दौरान दिशा निर्देशों को जारी करते हुए गृहमंत्रालय व स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्कूल खोलने का फैसला राज्य सरकारों के उपर छोड़ दिया था। राज्य सरकारों को ऐसा करने से पहले अभिभावकों की राय लेना आवश्यक था। कुछ राज्यों ने अभिभावकों की राय जानने की कोशिश की लेकिन इसके पूर्व व्यापक जनजागरण और स्कूलों के खुलने की स्थिति में संक्रमण से सुरक्षा के लिए किये जाने वाले उपायों प्रति जागरुकता कार्यक्रमों को गंभीरता से नहीं चलाया गया। परिणाम स्वरूप अभिभावकों के मन में अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर अविश्वास की स्थिति बनी रही और स्कूल नहीं खुले।

पिछले 10 महीनों से स्कूलों के बंद पड़े होने से स्कूल संचालकों का नुकसान तो हुआ ही है, सबसे अधिक दुष्प्रभाव यदि किसी पर पड़ा है तो वह छात्र ही हैं। पहली पीढ़ी के छात्रों के भविष्य पर इसका दूरगामी प्रभाव पड़ना तय है। इसके अतिरिक्त शिक्षण प्रशिक्षण कार्य पर आधारित आर्थिक चक्र पर भी चरमरा गया है।

छात्रों का भविष्य अंधकारमय
करोना महामारी के दुष्प्रभाव ने शिक्षा के क्षेत्र में विगत डेढ़ दशक से भी अधिक समय के अथक प्रयासों को बर्बाद करने का काम किया है। सरकार द्वारा एक दशक पूर्व लागू किये गए निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून, मिड डे मील और उसके पूर्व के सर्वशिक्षा अभियान का परिणाम यह हुआ था कि प्राथमिक कक्षाओं में दाखिले नब्बे प्रतिशत से अधिक के साथ दाखिलों की वैश्विक दर के आसपास पहुंच गया है। अच्छी बात यह है कि इसमें बड़ी संख्या प्रथम पीढ़ी के छात्रों (ऐसे छात्र जिनके अभिभावकों में से एक या दोनों ने औपचारिक स्कूली शिक्षा हासिल नहीं की है) की है। शिक्षा की महत्ता के प्रति जगाए गए अलख और जागरुकता अभियान का ही नतीजा है कि लाखों की संख्या में अभिभावकों ने निशुल्क सरकारी स्कूलों पर छोटे और अफोर्डेबल बजट स्कूलों की गुणवत्ता युक्त शिक्षा को वरीयता दी। निम्न मध्यम आय वर्ग सहित गरीबी रेखा से नीचे व इस रेखा के उपर के वर्ग के अभिभावकों ने मुश्किल हालातों में भी पैसे बचाकर अपने बच्चों को प्राइवेट बजट स्कूलों में दाखिला दिलाया। बुरा हो कोरोना संक्रमण का जिसके कारण देशव्यापी लॉकडाउन जैसा फैसला लेना पड़ा। इससे लाखों की तादात में लोगों का रोजगार चौपट हो गया। नौकरियां छूट गई और लोग बेरोजगार हो गए। आजीविका के समक्ष उत्पन्न हुए संकट के मद्देनजर लाखों लोगों को पैदल ही अपने गांव वापस लौटते दुनिया ने देखा।

देश के अनलॉक होने पर नौकरी और कामकाज की तलाश में लोग फिर से वापस शहरों को लौटने लगे हैं। हालांकि लौटने वालों में बहुसंख्यक ऐसे हैं जिन्होंने अपने परिवार और बच्चों को गांव पर ही छोड़ दिया है। बड़ी संख्या में लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने सब्जी, फल आदि बेचने के कार्य जैसे खुद का छोटा मोटा रोजगार शुरु कर दिया है। स्कूलों के बंद होने के कारण छोटे बच्चों के वापस अपने अभिभावकों को उनके काम में हाथ बंटाने और दुकानों पर मेहनत मजदूरी करने के काम में जुड़ने का डर पैदा हो गया है।

स्कूलों द्वारा भले ही ऑनलाइन कक्षाएं चलाई जा रही हों लेकिन यह सत्य है कि सरकारी और छोटे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाला एक बड़ा वर्ग स्मार्टफोन और इंटरनेट की सुविधाओं से वंचित है। पहले समस्या यह थी कि यदि गृह स्वामी के पास एक फोन है भी तो एक घर में एक से अधिक बच्चे होने की स्थिति में उनकी पढ़ाई बाधित होती थी। इसका समाधान कक्षाओं के समय में फेरबदल कर निकाले जाने की कोशिश की गई। लेकिन अब परिस्थितियां बदल गई हैं। देश के अनलॉक होने और अभिभावकों के काम पर लौटने के कारण घर का एकमात्र फोन भी गृह स्वामी के साथ चला जाता है। इस कारण छात्रों के समक्ष बड़ी समस्या पैदा होने लगी है। पहली पीढ़ी के छात्रों के साथ समस्या यह भी है कि घर पर पढ़ाई के दौरान समस्या आने पर उन्हें समझाने वाला कोई नहीं होता। 

बंधुआ बाल मजदूरों के अधिकारों के लिए कार्यरत कैलाश सत्यार्थी फाउंडेशन ने बच्चों के लिए कार्यरत 53 गैर सरकारी संगठनों का सर्वे किया। इस सर्वे में 89% संगठनों ने देश में बच्चों के अवैध व्यापार के मामलों में वृद्धि की आशंका जताई है जबकि 64% संगठन मानते हैं कि लॉकडाउन के कारण बाल विवाह के मामलों में वृद्धि हो सकती है।

स्कूलों के समक्ष समस्या

पिछले लगभग 10 महीनों से बंद पड़े स्कूलों के संचालकों के समक्ष भारी आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। बजट स्कूलों के संगठनों की अखिल भारतीय संस्था नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलायंस (निसा) द्वारा कराए गए एक आंतरिक सर्वे के मुताबिक लॉकडाउन के दौरान केवल 15-20 प्रतिशत अभिभावकों ने स्कूल फीस जमा कराया। इस कारण स्कूलों का अपना खर्च निकलना मुश्किल हो गया है। विदित हो कि अधिकांश छोटे व कम फीस वाले स्कूल किराये के भवनों में संचालित होते हैं। लगभग 10 महीनों से फीस न मिलने के कारण तमाम स्कूल संचालक स्कूल भवन का किराया, बिजली का बिल, स्कूल वाहनों की ईएमआई व टैक्स आदि चुकाने में असमर्थ हैं। इसके अलावा इन स्कूलों से होने वाली आय पर निर्भर स्कूल स्टाफ व उनके परिजनों के सामने भुखमरी जैसे हालात उत्पन्न हो गए हैं। निसा के अध्यक्ष कुलभूषण शर्मा के मुताबिक लॉकडाउन के कारण देश के 5 लाख से अधिक बजट स्कूल आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं। इन 5 लाख स्कूलों के लगभग 65 लाख शैक्षणिक व गैर शैक्षणिक कर्मचारियों और उनकी आय पर निर्भर 2 करोड़ से अधिक परिजनों की आर्थिक स्थिति बद से बदतर स्थिति में पहुंच गई है। अधिकांश स्कूलों पर तालाबंदी का खतरा मंडरा रहा है। शर्मा का कहना है कि यदि सरकार ने बजट स्कूलों के लिए जल्द से जल्द राहत पैकेज जारी नहीं किया तो स्थिति भयावह हो जाएगी।

दक्षिणी दिल्ली में बजट स्कूल चलाने वाले सुशील धनकर की मांग है कि सरकार कंटेनमेंट जोन (यदि कोई हो) को छोड़कर बाकी अन्य इलाकों में जहां कोरोना का कोई भी पेशेंट नहीं है, कम से कम उन इलाकों में स्कूल खोलने की अनुमति अवश्य दे। उनका कहना है कि वैक्सीन का इंतेजार करना सही फैसला नहीं है क्योंकि बच्चों के लिए अभी कोई वैक्सीन बनने या परीक्षण की प्रक्रिया में नहीं है। यदि वैक्सीन का इंतेजार किया जाए तो अगला साल भी निकल जाएगा। धनकर का कहना है कि सभी स्कूल सरकार द्वारा जारी सेनेटाइजेशन, सेफ्टी डिस्टेंस, मास्क की अनिवार्यता सहित सभी गाइडलाइंस का पालन करने को तैयार हैं।

- अविनाश चंद्र