मैं एक शिक्षक हूं, अपराधी नहीं!

हमारी मांग स्कूलों और शिक्षकों की सुरक्षा के लिए कानून

भारत में, शिक्षा हमेशा व्यक्तियों और समुदाय के स्वैच्छिक प्रयासों के माध्यम से समाज की ज़िम्मेदारी रही है। बतौर माध्यम, भारत में अंग्रेजी भाषा में औपचारिक शिक्षा की शुरूआत औपनिवेशिक काल में हुई। इससे शिक्षा के क्षेत्र में मानकीकरण का प्रवेश हुआ। स्वतंत्रता के बाद, सभी को शिक्षा प्रदान करने की ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों को सौंपी गई थी। राज्यों की कमजोर क्षमता और संसाधनों की सीमितता ने शिक्षा प्रदान करने के लिए स्वैच्छिक प्रयासों को प्रोत्साहित किया। इसका परिणाम गैर सरकारी शैक्षिक संस्थानों में नामांकन की बढ़ती संख्या के तौर पर देखा गया है।

एक तरफ निजी स्कूल स्कूल शिक्षा में निष्पक्षता, दक्षता और गुणवत्ता लाने में योगदान देते रहते हैं वहीं दूसरी ओर, उनकी स्वायत्तता में तेजी से कटौती की जा रही है। सरकार मान्यता मानदंडों, प्रवेश प्रक्रिया, किताबों के चयन, पाठ्यक्रम का पालन करने, शिक्षकों की योग्यता, कर्मचारियों के वेतन और शुल्क संरचनाओं आदि के साथ स्कूलों के उद्घाटन और संचालन में दिशानिर्देशों को अनिवार्य करती है। शिक्षा के निजीकरण की खिलाफ वाली धारणा और नियमों का पालन करने में असफल रहने वाले निजी स्कूलों की कुछ घटनाओं ने इन स्कूलों से जुड़े शिक्षकों की पहचान को कलंकित करने का काम किया है। 

स्कूलों की मुश्किलों में और ईज़ाफा किया है छात्रों की सुरक्षा जैसे मुद्दे और इसकी जिम्मेदारी मढ़ने की घटनाओं ने। स्कूल परिसर में होने वाले किसी भी दुर्घटना के लिए बिना किसी जांच के स्कूल प्रबंधन को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। स्कूल के शैक्षणिक, गैर शिक्षण कर्मचारी और प्रबंधन को आसानी से बली का बकरा बना दिया जाता है और अनुचित जांच के आधार पर उनके साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार किया जाता है। आज मीडिया भी स्कूलों और इसके प्रबंधन को बिनी किसी साक्ष्य और प्रमाण के अपराधियों की तरह प्रस्तुत करती है। इस दृष्टिकोण ने काम काज के पूरे पारिस्थितिक तंत्र को ही बदल दिया है। इससे शिक्षकों के उत्साह में कमी आई है और मन में हर समय अपराधी बनाए जाने का डर बैठ गया है।

एक ऐसा देश, जहां शिक्षा के क्षेत्र में डा. राधाकृष्णन और सावित्रीबाई फुले जैसे शिक्षकों द्वारा किए गए प्रयासों का गर्व के साथ अनुष्ठान किया जाता हो, उसी देश में शिक्षकों को सलाखों के पीछे देखना वास्तव में दुखदायी है। हम हमेशा मानव और बाल अधिकारों के बारे में बात करते हैं लेकिन हम शिक्षकों के अधिकार के बारे में बात करना भूल जाते हैं। ऐसी तमाम घटनाएं घटित हुई हैं जिनसे शिक्षकों की सुरक्षा पर प्रश्नचिन्ह खड़े होते हैं। शिक्षकों को गोली से उड़ा दिया गया क्योंकि वे अपने कर्तव्यों के निर्वहन का प्रयास कर रहे थे।

अब समय आ गया है कि हम स्कूलों के शैक्षणिक, गैर शैक्षणिक और प्रबंधन कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक सुरक्षा कानून बनाने की मांग गंभीर चर्चा और बहस के माध्यम से करें। इस संदर्भ में हमें देश भर से जो व्यापक समर्थन मिला है, वह इस अधिनियम की गंभीरता और आवश्यकता को दर्शाता है। 5 सितंबर 2018 को सभी उत्सवों और समारोहों का त्याग कर काला दिवस मनाने का वाक्या इस देश में शिक्षा और शिक्षकों की चिंतनीय स्थिति का सबूत है।

आइए सभी मिलकर शिक्षा | सुरक्षा | सम्मान! की लड़ाई लडें।

- कुलभूषण शर्मा (प्रेसिडेंट, निसा)