इतिहास के आइने में...

‘‘सोवियत संघ के पतन और शीत युद्ध के अंत के बाद बर्लिन की दीवार एकमात्र बाधा नहीं थी जो दूर हुई बल्कि इसके साथ ही धन, व्यापार, लोगों और विचारों के प्रवाह को बाधित करने वालो अवरोधों का भी पतन हो गया।’’

- फरीद ज़करिया, अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रसिद्ध लेखक

बर्लिन की दीवार

सारी दुनिया इस समय बर्लिन की दीवार के ढ़हने की बीसवीं सालगिरह मना रही है। इस दीवार का बनना इतिहास में जितना ज्यादा मायने रखता था उससे कहीं ज्यादा इसका ढहना वर्तमान और भविष्य के लिए मायने रखता है। यह एक ऐसी दीवार थी जिसने दिलों में दूरीयां पैदा की और लोगों से सभी प्रकार की आज़ादी छीन ली, दुनिया को दो धड़ों में बांटा, एक ऐसी विचारधारा का पोषण किया जो आम लोगों को विकास और समृद्धि के मार्ग पर कभी नहीं ले जा सकी। इस दीवार का ढहना तय था। 9 नवंबर, 1989 के दिन आखिर यह दीवार गिरा दी गई। प्रस्तुत है इस दीवार के बनने और ढहने का दिलचस्प ब्यौराः

यूं पड़ी दीवार की नींव

बर्लिन की दीवार की दास्तां दूसरे विश्व युद्ध के अंत के साथ उस समय शुरू होती है जब नाजियों ने 1945 में आत्मसमर्पण कर दिया था। दूसरे विश्व युद्ध के विजेताओं अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और सोवियत संघ ने जर्मनी का विभाजन चार जोनों में कर दिया था। इन चार जोनों के हरेक जोन पर इनमें से एक देश का नियंत्रण था। जर्मनी की ही तरह बर्लिन को भी चार जोनों में विभाजित कर दिया गया था। शुरू में तो बर्लिन के लोग इन जोनों में काम के सिलिसले या परिजनों और दोस्तों से मिलने के लिए की जाने वाली आवाजाही के लिए पूरी तरह आजाद थे। जहां अमेरिकी, ब्रिटिश और फ्रांसीसी प्रभुत्व वाले जोन पूंजीवादी और प्रजातांत्रिक बन गए जबकि सोवियत संघ के कब्जे वाला हिस्सा कम्युनिस्ट तानाशाही में तब्दील हो गया।

बस यहीं से विवाद की एक बड़ी जड़ पैदा होने लगी। इस बात को लेकर लोकतांत्रिक सहयोगियों और कम्युनिस्ट सोवियत संघ में 1948 में विवाद पैदा हो गया कि बर्लिन के शासन को किस तरह संभाला जाए। बर्लिन सोवियत संघ के हिस्से वाले जर्मनी में आता था। यानी एक ऐसी जगह जिसके चारों ओर पूंजीवादियों का आधिपत्य था। पश्चिमी देशों को लगता था कि वह किसी भी हिस्से में आने-जाने के लिए पूरी तरह आजाद हैं लेकिन 1 अप्रैल 1948 में सोवियत संघ ने पूर्वी जर्मनी के अंदर और बाहर के सभी मार्गों को अवरुद्ध कर दिया। जिसके चलते मामूली खाद्यान्न सामग्री या ईंधन के साथ पश्चिमी बर्लिन के बीस लाख लोग फंस गए। सहयोगी देशों को विमानों के जरिये लोगों को 462 दिन तक खाद्य सामग्री और अन्य सामान मुहैया कराना पड़ा। सोवियत संघ ने 1949 में इन अवरोधों को हटाया।

यही नहीं, 1949 में पश्चिमी और पूर्वी जर्मनी में अलग-अलग सरकारों का भी गठन हो गया। 1950 के दशक में पूर्व और पश्चिम की यह दरार और गहराती गई। पश्चिमी बर्लिन और पश्चिमी जर्मनी जहां तरक्की कर रहे थे वहीं पूर्व में लोग हर तरह की कमी की मार झेल रहे थे। लोगों को मजबूरन पश्चिम का रुख करना पड़ रहा था। लोगों को अपने काम धंधों से हाथ धोना पड़ रहा था, परिस्थितियां बद से बदतर होती जा रही थीं। लोगों का पलायन पूर्वी जर्मनी से पश्चिम की ओर जारी रहा। बेहतर जीवन की चाह में लगभग 30 लाख लोग पूर्वी जर्मनी को छोड़कर पश्चिम का चयन कर चुके थे। 1961 के आते-आते बड़े स्तर पर हो रहे इस पलायन को रोकने के लिए सोवियत सरकार ने कदम उठाने का फैसला लिया।

दीवार का जन्म

13 अगस्त 1961 के तड़के दो बजे पूर्वी और पश्चिमी बर्लिन के मध्य कंटीली तारों के बैरियर खींच दिए गए. इसने शहर को दो हिस्सों में विभाजित कर दिया। कुछ ही दिनों के भीतर मजदूरों ने एक मध्यम ऊंचाई वाली दीवार शहर के बीचोंबीच खड़ी कर दी। मास्को ने इस दीवार को पाश्चात्य उपनिवेशवाद को रोकने वाली करार दिया। सोवियत संघ के तत्कालीन प्रधानमंत्री निकिता क्रुश्चेव ने कहा था, ‘‘जर्मनी की वर्किंग क्लास ने इस दीवार का निर्माण किया है ताकि कोई भी शैतानी ताकत भविष्य में जर्मन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक में प्रवेश न कर सके।’’ पश्चिमी जर्मनी के लोगों ने इसे वॉल ऑफ शेम की संज्ञा दी। दीवार के निर्माण में संशोधन करके इसे और अधिक मजबूत बनाया गया। पुराने समय में दीवारों का निर्माण जहां दुश्मनों से रक्षा के लिए किया जाता था वहीं इसके उलट इस दीवार के जरिये देश के लोगों को वहीं कैद कर दिया गया था। गैर कानूनी रूप से इस दीवार को लांघने वालों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान किया गया था।

दीवार बनने के परिणाम

दीवार ने शहर को दो हिस्सों में बांट दिया, लोगों को परिवारों से अलग कर दिया और लोग नौकरियों से हाथ भी धो बैठे। पश्चिमी जर्मनी में दीवार को लेकर व्यापक स्तर पर विरोध प्रदर्शन भी हुए। लेकिन दीवार से फिर भी निजात नहीं पाई जा सकी। अगर दीवार लांघने की बात करें तो 1961 से 1989 के बीच लगभग 5,000 लोग दूसरी ओर जाने में सफल रहे। जबकि 100-200 लोग दीवार को लांघने के चक्कर में मारे भी गए।

यूं ध्वस्त हो गई दीवार

1985 में सोवियत संघ में मिखाइल गोर्बाचॉफ ने सत्ता की बागडोर संभाली। उन्होंने लोकतांत्रिक सुधारों की शुरूआत की। शीत युद्ध समाप्ति की ओर बढ़ रहा था। पूर्वी जर्मनीवासियों ने कम्युनिज्म के खिलाफ आवाज बुलंद करनी शुरू कर दी थी। 1989 के मई माह में हंगरी सरकार ने आस्ट्रिया के साथ अपनी सीमा को खोल दिया था। पूर्वी जर्मनी के कई लोगों ने पश्चिम की ओर जाने के लिए इस मार्ग को अपना जरिया बनाया। संपूर्ण परिदृश्य को देखते हुए 9 नवंबर 1989 को इस दीवार को हटा दिया गया। आवाजाही संबंधी प्रतिबंध हटा दिए गए।

अंततः थॉमस फ्रीडमैन के शब्दों में कहा जा सकता है, ‘‘9 नवंबर 1989 (बर्लिन की दीवार के पतन के बाद) के बाद दुनिया रहने के एक बेहतर स्थान में तब्दील हो गई क्योंकि आजादी के प्रत्येक प्रस्फुटन से एक नई शुरूआत की भूमिका बननी शुरू हो जाती है।’’