वॉल स्ट्रीट आन्दोलन को दिशा की ज़रुरत

पिछले 17 सितंबर से ऑक्युपाय वॉल स्ट्रीट यानी वॉल स्ट्रीट पर कब्जा करो के नारे के साथ शुरू हुआ आंदोलन अब सहित विश्व के कई शहरों में फैल गया है. हजारों लोगों कॉर्पोरेट लालच और वित्तीय संकट में वॉल स्ट्रीट की भूमिका के खिलाफ रैली और प्रदर्शन में जुटे हुए हैं.

अनुमानतः 80 देशों के 950 शहरों में लोगों ने कॉर्पोरेट लूट के खिलाफ प्रदर्शन किया. कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस में हिंसक झड़पें भी हुईं. वॉल स्ट्रीट को ‘वित्तीय आतंकवाद’ का नाम देते हुए प्रदर्शनकारी बेरोज़गारी, सरकार की नीतियों और वित्तीय संस्थाओं के खिलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं तथा उन्हें लगातार समर्थन प्राप्त हो रहा है.

आर्थिक गतिविधियों के केन्द्र वॉल स्ट्रीट से ही पूरी दुनिया की आर्थिक नीतियां बनाई जाती है. अमेरिका में लोग  गिरती अर्थव्यवस्था, बढती महंगाई, और बेरोजगारी से तंग है. प्रदर्शनकारी लोग आय में बढ़ते अंतर, कॉर्पोरेट जगत में मुनाफे के बढ़ते लालच और बेरोजगारी के खिलाफ हैं. इनका कहना है कि सरकार पूंजीपतियों के हितों का ज्यादा ध्यान रख रही है। उनका आरोप है कि अमेरिकी सरकार अमीर निकायों को तो आर्थिक रियायतें दे रही है लेकिन देश के आम नागरिकों की उपेक्षा कर रही है. अरबों डॉलर के तीन बेलआउट पैकेजों के बावजूद आम जनता को राहत नहीं मिल पाई है

राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी एक वक्तव्य में कहा कि वाल स्ट्रीट और न्यूयार्क में हो रहे प्रदर्शन वास्तव में डावाडोल होती अर्थव्यवस्था को लेकर लोगों की हताशा और गुस्से का इज़हार हैं. उन्होंने कहा कि बेरोजगारी की दर 9.1 हो गई है और लोगों को रोजगार की सख्त जरूरत है. उल्लेखनीय है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने कुछ समय पहले 447 अरब डालर का रोजगार विधेयक संसद में पेश किया था जो रिपब्लिकन सांसदों के विरोध के कारण ऊपरी सदन सीनेट में चारो खाने चित्त हो गया था.

एक रोचक तथ्य है कि इस आंदोलन का कोई नेता या संयोजक नहीं है। इन आन्दोलनकारियों का किसी संगठन से समझौता भी नहीं दिखाई पड़ता. कनाडा के वैनकूवर से छपने वाली एक रेडिकल मैगजीन ऐडबस्टर्स ने सिर्फ शिगूफे के तौर पर अमेरिकियों से 17 सितंबर को वॉल स्ट्रीट पर प्रदर्शन शुरू करने के लिए कहा था और ये बात सच में तब्दील हो गयी. आन्दोलनकरी सिर्फ एक सोच से जुड़े हुयें हैं कि अमीर कॉर्पोरेट वर्ग और बैंकिंग समुदाय अपने लालच के आगे सामान्य लोगों को कुछ नहीं समझता तथा सरकार भी उनको संरक्षण देने का काम कर रही है.

जहां प्रदर्शनकारियों की तकलीफों से संवेदना होना स्वाभाविक है, हमें ये भी समझना होगा कि वर्तमान  आर्थिक वातावरण के लिए महज़ पूंजीवाद ही ज़िम्मेदार नहीं है. नीतियों की गुणवत्ता पर वाद विवाद सही है, सरकार के निर्णयों पर सवाल खडा करना भी सबका हक है पर इसके चलते एक गैर उदारवादी सोच ओढ़ लेना घातक साबित होगा. ऐसा ना हो कि इस विरोध के चलते विकसित देशों में संरक्षणवाद पनपने लगे जो कि विश्व आर्थिक व्यवस्था के लिए ठीक नहीं होगा. याद रहे कि पूंजीवाद ने सालों साल पश्चिमी देशों में सम्पन्नता को जन्म दिया और उसे कायम रखा. पर जिस तरह अति और लालच कहीं भी ठीक नहीं होता उसी तरह यहाँ भी नीतियों में सुधार की आवश्यकता है. आशा है इस आन्दोलन को जल्द ही कोई सही दशा-दिशा प्राप्त होगी और एक अछे नेतृत्व में ये अपने लक्ष्य को हासिल करेगा.

- स्निग्धा द्विवेदी