कुछ अंधेरे पहलू

शिशु मृत्यु दर और अपेक्षित आयु के मामले में बिहार राष्ट्रीय औसत से पीछे ही रहा करता था, लेकिन अभी वह दोनों मामलों में इसके काफी करीब पहुंच गया है। 47 प्रति हजार के आंकड़े के साथ फिलहाल बिहार शिशु मृत्यु दर के मामले में भारतीय औसत (48 प्रति हजार) से थोड़ा बेहतर स्थिति में है, जबकि 65.6 वर्ष की अपेक्षित आयु के साथ वह करीब-करीब भारतीय औसत (66.1 वर्ष) की बराबरी पर है। कुल मृत्यु दर के मामले में 7.2 प्रति हजार के भारतीय औसत के मुकाबले बिहार 6.8 प्रति हजार के आंकड़े के साथ अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है। यह तथ्य बिहार में टीकाकरण की शानदार सफलता को व्यक्त करता है। कुछ अंधेरे पहलू भी हैं। मसलन, योजना व्यय और प्रति व्यक्ति सामाजिक व्यय के मामले में बिहार आज भी देश में सबसे नीचे है। 2004 से 2009 के बीच पूरे देश में ग्रामीण गरीबी 8.4 प्रतिशत कम हुई, जबकि बिहार में इसमें सिर्फ 0.4 फीसदी की कमी आई। इसकी वजह कुछ और नहीं, 2009 का भयंकर सूखा था। 2011-12 के गरीबी सवेर्क्षण को अभी अंतिम रूप दिया जा रहा है और इसमें ग्रामीण गरीबी में जबर्दस्त गिरावट दिखेगी। बिहार के ग्रामीण इलाकों में आ रही संपन्नता का प्रमाण वहां से मजदूरों के पलायन में आई कमी में देखा जा सकता है।

परिवार नियोजन और जनसंख्या वृद्धि के मामले में बिहार देश के सबसे गड़बड़ राज्यों में रहा है। पिछले एक दशक में भारत के 17.6 प्रतिशत के मुकाबले यहां की आबादी 25 फीसदी बढ़ गई। हर स्त्री के पीछे यहां 3.7 बच्चों का औसत आता है, जो 2.5 के राष्ट्रीय औसत का डेढ़ गुना है। इसके चलते बिहार की प्रति व्यक्ति आय ऊपर नहीं जा रही है। लेकिन क्या इसे और ज्यादा केंद्रीय सहायता की दलील की तरह पेश किया जा सकता है? बिहार की तेजी से बढ़ती आबादी का दंड तमिलनाडु और केरल जैसे उन राज्यों को क्यों दिया जाना चाहिए, जिन्होंने अपनी जनसंख्या सही तरीके से नियंत्रित की है और इस क्रम में अपनी प्रति व्यक्ति आय सुधार ली है?

बिहार की उपजाऊ जमीन और पानी की प्रचुर उपलब्धता ने उसे ऐतिहासिक रूप से संसार के सबसे समृद्ध इलाकों में से एक बनाया है। वह विशाल साम्राज्यों का शक्तिपीठ रहा है। असम की तरह ऐतिहासिक रूप से पिछड़ा इलाका होने बजाय अक्षमता और भ्रष्टाचार के कारण बिहार विश्व नेता जैसी अपनी स्थिति से पीछे लौटा है। बिहारियों ने अगर लालू यादव को अपना नेता चुना, जो कहते थे कि आर्थिक विकास बेकार की चीज है, तो इसका दोष बाकी भारत पर क्यों डाला जाए? लालू का कहना था कि सड़कें क्यों बनाएं, इन पर तो अमीरों की गाड़ियां दौड़ेंगी, जो गरीबों के जानवर कुचल देंगी। आज नीतीश ने वह नीति पलट दी है और बिहार भारत का सबसे ज्यादा सड़कें बनाने वाला राज्य हो गया है। रिकॉर्ड जीडीपी ग्रोथ में इसका अहम योगदान है। लेकिन बिहारियों ने अगर लालू को 15 साल सत्ता में रखा तो इसका दंड अन्य राज्यों के करदाता नहीं, वे खुद ही भुगतेंगे।

सहायता के तर्क

राष्ट्रीय आय में बिहार का योगदान सिर्फ 2.8 फीसदी का है, जबकि केंद्रीय सहायता का 8.6 फीसदी उसके खाते में जाता है। इस आंकड़े को झुठलाते हुए बिहार के नेता कहते हैं कि देश की 8.8 फीसदी आबादी उनके राज्य में रहती है, जिसमें देश की सबसे गरीब 8 प्रतिशत जनसंख्या भी शामिल है, लिहाजा बिहार और भी ज्यादा मदद का हकदार है। यहां हम फिर उसी सवाल पर लौटते हैं कि बेहतर परिवार नियोजन वाले राज्यों को क्या इस काम में असफल रहे राज्यों को हर्जाना देना पड़ेगा? बिहार के विकास की रफ्तार बनाए रखने के लिए इसकी दिशा को खेती से उद्योगों और सेवा क्षेत्र की तरफ मोड़ना जरूरी है। नीतीश इसके लिए केंद्रीय करों में छूट चाहते हैं। बिहार को बिजली और बड़े उद्योगों की स?त जरूरत है, लेकिन इन क्षेत्रों में भी वहां ठहराव जैसी स्थिति नहीं है। अपनी राजनीतिक ताकत के बल पर नीतीश आने वाले दिनों में बिहार के लिए विशेष राज्य का दर्जा हासिल कर सकते हैं, लेकिन यह ताकतवर की जीत होगी, अपने लिए वाजिब मांग कर रहे एक कमजोर राज्य की नहीं।

असाधारण उपलब्धि

बिहार ने पिछले आठ वर्षों में 12 प्रतिशत सालाना की वृद्धि दर्ज की है, जो भारत के बड़े राज्यों में सबसे ज्यादा है। यह एक असाधारण उपलब्धि है। कुछ लोग कहते हैं कि कमजोर आधार से तरक्की करना ज्यादा आसान होता है। लेकिन यह अगर कोई सामान्य बात होती तो देश के सारे गरीब और पिछड़े राज्य ताबड़तोड़ तरक्की कर रहे होते। नीतीश की 12 प्रतिशत वृद्धि हर हाल में रेखांकित करने योग्य है। इससे यह भी साबित होता है कि सुशासन के बल पर कोई गरीब और पिछड़ा राज्य भी अग्रणी पांत में पहुंच सकता है, और ऐसा वह बिना किसी विशेष सहायता या राजनीतिक पक्षपात के भी कर सकता है। बिहार की सामाजिक प्रगति भी गौर करने लायक रही है। 2001 से 2011 के बीच साक्षरता यहां 17 प्रतिशत बढ़ी है, जो देश में सबसे ज्यादा है। स्त्री साक्षरता में तो और भी ज्यादा, 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो संभवत: एक विश्व रिकॉर्ड है।

- स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर
साभारः नवभारत टाइम्म

स्वामीनाथन अय्यर